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Ohh My Dog Review: बेजुबानों की वफादारी और इंसानी लालच के बीच झूलती एक भावुक दास्तान, पंकज त्रिपाठी से ज्यादा महफिल लूट ले गया 'ऑस्कर'

 Written By: Jaya Dwivedie
 Published : Aug 07, 2026 01:51 pm IST,  Updated : Aug 07, 2026 01:55 pm IST

'ओह माय डॉग' इंसान और वफादार कुत्ते के रिश्ते पर आधारित भावुक फिल्म है। थोड़ी लंबी और सुस्त पटकथा के बावजूद चार पैरों वाले हीरो ऑस्कर का अभिनय, दमदार संदेश और मासूमियत दिल जीत लेती है।

Ohh My Dog
ओह माय डॉग Photo: PREE KIT
  • फिल्म रिव्यू: ओह माय डॉग
  • स्टार रेटिंग 3/5
  • पर्दे पर: 07.08.2025
  • डायरेक्टर: अमित राय
  • शैली: मिस्ट्री ड्रामा

हिंदी सिनेमा में अक्सर नायकों की परिभाषा उनकी शारीरिक क्षमता, डायलॉग डिलीवरी और एक्शन दृश्यों से तय होती है, लेकिन जब एक दो-ढाई घंटे की मुख्यधारा की फिल्म में सबसे बड़ा नायक दो पैरों पर चलने वाला इंसान नहीं, बल्कि चार पैरों वाला एक बेजुबान जीव बन जाए तो वह अनुभव अपने आप में अनूठा हो जाता है। निर्देशक अमित राय, जिन्होंने 'ओएमजी 2' जैसी सोचने पर मजबूर करने वाली और व्यावसायिक रूप से सफल फिल्म से अपनी एक अलग पहचान बनाई है, इस बार दर्शकों के सामने 'ओह माय डॉग' लेकर आए हैं।

यह फिल्म केवल एक कुत्ते और उसके मालिक के प्यार की कोई सीधी-सादी कहानी नहीं है, बल्कि यह बेज़ुबानों के प्रति मानवीय क्रूरता, सामाजिक असमानता, बाल श्रम, अंग तस्करी और कानून व्यवस्था में फैली सड़ांध जैसे बेहद संवेदनशील मुद्दों को एक साथ छूने का प्रयास करती है। मुख्यधारा के भारतीय सिनेमा में बच्चों और जानवरों को केंद्र में रखकर फिल्में बनाना हमेशा से एक जोखिम भरा काम रहा है। इसके बावजूद 'ओह माय डॉग' अपनी मासूमियत, भावनात्मक गहराई और मुख्य नायक 'ऑस्कर' के स्वैग के दम पर दर्शकों को एक ऐसी यात्रा पर ले जाती है जहां अंखें नम भी होती हैं और चेहरे पर मुस्कान भी आती है। पूरा मूवी रिव्यू जानने के लिए नीचे स्क्रोल करें।

एक समानांतर खोज की अनोखी बुनावट

फिल्म का आगाज एक बेहद भावुक दृश्य से होता है, जान असम के डिब्रूगढ़ में पुलिस बल अपनी बहादुर खोजी कुतिया सेनापति को अंतिम विदाई दे रहा होता है। सेनापति की मौत के साथ ही पुलिस अधिकारियों के मन में यह मलाल भी तैरता है कि कैसे उसके छोटे बच्चों को उसकी मां से अलग कर दिया गया था। यहीं से कहानी दो अलग-अलग दिशाओं में मुड़ती है। सेनापति के दो बेटे, मोमो और ऑस्कर, अब अलग-अलग राज्यों और बिलकुल भिन्न परिस्थितियों में रह रहे हैं।

असम के डिब्रूगढ़ में मोमो को एक मध्यमवर्गीय परिवार ने गोद ले लिया है। यहां वह छोटा बच्चा अपू (माही राय) और उसके परिवार का दुलारा बन चुका है। दूसरी ओर, बिहार के पटना में ऑस्कर अपनी जिंदगी गुजार रहा है। ऑस्कर का मालिक प्रिंस (निखिल कुमार) एक निर्माण स्थल पर काम करने वाला बाल मजदूर है। प्रिंस के पास खुद का पेट भरने के लिए भी पर्याप्त संसाधन नहीं हैं, लेकिन ऑस्कर के प्रति उसका प्यार और समर्पण किसी भी दौलत से बड़ा है।

फिल्म का असली रोमांच तब शुरू होता है जब एक तरफ डिब्रूगढ़ में मोमो अचानक गायब हो जाता है, जिसके पीछे कुत्ते के मांस की तस्करी करने वाला गिरोह होता है और दूसरी तरफ पटना में ऑस्कर का मालिक प्रिंस अचानक लापता हो जाता है, जिसके पीछे अवैध अंग तस्करी का एक नेटवर्क काम कर रहा होता है। यहीं से अमित राय का पटकथा कौशल सामने आता है। फिल्म दो समानांतर ट्रैक पर चलती है। एक तरफ एक मासूम बच्चा अपने प्यारे पालतू कुत्ते की तलाश में भटक रहा है। दूसरी तरफ एक वफादार कुत्ता अपने गुमशुदा मालिक को ढूंढने के लिए पूरे शहर की खाक छान रहा है।

अपू अपनी मां के साथ पुलिस स्टेशन जाता है, लेकिन पुलिस अधिकारी की बेरुखी देखकर वह खुद ही तकनीक और अपने दिमाग के बल पर मोमो की खोज में निकल पड़ता है। इस मिशन में उसे अपनी ट्यूशन टीचर कृष्णा (सुलक्षणा बरुआ) का साथ मिलता है। दूसरी ओर प्रिंस के गायब होने पर ऑस्कर अपने भौंकने और व्यवहार से निर्माण स्थल के लोगों को जगाता है और गांव के मास्टर साहब (पंकज त्रिपाठी) की मदद से प्रिंस का सुराग लगाने की कोशिश करता है। ये दोनों खोज यात्राएं कई डरावने और कड़वे सामाजिक सत्यों से होकर गुज़रती हैं।

निर्देशन

किसी फिल्म में जानवरों और छोटे बच्चों से अभिनय करवाना किसी भी निर्देशक के लिए सबसे कठिन चुनौतियों में से एक माना जाता है। निर्देशक अमित राय ने इस चुनौती को न केवल स्वीकार किया है, बल्कि इसे बेहद खूबसूरती से परदे पर उतारा भी है। उनका निर्देशन इस बात की गवाही देता है कि वे केवल एक मनोरंजक फिल्म नहीं बना रहे थे, बल्कि वे दर्शकों के दिलों में संवेदना जगाना चाहते थे।

अमित राय ने फिल्म का ताना-बाना इस तरह बुना है कि इसमें थ्रिलर, ड्रामा, कॉमेडी और सोशल मैसेजिंग का मिला-जुला रूप देखने को मिलता है। उन्होंने असम के शांत-सुंदर परिवेश और बिहार व भोपाल के यथार्थवादी, कच्चे माहौल के बीच एक बेहतरीन संतुलन बनाया है। जानवरों से एक्शन और भावनात्मक दृश्य करवाना बेहद धैर्य का काम है, और अमित राय ने ऑस्कर के किरदार को जिस तरह एक हिंदी फिल्म के पारंपरिक 'अल्फा हीरो' की तरह पेश किया है, जहां वह अकेले 20 गुंडों के सामने डटकर खड़ा होता है, वह दर्शकों को तालियां बजाने पर मजबूर कर देता है।

हालांकि, एक निर्देशक के रूप में अमित राय से कुछ चूक भी हुई हैं। कहानी में बहुत सारे सामाजिक मुद्दों को एक साथ ठूंसने के चक्कर में पटकथा कई जगह बिखरी हुई महसूस होती है। यदि वे केवल इंसान और जानवर के रिश्ते पर ध्यान केंद्रित रखते और अपराध के सब-प्लॉट्स को थोड़ा सीमित करते तो फिल्म का प्रभाव कहीं अधिक तीखा हो सकता था।

अभिनय का जादू

इस फिल्म का असली स्टार कोई इंसान नहीं, बल्कि ब्रूनो नाम का कुत्ता है जिसने स्क्रीन पर 'ऑस्कर' का किरदार निभाया है। ऑस्कर का स्क्रीन प्रेंसेंस इतना जबरदस्त है कि वह बड़े से बड़े स्टार को पीछे छोड़ देता है। अपने मालिक की गंध का पीछा करना, सुराग ढूंढना, खतरे को भांपना और चेहरे के हाव-भाव से दुख या गुस्सा जाहिर करना, ऑस्कर का हर एक फ्रेम दर्शकों का दिल जीत लेता है। उसके साथी कुत्ते 'मोमो' ने भी अपनी मासूमियत से प्रभावित किया है।

इंसानी कलाकारों की बात करें तो निर्देशक के बेटे माही राय ने 'अपू' के रूप में एक बेहद आत्मविश्वास से भरा पदार्पण किया है। अपू का किरदार सत्यजीत रे की 'अपु ट्रिलॉजी' को एक संगीतमय श्रद्धांजलि है। माही राय ने एक ऐसे तकनीकी रूप से समझदार और हठी बच्चे की भूमिका को बहुत ही जीवंतता से निभाया है जो अपने कुत्ते के लिए किसी भी हद तक जा सकता है। हालांकि, कुछ दृश्यों में संवाद लेखन की वजह से उनका किरदार थोड़ा बदतमीज या अति-स्मार्ट महसूस होता है, लेकिन बाल कलाकार की ऊर्जा काबिले-तारीफ है।

पंकज त्रिपाठी ने एक बार फिर साबित किया है कि वे छोटी सी भूमिका में भी जान फूँक सकते हैं। गांव के मास्टर साहब के रूप में उनकी सादगी और संवाद अदायगी चेहरे पर मुस्कान ले आती है, भले ही इस बार उनके पास करने के लिए बहुत ज्यादा गुंजाइश नहीं थी। बिहार के पुलिस अधिकारी के रूप में राजेश कुमार का काम शानदार है। उनकी भाषा, लहजा और देह-भाषा किरदार में पूरी तरह रच-बस जाती है।

पवन मल्होत्रा ने एक आरटीओ अधिकारी के रूप में अपनी कड़क मौजूदगी दर्ज कराई है, हालाँकि उनका किरदार कई जगह बेवजह तेज़ आवाज़ में चिल्लाता हुआ लगता है। गीता अग्रवाल ने अपू की मां की भूमिका में ईमानदारी से काम किया है, लेकिन बंगाली लहजे और पहनावे में वे थोड़ी ओवर द टॉप नजर आती हैं। सुलक्षणा बरुआ (शिक्षिका कृष्णा के रूप में) और निखिल कुमार (प्रिंन्स के रूप में) ने भी अपने-अपने किरदारों के साथ पूरा न्याय किया है।

तकनीकी पक्ष

तकनीकी रूप से 'ओह माय डॉग' कई मायनों में हिंदी सिनेमा के स्थापित ढर्रे से अलग हटकर काम करती है। मेट हेरबाई की सिनेमैटोग्राफी इस फिल्म का एक बेहद मजबूत स्तंभ है। उन्होंने असम के प्राकृतिक दृश्यों और बिहार की धूल भरी गलियों व निर्माण स्थलों को बेहद यथार्थवादी ढंग से कैमरे में कैद किया है। सबसे खास बात यह है कि उन्होंने कई दृश्यों को डॉग्स पॉइंट ऑफ व्यू से शूट किया है। जब कैमरा ज़मीन के करीब रहकर ऑस्कर की नज़र से दुनिया को देखता है तो दर्शक खुद को सीधे उस थ्रिल और डर का हिस्सा महसूस करने लगते हैं।

अमन पंत का दिया संगीत फिल्म का सबसे कमज़ोर पहलू साबित होता है। गानों में कोई ऐसी धुन नहीं है जो थियेटर से बाहर निकलने के बाद याद रहे। हालांकि, मंगेश धाकड़े का बैकग्राउंड स्कोर इस कमी को काफी हद तक पूरा करता है। चेस सीक्वेंस और इमोशनल सीन्स के दौरान बैकग्राउंड स्कोर तनाव और संवेदना को सही तरीके से उभारता है। सुवीर नाथ की एडिटिंग पर थोड़ा और काम किया जा सकता था। फिल्म का रनटाइम लगभग 150 मिनट (ढाई घंटे) है, जो इस तरह की विषय-वस्तु के लिए काफी ज़्यादा है। फिल्म को आसानी से 15-20 मिनट छोटा किया जा सकता था। वहीं अश्विनी श्रीवास्तव का प्रोडक्शन डिजाइन बेहद सच्चा और ज़मीन से जुड़ा हुआ है, लोकेशन और सेट किसी भी तरह से कृत्रिम नहीं लगते।

जहां फिल्म मात खाती है

'ओह माय डॉग' एक बेहद नेक नीयत से बनाई गई फिल्म है, लेकिन इसमें कई ऐसी खामियाँ हैं जो इसे एक 'मास्टरपीस' बनने से रोकती हैं।

फिल्म का ढाई घंटे का रनटाइम इसकी सबसे बड़ी कमजोरी है। मध्यंतर के बाद जब ऑस्कर और अपू अपने-अपने मिशन पर निकलते हैं, तो कहानी कई जगह गोल-गोल घूमती हुई महसूस होती है। एक ही तरह के चेस सीक्वेंस बार-बार दोहराए जाने से दर्शकों का धैर्य जवाब देने लगता है।

पटकथा में कुछ किरदारों को दिखाने में पुरानी और घिसी-पिटी रूढ़ियों का सहारा लिया गया है। बंगाली महिला को हमेशा लाल-सफेद साड़ी, बड़ी बिंदी और बढ़ा-चढ़ाकर बंगाली मिश्रित हिंदी बोलते हुए दिखाना अब काफी पुराना पड़ चुका है। इसी तरह, पुलिस अधिकारियों का बिना बात के चिल्लाना और ओवर-द-टॉप व्यवहार खटकता है।

एक दृश्य में जहां 250 कुत्तों का एक साथ आना दिखाया गया है, वह देखने में तो बच्चों को रोमांचित करता है, लेकिन फिल्म के यथार्थवादी टोन से पूरी तरह भटक जाता है। इसी तरह, एक छोटे बच्चे का पुलिस अधिकारियों के सामने खुलेआम अवैध ट्रैकिंग ऐप्स का इस्तेमाल करना और पुलिस का उस पर कोई प्रतिक्रिया न देना तार्किकता से परे लगता है।

क्या बनाता है इसे खास?

तमाम कमियों के बावजूद 'ओह माय डॉग' में कई ऐसे पल हैं जो इसे एक बेहद ख़ास अनुभव बनाते हैं। फिल्म यह संदेश बहुत ही खूबसूरती से देती है कि बेज़ुबान जीवों को आपसे किसी धन-दौलत की उम्मीद नहीं होती; उन्हें बस थोड़े से प्यार और देखभाल की ज़रूरत होती है। प्रिंस और ऑस्कर का रिश्ता इस बात की मिसाल है कि गरीबी भी वफादारी और प्यार के आड़े नहीं आ सकती। जब ऑस्कर अपने मालिक को बचाने के लिए ख़तरों से खेलता है, तो सिनेमाघर में बैठे बच्चे और बड़े सभी तालियाँतालियां बजाने पर मजबूर हो जाते हैं। फिल्म में 'महाभारत' और 'चिल्लर पार्टी' जैसे संदर्भों का इस्तेमाल कहानी को एक पौराणिक और सामाजिक जुड़ाव देता है। जानवरों की मांस के लिए तस्करी और गरीब बच्चों/मजदूरों के अंगों की अवैध बिक्री जैसे काले कारोबार को उजागर करके फिल्म समाज के उस कड़वे सच को सामने लाती है जिसे अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है।

फाइनल वर्डिक्ट

'ओह माय डॉग' केवल एक फिल्म नहीं है, बल्कि यह इंसानी संवेदनाओं को जगाने की एक ईमानदार कोशिश है। यह आपको 'तेरी मेहरबानियां', 'चिल्लर पार्टी' और '777 चार्ली' जैसी फिल्मों की याद दिलाती है, जहां इंसान और जानवर का निस्वार्थ रिश्ता ही कहानी की आत्मा हुआ करता था।

फिल्म में तकनीकी खामियां हैं, लंबाई थोड़ी ज्यादा है और पटकथा कहीं-कहीं खिंची हुई महसूस होती है, लेकिन इसका दिल बिल्कुल सही जगह पर है। चार पैरों वाले स्टार 'ऑस्कर' का अभिनय और उसकी वीरता इस फिल्म को हर उम्र के दर्शकों, खासकर बच्चों और पेट-लवर्स के लिए एक बार देखा जाने वाला मनोरंजक अनुभव बनाती है। यदि आप इस सप्ताहांत अपने परिवार के साथ एक ऐसी फिल्म देखना चाहते हैं जो आपको हंसाए, रुलाए और जाते-जाते आपके दिल में बेज़ुबानों के प्रति थोड़ा और प्यार भर दे तो ऑस्कर और मोमो की यह कहानी आपके लिए ही है।

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