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Women’s day Special: परदे के पीछे की वो नायिकायें जिन्होंने बदल दिया सिनेमा का मतलब

 Published : Mar 08, 2017 04:10 pm IST,  Updated : Mar 08, 2017 04:21 pm IST

निर्देशन में भी कई महिलाएं ऐसी हैं जिन्होंने बॉलीवुड में अपनी खास जगह बनाई है। महिला दिवस के मौके पर हम कुछ ऐसी ही महिला निर्देशकों के बारे में आपको बताने जा रहे हैं जिन्होंने फिल्मों में पुरुष मोनोपोली को तोड़ते हुए कई कीर्तिमान स्थापित किए हैं।

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नई दिल्ली: भारतीय सिनेमा तेजी से उभर रहा है, अब बॉलीवुड में भी लीक से हटकर फिल्में बनने लगी हैं और भारतीय सिनेमा अब उन अनछुए मुद्दों को उठा रहा है जो पहले हिंदी सिनेमा में अछूते थे। स्त्री हो या पुरुष सब बराबर मेहनत कर रहे हैं, और सभी को समान अवसर मिल रहा है। सिर्फ अभिनय में ही नहीं निर्देशन में भी कई महिलाएं ऐसी हैं जिन्होंने बॉलीवुड में अपनी खास जगह बनाई है। बॉलीवुड में महिला निर्देशकों को स्थापित होने में काफी वक्त लगा, और इनकी संख्या भी बेहद कम है। लेकिन इन महिला निर्देशकों ने ऐसी फिल्में दी हैं कि उन्हें अनदेखा तो कत्तई नहीं किया जा सकता है।

Women's day Special: वक्त के साथ बदलतीं छोटे परदे की बेटियां !

महिला दिवस के मौके पर हम कुछ ऐसी ही महिला निर्देशकों के बारे में आपको बताने जा रहे हैं जिन्होंने फिल्मों में पुरुष मोनोपोली को तोड़ते हुए कई कीर्तिमान स्थापित किए हैं।

फातिमा बेगम बॉलीवुड की पहली महिला निर्देशक मानी जाती हैं। 1926 में फातिमा बेगम ने फिल्मों में निर्देशक के तौर पर काम शुरू किया। उसके बाद अरुणा राजे, अपर्णा सेन ने भी फिल्म निर्देशन में काम किया। लेकिन हाल के वर्षों में कई ऐसी महिला निर्देशक हैं जिन्होंने हिंदी सिनेमा में अपनी स्थिति दर्ज करा दी है।

फराह खान:

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जब महिला निर्देशकों की बात हो तो सबसे पहला नाम फराह खान का आता है। फराह न केवल अच्छी कोरियोग्राफर हैं, फिल्म निर्देशक के तौर पर उन्होंने ‘मैं हूं ना’ और ओम शांति ओम जैसी फिल्में बनाकर काफी वाहवाही बटोरी हैं।

गौरी शिंदे:

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पुणे से मास कॉम में स्नातक करने वाली गौरी शिंदे भी बॉलीवुड की जानी मानी निर्देशक हैं। गौरी शिंदे ने ‘इंग्लिश-विंग्लिश’ और ‘डिअर जिंदगी’ जैसी लीक से हटकर फिल्म बनाकर ये साबित कर दिया कि आज की महिला निर्देशिका किसी से कम नहीं हैं।

जोया अख्तर:

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मशहूर लेखक-गीतकार जावेद अख्तर की बेटी और अभिनेता-निर्देशक फरहान अख्तर की बहन होने के बावजूद जोया अख्तर ने अपनी अलग पहचान बनाई है। ‘जिंदगी ना मिलेगी दोबारा’, ‘दिल धड़कने दो’ और ‘बॉम्बे टॉकीज’ फिल्मों को निर्देशन करके जोया ने बॉलीवुड मे अपनी एक अलग पहचान बनाई है।

मेघना गुलजार:

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लेखक-गीतकार पिता गुलजार की बेटी मेघना गुलजार भी एक प्रतिभाशाली निर्देशिका हैं। 2002 में ‘फिलहाल’ फिल्म के लिए मेघना को काफी तारीफें मिली, फिर 2007 में ‘जस्ट मैरिड’ और फिर 2015 में ‘तलवार’ जैसी फिल्में बनाकर मेघना ने अपना नाम एक बेहतरीन निर्देशिका के तौर पर दर्ज करा लिया है।

दीपा मेहता:

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बॉलीवुड की महिला निर्देशिकाओं का जिक्र हो और दीपा मेहता का नाम ना आए ये कैसे हो सकता है? दीपा ने अनूठी स्क्रिप्ट और चुस्त निर्देशन के जरिए कम ही समय में सिनेमा के क्षेत्र में ऊंचाईयों को छुआ है। उन्हें फिल्म ‘वॉटर’, ‘मिडनाइट्स चिल्ड्रेन’, ‘बीबा ब्वॉयज’ और ‘अर्थ’ के लिए काफी सराहना मिली थी।

तनुजा चंद्रा:

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निर्देशिका तनुजा चंद्रा ने ‘दुश्मन’, ‘संघर्ष’, ‘ये जिंदगी का सफर’, ‘सुर’, ‘फिल्म स्टार’, ‘जिंदगी रॉक्स’ और ‘होप एंड अ लिटल शुगर’ जैसी फिल्में करके अपनी अलग पहचान बनाई है। तनुजा ने ना सिर्फ फिल्मों का निर्देशन किया है वो कई सुपरहिट फिल्मों की कहानियां भी लिख चुकी हैं। ‘दिल तो पागल है’ और ‘जख्म’ जैसी हिट फिल्मों की कहानियां तनुजा चंद्रा ने ही लिखी हैं।

रीमा कागती:

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‘लगान’, ‘दिल चाहता है’ और ‘जिंदगी ना मिलेगी’ दोबारा जैसी फिल्मों की असिस्टेंट डायरेक्टर रह चुकी रीमा कागती ने साल 2007 में हनीमून ट्रैवेल प्राइवेट लिमिटेड फिल्म बनाई। उसके बाद साल 2012 में रीमा ने आमिर खान को लेकर ‘तलाश’ फिल्म बनाई।

इनके अलावा किरण राव, अनुषा रिजवी, राजश्री और भावना तलवार जैसे अनेकों नाम हैं, जिन्हें लीक से हटकर फिल्में बनाने के लिए जाना जाता है। अनुषा रिजवी को उनकी फिल्म ‘पीपली लाइव’ के लिए काफी सराहना मिली थी। महिला निर्देशक मीरा नायर, गुरिंदर चड्ढा, दीपा मेहता और मंजू बरुआ ने विश्वसिनेमा में भी अपनी पहचान बनाई।

इन्हें देखकर उम्मीद तो यही की जा सकती है कि बॉलीवुड की फिल्में सुरक्षित हाथों में है, और आने वाले वक्त में हिंदी सिनेमा की ये महिला निर्देशिकायें अपना कद और ऊंचा करेंगी।

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