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विधानसभा चुनाव: मध्य प्रदेश के चुनावी घमासान में ‘सोशल इंजीनियरिंग’ की अहम भूमिका

 Reported By: Bhasha
 Published : Oct 14, 2018 01:10 pm IST,  Updated : Oct 15, 2018 11:44 am IST

अनुसूचित जाति-जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम में संशोधनों के बाद मध्य प्रदेश में 28 नवंबर को होने वाले विधानसभा चुनावों के समीकरण बदल गए हैं।

मध्य प्रदेश के चुनावी घमासान में ‘सोशल इंजीनियरिंग’ की अहम भूमिका- India TV Hindi
मध्य प्रदेश के चुनावी घमासान में ‘सोशल इंजीनियरिंग’ की अहम भूमिका

इंदौर: अनुसूचित जाति-जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम में संशोधनों के बाद मध्य प्रदेश में 28 नवंबर को होने वाले विधानसभा चुनावों के समीकरण बदल गए हैं। इस मुद्दे पर अनारक्षित वर्ग के सिलसिलेवार विरोध प्रदर्शन जारी हैं। जातिगत गोलबंदी के मद्देनजर जानकारों का मानना है कि सियासी दलों को अलग-अलग समुदायों को साधने के लिए चुनावी टिकट वितरण से लेकर प्रचार अभियान तक में ‘सोशल इंजीनियरिंग’ का सहारा लेना पड़ सकता है। जानकारों के मुताबिक, ग्वालियर-चम्बल इलाके, विंध्य क्षेत्र और मालवा-निमाड़ अंचल में जातीय समीकरण चुनाव परिणामों को काफी हद तक प्रभावित कर सकते हैं। 

सम्बद्ध कानूनी बदलावों के खिलाफ पिछले दिनों इन इलाकों में बड़े विरोध प्रदर्शन देखे गए हैं। जातिगत गोलबंदी के चुनावी खतरे का सत्तारूढ़ भाजपा को भी बखूबी अहसास है जो सूबे में लगातार चौथी बार विधानसभा चुनाव जीतने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा रही है। भाजपा के चुनावी रणनीतिकारों में शामिल पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष प्रभात झा ने कहा, ‘सबका साथ, सबका विकास के नारे के मुताबिक, सामाजिक समरसता के लिये हम पहले ही काम रहे हैं और तमाम तबकों का हित चाहते हैं।’ अनुसूचित जाति-जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम में संशोधनों को लेकर अनारक्षित समुदाय के आक्रोश के बारे में पूछे जाने पर झा ने संतुलित टिप्पणी की, ‘लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की आजादी सबको है।’

प्रदेश की कुल 230 विधानसभा सीटों में से 47 सीटें अनुसूचित जनजाति (एसटी) समुदाय के लिए आरक्षित हैं, जबकि 35 सीटों पर अनुसूचित जाति (एससी) वर्ग को आरक्षण प्राप्त है। यानी सामान्य सीटों की तादाद 148 है। इस बीच, अनारक्षित समुदाय और आदिवासी वर्ग के 2 नए संगठनों के मैदान में उतरने के कारण जातिगत वोटों के बंटवारे की चुनावी जंग और भीषण होती नजर आ रही है। इन संगठनों में शामिल सामान्य, पिछड़ा वर्ग एवं अल्पसंख्यक कल्याण समाज संस्था (सपाक्स) ने सूबे की सभी 230 विधानसभा सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारने की घोषणा की है।

अनारक्षित समुदाय की नुमाइंदगी करने वाले संगठन के प्रमुख हीरालाल त्रिवेदी ने कहा, ‘हम चाहते हैं कि अनुसूचित जाति-जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम में संशोधनों को फौरन वापस लिया जाए। इसके साथ ही, समाज के सभी तबकों के लोगों को शिक्षा संस्थानों और सरकारी नौकरियों में आर्थिक आधार पर आरक्षण दिया जाए।’ सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी ने कहा कि सपाक्स की मांग है कि देश भर में सरकार की किसी भी योजना के हितग्राहियों का चयन जाति के आधार पर नहीं किया जाए और सभी वर्गों के वंचित लोगों को शासकीय कार्यक्रमों का समान लाभ दिया जाये।

उधर, राज्य में जनजातीय समुदाय के दबदबे वाली 80 विधानसभा सीटों पर दम-खम आजमाने की तैयारी कर रहे संगठन जय आदिवासी युवा शक्ति (जयस) के संरक्षक हीरालाल अलावा ने कहा कि मौजूदा आरक्षण प्रणाली से किसी भी किस्म की छेड़-छाड़ बर्दाश्त नहीं की जाएगी। अलावा, नयी दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में सहायक प्रोफेसर की नौकरी छोड़कर सियासी मैदान में उतरे हैं। उन्होंने कहा, ‘देश में अब भी बड़े पैमाने पर सामाजिक और आर्थिक असमानताएं हैं। सुदूर इलाकों में रहने वाले आदिवासी बुनियादी सुविधाओं के लिये तरस रहे हैं। ऐसे में आरक्षण प्रणाली के मामले में यथास्थिति बनाये रखने की जरूरत है।’

वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक गिरिजाशंकर का कहना है कि अनुसूचित जाति-जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम में संशोधनों के बाद उभरे हालात सूबे के चुनावी इतिहास के लिहाज से ‘असामान्य’ हैं। उन्होंने कहा, ‘राज्य में चुनावों के दौरान जातिगत समीकरण तो पहले भी रहे हैं। लेकिन इतनी मुखर जातिगत गोलबंदी पहली बार दिखायी दे रही है। इस स्थिति ने सभी राजनीतिक दलों को सकते में ला दिया है। सियासी पार्टियां इस बारे में रुख स्पष्ट करने में स्वाभाविक कारणों से डर रही हैं कि संबद्ध कानूनी संशोधनों के मसले में वे आरक्षित और अनारक्षित वर्ग में से किस तबके के साथ हैं।’

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