वाशिंग्टन: अमेरिकी विशेषज्ञों का मानना है कि पाकिस्तान आतंकवाद के ख़िलाफ़ अपनी सुविधानुसार कार्वाई करता है और अमेरिका को ये रवैया बदलवाना चाहिए।
हेरिटेज फ़ॉंउडैशन की शोधकर्ता लीज़ा कर्टिस और विश्लेषक हुमा सत्तार ने 2008 मुम्बई आतंकी हमले के सरग़ना और लश्कर-ए-तैयबा के आतंकवादी ज़ाकिर-उर-रहमान लखवी का उदाहरण देते हुए कहा कि आतंक के ख़िलाफ़ मुहिम में पाकिस्तान का सुविधाजनक रवैया उस क्षेत्र में अमेरिका के राष्ट्रीय सुरक्षा के उद्देश्यों को कमज़ोर बना रहा है।
उन्होंने अपने लेख में लिखा "अगर पाकिस्तान वाक़ई आतंकवाद से लड़ने के मामले में गंभीर है तो उसे सभी आतंकी संगठनों के ख़िलाफ़ हल्ला बोलना होगा और अफग़ानिस्तान तथा भारत में सक्रिय आतंकवादियों से संबंध ख़त्म करने होंगे। इस मामले में अमेरिका को पाकिस्तान पर दबाव डालना चाहिए।
कर्टिस और सत्तार के अनुसार पाकिस्तान सेना ने हर बार अमेरिका को आश्वासन दिया है कि वह अपनी ज़मीन पर सक्रिय सभी आतंकी संगठनों के ख़िलाफ़ कार्वाई के मामले में कटिबद्ध है लेकिन अब तक ऐसे लगा नहीं हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार मार्च में सेना के दबाव में आकर इस्लामाबाद हाई कोर्ट ने पाकिस्तान सरकार की दलीलों को दरकिनार करते हुए लखवी को रिहा करने का आदेश दिया था।
गत दिसंबर पेशावर में एक सैनिक स्कूल पर आतंकी संगठन तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान के हमले के दो दिन बाद पाकिस्तान के आतंक विरोधी कोर्ट ने लखवी की ज़मानत याचिका मंज़ूर कर ली थी।
हमले में 130 बच्चों की जाने गई थी।
विशेषज्ञों के अनुसार "ये पाकिस्तान सेना की तरफ़ से भारत को साफ संकेत है कि वह तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान के ख़िलाफ़ तो कार्वाई जारी रखेगा लेकिन लश्कर-ए-तैयबा से भी राफ़्ता बरक़रार रखेगा।