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अमृता प्रीतम के उपन्यास पिंजर में बसा है बंटवारे का दर्द, बॉलीवुड में बनी फिल्म भी

 Published : Aug 31, 2019 11:05 am IST,  Updated : Aug 31, 2019 11:05 am IST

अपने उपन्यास में अमृता कहती हैं - एक भी लड़की ठिकाने पहुंच गई तो समझ लेना कि पूरो की आत्मा ठिकाने पहुंच गई। बंटवारे के समय गर्भवती थी अमृता प्रीतम

Amrita Pritam- India TV Hindi
Amrita Pritam Image Source : GOOGLE

पंजाबी Punjabi और हिंदी में उपन्यास लिखकर पाकिस्तान और हिंदुस्तान Hindustan की औरतों की त्रासदी को मुखर करने वाली अमृता प्रीतम की आज बर्थ एनिवर्सरी है। सौ साल पहले 1919 मे आज ही के दिन अमृता पाकिस्तान में पैदा हुई थी। बंटवारे का दर्द सहने के बाद अमृता ने औरतों की त्रासदी और हालात पर कई उपन्यास लिखे और वो बहुत मशहूर हुए। अमृता को सरहद पर जन्मी कलम की सिपाही कहा जाता था।

यूं तो अमृता अपने किस्से कहानियों में औरत के मन और उसकी जिजीविषा को टटोलकर उसे पन्ने पर उतार देती थी। अमृता ने पिंजर नाम का मशहूर उपन्यास लिखा था जिसमें बंटवारे के बाद पाकिस्तान में फंसी रह गई लड़की पूरो की कहानी थी। इसी विषय पर डॉक्टर चंद्रप्रकाश द्विवेदी ने हिंदी फिल्म Film पिंजर बनाई जो सुपरहिट रही। 

इस फिल्म में उर्मिला मातोंडकर ने पूरो का किरदार निभाया था और उनके साथ थे मनोज वाजपेयी। फिल्म की कहानी इस तरह थी कि बंटवारे से ऐन पहले हिंदू युवती पूरो की सगाई रामचंद्र के साथ होती है। सगाई के एकदम बाद बंटवारे के दंगे हो जाते हैं और पूरो को एक मुसलमान युवक उठाकर ले जाता है और जबरन निकाह कर लेता है। जबरन निकाह और बंधन के बाद पूरो मां बनती है लेकिन वो मुसलिम युवक को धोखेबाज मानकर कभी स्वीकार नहीं कर पाती। 

उधर उसके भाई की प्रेयसी को भी दंगों के दौरान उठा लिया जाता है। बेदम जिंदगी जी रही पूरो जान पर खेलकर उस लड़की को बचाकर अपने भाई के सपुर्द कर देती है, लेकिन मौका होने पर भी वो भाई के  साथ अपने घर नहीं लौटती ये कहते हुए कि कि कोई भी हिंदू या मुसलमान लड़की अपने ठिकाने पहुंच गई तो समझना कि पूरो की आत्मा ठिकाने पहुंच गई। 

अमृता का एक और उपन्यास था सागर ते सीपियां, जिस पर 70 के दौर में शबाना आजमी को हीरोइन लेकर फिल्म बनाई गई थी लेकिन ये फिल्म उतनी फेमस नहीं हो पाई। इस फिल्म में भी महिला की दुविधा और अंत में उसके समझदारी  भरे फैसले को विषय बनाया गया था। 

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