बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में राहुल गांधी और तेजस्वी जिन सीटों पर रणनीति बदलना चाहेंगे। कटोरिया भी उनमें से एक है। यहां पर आरजेडी की पकड़ अच्छी है, लेकिन झामुमो के साथ अनबन के चलते पार्टी 2020 में हार गई थी। इसका फायदा बीजेपी को मिला था और बीजेपी ने दोबारा इस सीट पर कब्जा कर लिया था। 2020 में जिस तरह से जेडीयू और लोजपा रामविलास की लड़ाई ने आरजेडी और कांग्रेस को फायदा पहुंचाया था। उसी तरह इस सीट पर आरजेडी और झामुमो की लड़ाई ने बीजेपी को फायदा पहुंचाया था। इस बार यहां 11 नवंबर को मतदान होना है।
2020 विधानसभा चुनाव में यहां बीजेपी की निक्की हेंब्रम ने राजद की स्वीटी हेंब्रम को 6,421 वोट से हराया था। वहीं, झारखंड मुक्ति मोर्चा के उम्मीदवार को 5,606 वोट मिले थे। अगर आरजेडी और झामुमो साथ मिलकर यह चुनाव लड़ते तो उनके गठबंधन के उम्मीदवार की जीत तय थी।
कब किसे मिली जीत?
कटोरिया विधानसभा सीट की स्थापना 1951 में हुई थी। इस समय यह सामान्य सीट थी और यहां कांग्रेस का दबदबा था। शुरुआत में कांग्रेस ने भले ही अच्छा प्रदर्शन किया, लेकिन 1990 के बाद से कांग्रेस को यहां जीत नहीं मिली है। 2008 के परिसीमन में इस सीट को अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित कर दिया गया। इसके बाद यहां के समीकरण पूरी तरह बदल गए।
किसका पलड़ा भारी?
कटोरिया में अब बीजेपी और आरजेडी के बीच कांटे की टक्कर रहती है। 2010 में बीजेपी उम्मीदवार को जीत मिली थी तो 2015 में आरजेडी उम्मीदवार ने जीत हासिल की। 2020 में कांटे की टक्कर रही और करीबी अंतर से बीजेपी ने यह सीट जीत ली। हालांकि, 2024 लोकसभा चुनाव के दौरान यहां से आरजेडी उम्मीदवार को बढ़त मिली थी। ऐसे में आरजेडी का पलड़ा भारी नजर आ रहा है, लेकिन उसे झामुमो के साथ तालमेल बनाकर रखना होगा।
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