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होर्मुज स्ट्रेट से ईरान के पीछे हटने की संभावना बेहद कम, जानिए इसके पीछे की वजह

 Published : Apr 30, 2026 01:56 pm IST,  Updated : Apr 30, 2026 01:56 pm IST

अमेरिका और ईरान में सीजफायर जारी है। सीजफायर के बीच बयानों का दौर जारी है। इस बीच एक थिंक टैंक ने अपने अध्ययन में यह बताया है कि अब होर्मुज स्ट्रेट को लेकर ईरान का क्या रुख रहने वाला है।

Strait Of Hormuz- India TV Hindi
Strait Of Hormuz Image Source : AP

तेहरान: एक थिंक टैंक - इंस्टीट्यूट फॉर द स्टडी ऑफ वॉर (ISW) के एक अध्ययन में यह बताया गया है कि ईरान की ओर से होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर अमेरिका को दिए गए नए प्रस्तावों में अब और अधिक झुकने की संभावना नहीं है। ISW के अनुसार, IRGC प्रमुख मेजर जनरल अहमद वाहिदी की ओर से अपनाई गई स्थिति अब तेहरान में सबसे प्रभावी दृष्टिकोण बन गई है। इस विश्लेषण में कहा गया है कि ईरान होर्मुज स्ट्रेट और अपने परमाणु कार्यक्रम पर अपना नियंत्रण छोड़ने को तैयार नहीं दिख रहा है। 

क्या चाहता है ईरान?

मुख्यधारा के ईरानी राजनेता अब इस निर्णय पर एकजुट हो रहे हैं कि जब तक अमेरिका ईरानी बंदरगाहों पर लगी नौसैनिक नाकेबंदी को हटा नहीं लेता, तब तक परमाणु मुद्दे पर कोई चर्चा नहीं की जाएगी। यह वही बात है जो वाहिदी की भी प्राथमिकता है। ISW का कहना है कि इस्लामी शासन के अन्य गुटों के भीतर वाहिदी का विरोध बहुत सीमित नजर आता है। 

ओमान पर क्यों है ईरान की नजर?

विश्लेषण के अनुसार, ईरानी शासन संभवतः होर्मुज जलडमरूमध्य से होकर गुजरने वाले जहाजों से टोल (शुल्क) वसूलने की एक योजना में ओमान को शामिल करके, इस जलडमरूमध्य पर अपनी संप्रभुता स्थापित करने की अपनी योजना को वैधता प्रदान करने का प्रयास कर रहा है। इससे ईरान अमेरिका के सामने एक नया प्रस्ताव पेश करने में सक्षम हो जाएगा और उसे अपनी किसी भी रेड लाइन के साथ कोई समझौता भी नहीं करना पड़ेगा।

ईरान ने उठाया संघर्ष विराम का फायदा

ईरानी शासन अमेरिका पर नौसैनिक नाकेबंदी हटाने का दबाव बनाने के प्रयास में, यमन में मौजूद हूती विद्रोहियों के माध्यम से 'बाब अल-मंडेब' जलडमरूमध्य से गुजरने वाले जहाजों पर हमले करवाने जैसे तरीकों पर भी विचार कर रहा है। ISW का कहना है कि ईरान ने इस संघर्ष विराम का उपयोग अपनी मिसाइल और ड्रोन सेनाओं को पुनर्गठित करने और उन्हें फिर से मजबूत बनाने के लिए भी किया है।

ट्रंप ने फिर साफ किया रुख

इस बीच, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के खिलाफ अमेरिका की ओ से लगाई गई नौसैनिक नाकेबंदी को बुद्धिमानी भरा कदम बताया है। उन्होंने जोर देकर कहा कि तेहरान को अपनी हार स्वीकार करनी ही पड़ेगी। उन्होंने यह भी स्पष्ट कर दिया कि जब तक ईरान अपनी परमाणु महत्वाकांक्षाओं को त्याग नहीं देता, तब तक उसके साथ किसी भी प्रकार के समझौते की कोई गुंजाइश नहीं है। उन्होंने कहा, "ईरान ने अब तक काफी लंबा सफर तय कर लिया है लेकिन असली सवाल यह है कि क्या वो समझौते के लिए पर्याप्त हद तक आगे बढ़ने को तैयार हैं या नहीं। इसलिए, इस वक्त स्थिति यह है कि जब तक वो इस बात पर सहमत नहीं हो जाते कि वे किसी भी प्रकार के परमाणु हथियार नहीं रखेंगे, तब तक उनके साथ किसी भी समझौते की कोई संभावना नहीं है।" 

'बमबारी से ज्यादा असरदार है नाकेबंदी'

हाल ही में Axios के साथ एक खास इंटरव्यू में ट्रंप ने संकेत दिया था कि ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर उस पर दबाव बनाने के लिए जिस नाकेबंदी का इस्तेमाल एक अहम हथियार के तौर पर किया जा रहा है, वह जारी रहेगी। ट्रंप ने कहा था, "नाकेबंदी, बमबारी से कुछ ज्यादा ही असरदार है। वो परमाणु हथियार हासिल नहीं कर सकते हैं।" रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि भले ही ट्रंप अभी नाकेबंदी को अपने मुख्य दबाव के हथियार के तौर पर देख रहे हैं लेकिन अगर ईरान समझौते पर राजी नहीं होता है तो सैन्य कार्रवाई पर भी विचार किया जा सकता है।

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