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मार्शल आर्ट्स से एक्टिंग और फिल्म मेकिंग में एंट्री, फिर भी देव आनंद के साए में नहीं चमकी सुनील की किस्मत, जिंदगी भर सहेजते रहे पिता की विरासत

 Written By: Jaya Dwivedie @JDwivedie
 Published : Jul 29, 2026 03:47 pm IST,  Updated : Jul 29, 2026 03:47 pm IST

हिंदी सिनेमा के दिग्गज देव आनंद के बेटे और 'नवकेतन फिल्म्स' की विरासत संभालने वाले अभिनेता-निर्देशक सुनील आनंद का 70 वर्ष की आयु में निधन हो गया। असफल अभिनय करियर के बावजूद वह जीवनभर पिता की सिनेमाई धरोहर को सहेजने में समर्पित रहे।

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देव आनंद और सुनील आनंद। Image Source : VIRAL BHAYANI/INSTAGRAM

किसी महान और दिग्गज पिता के साये में अपनी अलग पहचान बनाना कभी आसान नहीं होता। हिंदी सिनेमा के महान अभिनेता और फिल्मकार देव आनंद के इकलौते बेटे सुनील आनंद ने अपने पूरे करियर में इस दबाव को बखूबी महसूस किया। अभिनेत्री कल्पना कार्तिक और देव आनंद के घर जन्मे सुनील का बचपन और पूरा जीवन फिल्मों, जाने-माने कलाकारों और देश के बड़े फिल्म निर्माताओं के बीच बीता। 26 जुलाई 2026 को लंदन में दिल का दौरा पड़ने के कारण 70 वर्ष की आयु में सुनील आनंद का निधन हो गया। उनके निधन के बाद उनके संक्षिप्त अभिनय करियर, एक मुख्य अभिनेता के रूप में खुद को स्थापित करने के उनके संघर्ष और अपने पिता की सिनेमाई विरासत को सहेजने के प्रति उनके समर्पण की चर्चा एक बार फिर से शुरू हो गई है।

हिंदी सिनेमा के विख्यात आनंद परिवार में जन्म

सुनील आनंद का जन्म वर्ष 1956 में स्विट्जरलैंड के ज्यूरिख शहर में हुआ था। वह भारतीय सिनेमा के सबसे प्रतिष्ठित परिवारों में से एक से ताल्लुक रखते थे। उनके चाचा चेतन आनंद और विजय आनंद देश के अग्रणी और प्रशंसित निर्देशकों में गिने जाते थे, जबकि प्रसिद्ध फिल्म निर्माता शेखर कपूर भी उनके करीबी रिश्तेदारों में शामिल थे। फिल्मों में कदम रखने से पहले सुनील ने अपनी शिक्षा पर ध्यान दिया। उन्होंने वाशिंगटन डीसी स्थित अमेरिकन यूनिवर्सिटी से बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन में डिग्री प्राप्त की। भारत लौटने के बाद उन्होंने तुरंत अभिनय में उतरने के बजाय अपने पिता देव आनंद के साथ कई फिल्मों में बतौर सहायक निर्देशक काम किया और फिल्म निर्माण की बारीकियों को समझा।

'आनंद और आनंद' से धमाकेदार लॉन्चिंग, पर नहीं मिला मनचाहा रिजल्ट

देव आनंद ने वर्ष 1984 में निर्मित अपनी फिल्म 'आनंद और आनंद' से अपने बेटे सुनील को बतौर मुख्य अभिनेता बॉलीवुड में लॉन्च किया। इस पारिवारिक ड्रामा फिल्म में खुद देव आनंद, राखी, स्मिता पाटिल और विश्वजीत चटर्जी जैसे दिग्गज कलाकार शामिल थे। इतने बड़े और मशहूर कलाकारों की मौजूदगी के बावजूद यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर कोई खास कमाल नहीं दिखा सकी। इसके बाद सुनील को वर्ष 1986 में फिल्म 'कार थीफ' में काम करने का मौका मिला, जिसमें वह अभिनेत्री विजयेता पंडित के विपरीत नजर आए। बाद में उन्होंने अपने चाचा विजय आनंद के निर्देशन में बनी फिल्म 'मैं तेरे लिए' में मीनाक्षी शेषाद्रि के साथ काम किया। हालांकि इन फिल्मों से भी उनके अभिनय करियर को वह रफ्तार नहीं मिल सकी जिसकी उम्मीद की जा रही थी।

मार्शल आर्ट्स सीखा और बनाई अपनी फिल्म

अभिनय से काफी समय तक दूर रहने के बाद, सुनील आनंद ने वर्ष 2001 में फिल्म 'मास्टर' से फिर से वापसी करने का प्रयास किया। इस फिल्म में उन्होंने न केवल मुख्य भूमिका निभाई, बल्कि इसका निर्देशन भी खुद ही किया। इस मार्शल आर्ट्स आधारित प्रोजेक्ट के लिए उन्होंने काफी मेहनत की थी और हांगकांग जाकर विंग चुन मार्शल आर्ट्स का कड़ा प्रशिक्षण भी लिया था। उनकी यह वापसी भी व्यावसायिक रूप से सफल नहीं हो सकी, जिससे एक मुख्यधारा के अभिनेता और निर्देशक के रूप में उनकी यात्रा पर विराम लग गया। बाद में उन्होंने गोवा के ड्रग कारोबार की पृष्ठभूमि पर आधारित वागाटोर मिक्सर नामक एक अंतरराष्ट्रीय प्रोजेक्ट की घोषणा की थी, लेकिन निर्माताओं के बीच हुए विवादों के कारण यह फिल्म कभी रिलीज नहीं हो सकी।

पिता देव आनंद के प्रति अटूट निष्ठा और सम्मान

भले ही सुनील आनंद अपने पिता की तरह अभूतपूर्व स्टारडम और सफलता हासिल नहीं कर सके, लेकिन वह हमेशा अपने पिता के प्रति बेहद समर्पित रहे। अपने पिता के बारे में बात करते हुए सुनील ने एक बार कहा था कि देव आनंद न केवल एक महान कलाकार थे, बल्कि वह एक बेहद अध्ययनशील और जानकार व्यक्ति भी थे, जो किसी भी महफिल में किसी भी विषय पर बात करने का हुनर रखते थे। उन्होंने हमेशा अपने पिता को अपनी प्रेरणा का स्रोत माना और उनकी सिनेमाई विरासत को आगे बढ़ाने का संकल्प लिया। वर्ष 2008 में जब देव आनंद की क्लासिक फिल्म 'गाइड' का डिजिटल रेस्टोरेशन किया गया तो सुनील ही उसे कान फिल्म फेस्टिवल में लेकर गए थे। इसके साथ ही उन्होंने पारिवारिक प्रोडक्शन हाउस नवकेतन फिल्म्स की जिम्मेदारी भी संभाली। आकिर के दिनों में सुनील आनंद सार्वजनिक जीवन और मीडिया की चमक-धमक से दूर हो गए थे और केवल विशेष अवसरों पर ही दिखाई देते थे। भले ही उनका फिल्मी करियर उनके पिता की विशाल सफलताओं के सामने छोटा रहा हो, लेकिन नवकेतन फिल्म्स के इतिहास और आनंद परिवार की सांस्कृतिक विरासत को जीवित रखने में उनका योगदान हमेशा याद रखा जाएगा।

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