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'कालीधर लापता' की आत्मा भी नहीं कोई पता! KD से न होगा प्यार, न नफरत, जानें कैसी है अभिषेक बच्चन की फिल्म

 Written By: जया द्विवेदी
 Published : Jul 04, 2025 01:30 pm IST,  Updated : Jul 04, 2025 01:30 pm IST

'कालीधर लापता' आज ओटीटी प्लेटफॉर्म जी 5 पर रिलीज हो गई है। ये फिल्म साउथ की एक मूवी का रीमेक है। इसमें अभिषेक बच्चन और दैविक बघेला लीड रोल में नजर आ रहे हैं। फिल्म कैसी है जानें।

Kaalidhar Laapata
अभिषेक बच्चन और दैविक भगेला। Photo: INSTAGRAM
  • फिल्म रिव्यू: कालीधर लापता
  • स्टार रेटिंग 2.5/5
  • पर्दे पर: 04.07.2025
  • डायरेक्टर: मधुमिता
  • शैली: इमोशनल ड्रामा

मुंबई की सड़कों से लेकर कुंभ के अराजक जनसागर तक फैली हुई 'कालीधर लापता' एक ऐसी फिल्म बनना चाहती है जो हमारे दिलों को छू ले, हमारे जहन में रह जाए, लेकिन अफसोस, यह खुद अपनी स्क्रिप्ट में कहीं खो जाती है। मधुमिता द्वारा निर्देशित और अभिषेक बच्चन द्वारा संवारा गया ये सिनेमाई प्रयास त्याग, खुद की खोज और मानवीय जुड़ाव के बड़े विचारों पर टिकना चाहती है, लेकिन यह सब कुछ करते हुए कहीं खो जाती है। यह फिल्म किसी पुराने ट्रंक की तरह है, ऊपर से खूब सजावट, लेकिन अंदर की चीजें उलझी, बेतरतीब और आधी-अधूरी।

कहानी जो रास्ता भूल गई

कालीधर (अभिषेक बच्चन), एक आदमी जो अपने अतीत, पहचान और प्रियजनों के बीच उलझा हुआ है। अपने ही लालची घरवालों के द्वारा कुंभ मेले की भीड़ में छोड़ दिया गया है। एक ऐसा मेले का दृश्य, जहां हर मिनट कोई न कोई खो जाता है, लेकिन कालीधर सिर्फ भीड़ में नहीं, खुद में खो गया है। फिर आती है उसकी जिंदगी की सबसे प्यारी 'मिला-जुली' किस्मत यानी बल्लू (दैविक भगेला)। एक 8 साल का अनाथ, जो अपनी मासूमियत में जिंदगी की सबसे जटिल बातों को भी बड़ी सहजता से समझता है। जहां कालीधर खोए हुए पलों को तलाशता है, बल्लू उसे वर्तमान की गर्मजोशी देता है। फिल्म का सबसे दिल छू लेने वाला पहलू यही है। एक बूढ़ा बच्चा और एक बच्चा जो जिंदगी में बुजुर्गों जितना अनुभव रखता है।

खोए हुए किरदार में छुपा हुआ अभिनेता

अभिषेक बच्चन ने कुछ बेहद उम्दा पलों में अभिनय का जादू दिखाया है। एक दृश्य में जब वह बुरे सपने से चौंककर जागते हैं और बल्लू को खोने के डर से कांपते हैं- वह डर, वह खालीपन, वह घबराहट, जैसे पर्दा हटा हो और अभिनेता की आत्मा दिख रही हो। एक और दृश्य, जहां शराब और असहायता में लिपटे कालीधर की टूटन दिखती है, वो भी असरदार है, लेकिन अफसोस, ये क्षण क्षणिक रह जाते हैं। स्क्रिप्ट उन्हें न तो पर्याप्त संवाद देती है, न ही एक भावनात्मक यात्रा। उनका किरदार शुरुआत में खोया लगता है और अंत तक भी उतना ही खोया रहता है, बस कैमरा थोड़ा ज्यादा पास आ जाता है।

बल्लू के रूप में दैविक भगेला वो धूप की किरण हैं जो इस भावनात्मक कोहरे से भरी फिल्म में किसी चमत्कार की तरह चमकते हैं। उनका संवाद, उनकी हंसी, उनके आंसू, सब इतना स्वाभाविक है कि उनको पटकथा से बड़ा और सच्चा महसूस किया जा सकता है। बल्लू वो किरदार है जो आपको बार-बार सोचने पर मजबूर करेगा कि अगर एक बच्चा इतने दर्द के बाद भी मुस्कुरा सकता है तो हम क्यों नहीं?

मोहम्मद जीशान अयूब जैसे प्रतिभाशाली अभिनेता को फिल्म में जो रोल मिला है, वह जैसे जबरन ठूंसा गया हो। उनका सबप्लॉट, जो लापता लोगों को ढूंढने का है न तो कहीं जाता है, न दर्शक के दिल में कोई असर छोड़ता है। अंत में लगता है कि उन्हें कहानी में रखने का मकसद ही गुम हो गया। वो किसी नतीजे पर ही नहीं पहुंचते। ऐसे में इतने शानदार और प्रभावी एक्टर की एक्टिंग देखने ही नहीं मिलती।

फिल्म की सबसे बड़ी समस्या

‘कालीधर लापता’ में कई थालियां परोसी जाती हैं, पारिवारिक विश्वासघात, सामाजिक न्याय, अनाथत्व, स्मृति हानि, आध्यात्मिक भटकाव, लेकिन कोई भी थाली पूरी नहीं होती। हर विषय छुआ जाता है, पर किसी में भी डूबा नहीं जाता। फिल्म का टोन भी स्थिर नहीं है, कभी यह ‘तारे जमीं पर’ जैसी मासूमियत को छूती है, कभी ‘ब्लैक फ्राइडे’ की तरह भावनात्मक गहराई दिखाने की कोशिश करती है और अंत में ‘लापता’ ही हो जाती है। ये एक पहचानहीन प्रयोग बनकर रह गई है।

उम्मीद की कुछ किरणें

कभी-कभी फिल्म के दृश्य बेहद खूबसूरत लगते हैं। कुंभ मेले की भीड़, बल्लू और कालीधर का ट्रेन की छत पर सफर या फिर किसी मंदिर की घंटियों के बीच शांति की तलाश, कैमरे का काम अच्छा है। संगीत भी कभी-कभी भावनाओं को पकड़ने की कोशिश करता है, लेकिन कहानी की उथली पकड़ उसे टिकने नहीं देती। 

कैसी है फिल्म

कालीधर लापता एक ऐसी फिल्म है जो "गहराई" का भ्रम पैदा करती है, लेकिन वास्तव में वह एक उथले तालाब सी है जिसमें कंकड़ तो फेंका गया है, लेकिन लहरें नहीं बनतीं। यह फिल्म उन लोगों के लिए हो सकती है जो क्षणिक संवेदनाओं में तसल्ली ढूंढते हैं, लेकिन अगर आप एक ठोस, बहुपरत, इमोशनल सफर की उम्मीद कर रहे हैं, तो आप खुद को उसी तरह भटका पाएंगे जैसे फिल्म का मुख्य किरदार। देखिए अगर आप दैविक भगेला का दिल को छू लेने वाला अभिनय देखना चाहते हैं। अभिषेक बच्चन की अभिनय यात्रा का एक नया अध्याय टटोलना चाहते हैं तो इस फिल्म को एक मौका दे सकते हैं। एक संगठित, गहरी, और संतुलित कहानी की तलाश में हैं और हर किरदार से जुड़ने की उम्मीद रखते हैं तो ये कहानी निराशा स्वाद चखाएगी। 'लाइफ ऑफ पाई', 'द काइट रनर' या 'तारे जमीं पर' जैसी फिल्म होने की इससे उम्मीद करना मासूसी के सिवा कुछ नहीं देगी।

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