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लस्ट स्टोरीज 3 रिव्यू: चार कहानियां, चाहत के कई रंग, कहीं शानदार असर तो कहीं फीकी पड़ी कहानी

 Written By: Anindita Mukhopadhyay
 Published : Sep 18, 2026 05:32 pm IST,  Updated : Sep 18, 2026 05:32 pm IST

‘लस्ट स्टोरीज 3’ चार अलग-अलग कहानियों के जरिए इच्छा, रिश्ते, शादी, तलाक और महिला कामुकता को नए नजरिए से दिखाती है। कुछ सेगमेंट बेहद प्रभावशाली हैं, जबकि कुछ उम्मीद के मुताबिक असर नहीं छोड़ते।

lust stories
लस्ट स्टोरीज 3 Photo: IMDB
  • फिल्म रिव्यू: लस्ट स्टोरीज 3
  • स्टार रेटिंग 3/5
  • पर्दे पर: 18/09/2026
  • डायरेक्टर: विक्रमादित्य मोटवानी, किरण राव, शकुन बत्रा विशाल भारद्वाज
  • शैली: रोमांटिक ड्रामा

नेटफ्लिक्स की ‘लस्ट स्टोरीज’ फ्रेंचाइजी में हमेशा से कुछ ऐसा रहा है, जो इसे बाकी फिल्मों से अलग बनाता है। यह बेबाक है, अपने मुद्दों को लेकर खुलकर बात करती है और अपनी बात कहने से पीछे नहीं हटती। इसके पहले दो सीजन में भी ऐसी कहानियां देखने को मिली थीं, जिन्होंने इच्छा, रिश्तों और महिला कामुकता जैसे विषयों को बिना किसी झिझक के पर्दे पर रखा। इन मुद्दों को ऐसा नहीं बनाया गया, जैसे इनके बारे में बात करना किसी तरह की मनाही हो। अब ‘लस्ट स्टोरीज 3’ चार नई कहानियों के साथ सामने आई है। इस बार विक्रमादित्य मोटवानी, किरण राव, शकुन बत्रा और विशाल भारद्वाज जैसे चार अलग-अलग फिल्ममेकर अपनी-अपनी शैली में कहानियां लेकर आए हैं। कलाकारों की लिस्ट भी काफी दिलचस्प है। इसमें राधिका आप्टे, कोंकणा सेन शर्मा, विजय वर्मा, अभिषेक बनर्जी, गुरफतेह पीरजादा, सना थंपी, राधिका मदान, अली फजल, अदिति राव हैदरी और सिद्धार्थ नजर आते हैं। इतनी बड़ी स्टारकास्ट और चार अलग-अलग फिल्ममेकर्स की मौजूदगी से उम्मीदें भी बढ़ जाती हैं,  लेकिन क्या ‘लस्ट स्टोरीज 3’ उन उम्मीदों पर खरी उतरती है? पूरी तरह नहीं। कुछ कहानियां बेहद खूबसूरती से अपना असर छोड़ती हैं, जबकि कुछ ऐसी हैं जिन्हें देखने के बाद लगता है कि इन्हें थोड़ा और बेहतर तरीके से पेश किया जा सकता था। पूरा रिव्यू जानने के लिए नीचे स्क्रोल करें।

विक्रमादित्य मोटवानी की कहानी में आइडिया तो दमदार, लेकिन असर कम

राधिका आप्टे, कोंकणा सेन शर्मा, विजय वर्मा और अभिषेक बनर्जी जैसे कलाकारों को एक साथ लेकर आना अपने आप में दिलचस्प है। ऊपर से निर्देशन की जिम्मेदारी विक्रमादित्य मोटवानी के पास हो तो उम्मीद स्वाभाविक रूप से काफी बढ़ जाती है। हालांकि चारों कहानियों में से इसे सबसे बेहतर कहना थोड़ा मुश्किल है। इस कहानी में कई दिलचस्प विचार हैं। इसमें महिलाओं और महिला सुख को केंद्र में रखा गया है और यह दिखाने की कोशिश की गई है कि महिलाओं की इच्छाओं को अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है। कहानी में फैंटेसी, दोस्ती और पार्टनर स्वैपिंग जैसे पहलू भी शामिल हैं। इसके अलावा कोरियाई शोज से प्रेरणा की झलक भी दिखाई देती है।

कागज पर यह सब काफी मजेदार और दिलचस्प लगता है। लेकिन कहानी आगे बढ़ते-बढ़ते अपना कुछ असर खो देती है। एक साथ कई चीजें होती रहती हैं, फिर भी कहीं न कहीं ऐसा लगता है कि कुछ कमी रह गई। कलाकारों ने अच्छा काम किया है और विचार भी दिलचस्प हैं, लेकिन उनका इस्तेमाल उस स्तर पर नहीं हो पाता, जिसकी उम्मीद इतने बेहतरीन कलाकारों और निर्देशक से होती है। यह सेगमेंट खराब नहीं है, बस लगता है कि इसे इससे कहीं ज्यादा प्रभावशाली बनाया जा सकता था।

किरण राव की कहानी धीरे-धीरे खोलती है अपने पत्ते

गुरफतेह पीरजादा और डेब्यू कर रहीं सना थंपी, किरण राव की कहानी का हिस्सा हैं। चारों कहानियों में यह शायद सबसे ज्यादा भ्रम पैदा करने वाली कहानी है। शुरुआत में आपको कुछ देर के लिए समझ ही नहीं आता कि किरण राव आखिर किस दिशा में कहानी को ले जा रही हैं। मन में यह सवाल भी आ सकता है कि क्या यह वही फिल्ममेकर हैं जिन्होंने ‘धोबी घाट’, ‘डेल्ही बेली’ और ‘लापता लेडीज’ जैसी फिल्में दी हैं? कहानी अपने असली मकसद तक पहुंचने में समय लेती है। शुरुआती करीब 10 मिनट में ऐसा भी लग सकता है कि कहानी अपने मुख्य प्लॉट से भटक रही है, लेकिन यहां थोड़ा धैर्य रखना जरूरी है। इस कहानी में वासना या इच्छा सिर्फ अंतिम मंजिल नहीं है, बल्कि कहानी को आगे बढ़ाने का एक जरिया है। किरण राव इसके माध्यम से महिलाओं, ताकत, फैसलों और धोखे जैसे पहलुओं को सामने रखती हैं। जो कहानी शुरुआत में एक मुद्दे पर केंद्रित लगती है, वह धीरे-धीरे कई दूसरे स्तर खोलने लगती है। जब कहानी के अलग-अलग हिस्से आपस में जुड़ने लगते हैं, तब यह काफी ज्यादा दिलचस्प हो जाती है। इसे समझने के लिए थोड़ा इंतजार करना पड़ता है, लेकिन आखिरकार यह इंतजार बेकार नहीं जाता।

शकुन बत्रा ने आधुनिक शादी और तलाक की खामोशी को पकड़ा

‘लस्ट स्टोरीज 3’ में असली लय शकुन बत्रा की कहानी के दौरान महसूस होती है। राधिका मदान और अली फजल ने शानदार अभिनय किया है। आधुनिक रिश्तों की जटिलताओं को पर्दे पर उतारने में शकुन बत्रा पहले भी अपनी पकड़ दिखा चुके हैं और यहां भी वह अपने परिचित क्षेत्र में काफी सहज नजर आते हैं। ‘गहराइयां’ के बाद एक बार फिर वह ऐसे रिश्ते को देखते हैं, जो बिल्कुल सीधा और आसान नहीं है। इस बार कहानी का केंद्र तलाक है। इस सेगमेंट की खास बात यह है कि किरदारों की भावनाएं समझाने के लिए शकुन बत्रा को बड़े-बड़े संवादों की जरूरत नहीं पड़ती। वह जगह, खामोशी और छोटी-छोटी विजुअल डिटेल्स के जरिए बहुत कुछ कह देते हैं। कहानी में सीढ़ियों का इस्तेमाल इसका खूबसूरत उदाहरण है। तलाक से गुजर रहे एक कपल को छह महीने का कूलिंग-ऑफ पीरियड मिलता है। जब दोनों सीढ़ियों से नीचे उतरते हैं, तो ऐसा लगता है जैसे उनका रिश्ता भी धीरे-धीरे नीचे जा रहा हो। वहीं उसी सीढ़ी पर एक नया शादीशुदा कपल अपनी शादी रजिस्टर कराने के लिए ऊपर की ओर जाता दिखाई देता है।

एक और सीन में अली फजल का किरदार ट्रैफिक में बैठा अपनी अलग रह रही पत्नी के बारे में सोच रहा होता है। वह सोचता है कि सुनवाई के बाद उसकी पत्नी घर लौटकर अपना सामान लेने आएगी। इसी दौरान कैमरा पीछे हटता है और बैकग्राउंड में सगाई की अंगूठी का विज्ञापन दिखाई देता है। ये छोटी-छोटी चीजें देखने में मामूली लग सकती हैं, लेकिन कहानी खत्म होने के बाद भी याद रहती हैं। इस कहानी में कोई बड़ा टकराव या जोरदार बहस नहीं है। इसके बजाय दो ऐसे लोगों की रोजमर्रा की बातचीत है, जो कभी एक-दूसरे से प्यार करते थे और अब अपनी जिंदगी को अलग करने की कोशिश कर रहे हैं। पूरे सेगमेंट में एक अजीब सी खालीपन की भावना है, लेकिन उसके नीचे कहीं न कहीं प्यार अभी भी मौजूद है। यही इसे दुखद, असहज और एक साथ खूबसूरत बनाता है।

विशाल भारद्वाज की कहानी में दिखती है उनकी खास सिनेमाई दुनिया

क्या विशाल भारद्वाज की कोई फिल्म कभी पेंटिंग जैसी नजर नहीं आएगी? शायद नहीं। और यही उनकी फिल्मों की खूबसूरती भी है। अदिति राव हैदरी और सिद्धार्थ की जोड़ी वाली यह कहानी चारों सेगमेंट में सबसे लंबी है। साथ ही विजुअली भी यह सबसे ज्यादा आकर्षक हिस्सों में से एक है। कहानी का बैकग्राउंड लखनऊ है। यहां एक महिला अपनी इच्छाओं को एक किताब में लिखती है। लेकिन एक दिन उसकी वह किताब चोरी हो जाती है। इसके बाद यही घटना पूरी कहानी को आगे बढ़ाने का काम करती है। इस कहानी की खूबसूरती उस दुनिया में है, जिसे विशाल भारद्वाज अपने तरीके से तैयार करते हैं। हर चीज बेहद सोच-समझकर रखी गई लगती है। सेट्स में पेंटिंग जैसा एहसास है और किरदार भी ऐसे लगते हैं, जैसे वे उसी फ्रेम का हिस्सा हों। एक खास सीन में अदिति सफेद साड़ी पहनकर घर में दौड़ती नजर आती हैं। उनके होंठों पर लाल लिपस्टिक है और बालों में लाल गुलाब लगा है। यह दृश्य बेहद खूबसूरत लगता है। फिल्म का बैकग्राउंड जानबूझकर थोड़ा उदास और फीका रखा गया है, जिससे अदिति का किरदार और भी ज्यादा उभरकर सामने आता है। वह लगभग ऐसी लगती हैं जैसे अपने ही ख्यालों की दुनिया से निकलकर स्क्रीन पर आ गई हों। यही विशाल भारद्वाज की विजुअल कहानी कहने की ताकत है, जहां कई बार मन करता है कि स्क्रीन रोककर हर फ्रेम को गौर से देखा जाए। इस कहानी में रेखा भारद्वाज का एक सरप्राइज गाना भी है, जो कहानी के एक अहम मोड़ पर दिलचस्प असर छोड़ता है। यह सेगमेंट भी एंथोलॉजी के मजबूत हिस्सों में शामिल है।

‘लस्ट स्टोरीज 3’ में क्या काम करता है?

इस एंथोलॉजी की सबसे बड़ी ताकत इसकी विविधता है। चार फिल्ममेकर हैं और चारों ने बिल्कुल अलग तरह की कहानियां कही हैं। उनके ट्रीटमेंट में फर्क साफ दिखाई देता है, इसलिए चारों सेगमेंट एक-दूसरे की कॉपी जैसे नहीं लगते। एक और अच्छी बात यह है कि चारों कहानियों में महिलाओं की इच्छाओं को महत्व दिया गया है। इसे सिर्फ सनसनी पैदा करने या बोल्डनेस दिखाने के लिए इस्तेमाल नहीं किया गया। कई जगह इच्छा कहानी की शुरुआत बनती है और उसके जरिए शादी, रिश्ते, ताकत, धोखा, अकेलापन और महिला इच्छाओं जैसे मुद्दों को सामने लाया जाता है। कलाकार भी एंथोलॉजी की ताकत हैं। चारों कहानियों में काफी प्रतिभाशाली कलाकार मौजूद हैं और कई कलाकार कम स्क्रीन टाइम के बावजूद अपनी छाप छोड़ जाते हैं।

कहां कमजोर पड़ती है फिल्म?

सबसे बड़ी समस्या यह है कि चारों कहानियों का प्रभाव एक जैसा नहीं है। मोटवानी की कहानी में बेहतरीन कलाकार और कई दिलचस्प विचार मौजूद हैं, लेकिन उनका इस्तेमाल उतने प्रभावी तरीके से नहीं हो पाता। किरण राव की कहानी को अपना उद्देश्य स्पष्ट करने में थोड़ा समय लगता है। कुछ दर्शकों के लिए यह धीमी शुरुआत काम कर सकती है, लेकिन शुरुआती हिस्सा थोड़ा उलझाने वाला जरूर महसूस हो सकता है। इसके अलावा एंथोलॉजी में कुछ ऐसे किरदार भी हैं, जिन्हें थोड़ा और विस्तार दिया जा सकता था। इतने शानदार कलाकारों के होने के बावजूद कई बार लगता है कि उन्हें अपनी प्रतिभा दिखाने के लिए थोड़ा ज्यादा स्पेस मिलना चाहिए था। फिल्म में कई शानदार व्यक्तिगत पल जरूर हैं, लेकिन एक कहानी से दूसरी कहानी के बीच हमेशा समान भावनात्मक या नैरेटिव पकड़ नहीं बनी रहती।

फाइन वर्डिक्ट

‘लस्ट स्टोरीज 3’ कुल मिलाकर एक ताजा और दिलचस्प अनुभव देती है, हालांकि कुछ जगहों पर इसकी रफ्तार थोड़ी कमजोर पड़ती है। कुछ कहानियां दूसरी कहानियों की तुलना में ज्यादा समय तक आपके साथ रहती हैं। शकुन बत्रा का सेगमेंट तलाक और रिश्तों की भावनात्मक जटिलताओं को जिस तरह शांत तरीके से दिखाता है, वह सबसे ज्यादा असरदार लगता है। विशाल भारद्वाज की कहानी आंखों के लिए किसी ट्रीट से कम नहीं है। वहीं किरण राव की कहानी को समझने के बाद उसका असर बढ़ता जाता है। मोटवानी का सेगमेंट हालांकि ऐसा है, जिसमें सबसे ज्यादा सुधार की गुंजाइश नजर आती है। पूरी एंथोलॉजी में सबसे दिलचस्प बात इच्छा को देखने का नजरिया है। यहां लस्ट को शर्म या सिर्फ चौंकाने वाली चीज की तरह पेश नहीं किया गया। यह लोगों, रिश्तों और उनके फैसलों को समझने का एक रास्ता बनती है। कहीं यह कहानी को आगे बढ़ाती है, तो कहीं रिश्तों की परतें खोलती है। चारों फिल्ममेकर्स ने अपने-अपने तरीके से इस विषय को संभाला है और इसे सस्ता या सिर्फ सनसनीखेज बनाने की कोशिश नहीं की। ‘लस्ट स्टोरीज 3’ में उतार-चढ़ाव जरूर हैं, लेकिन जब यह अपनी लय पकड़ती है तो काफी प्रभावशाली हो जाती है। हर कहानी एक जैसी मजबूत नहीं है, फिर भी इसमें इतना जरूर है कि यह आपको कुछ दृश्यों पर रुककर सोचने और कभी-कभी किसी सीन को दोबारा देखने के लिए मजबूर करती है।

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