Monday, February 09, 2026
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Rahu Ketu Review: पुलकित सम्राट और वरुण शर्मा की शानदार जुगलबंदी, पौराणिक सोच और मॉडर्न कॉमेडी को पेश करती है फिल्म

जया द्विवेदी
Published : Jan 16, 2026 01:43 pm IST, Updated : Jan 16, 2026 01:44 pm IST

‘राहु केतु’ पौराणिक कल्पना और सिचुएशनल कॉमेडी का हल्का-फुल्का मेल है। पुलकित सम्राट और वरुण शर्मा की जोड़ी फिल्म की सबसे बड़ी ताकत है। मजेदार पल मौजूद हैं और भी फिल्म में बहुत कुछ है, जानने के लिए नीचे स्क्रोल करें।

rahu ketu- India TV Hindi
Photo: STILL FROM TRAILER वरुण शर्मा और पुलकित
  • फिल्म रिव्यू: राहु केतु
  • स्टार रेटिंग: 3 / 5
  • पर्दे पर: 16/01/2026
  • डायरेक्टर: विपुल विग
  • शैली: कॉमेडी

अगर पौराणिक कथाओं के सबसे रहस्यमय पात्र राहु और केतु इंसान बनकर हमारी दुनिया में उतर आएं, हमारे पापों का आईना दिखाएं और फिर किसी अनदेखी शक्ति के इशारे पर अच्छाई–बुराई का हिसाब बराबर करने लगें तो क्या होगा? यही दिलचस्प सवाल ‘राहु केतु’ की बुनियाद है। यह फिल्म एक ऐसे विचार से जन्म लेती है जो लोककथाओं, धार्मिक ग्रंथों और नैतिक कहानियों की आत्मा को छूता है, बुराई चाहे जितनी भी आकर्षक क्यों न हो, उसका अंत तय है और अच्छाई अराजकता में भी रास्ता ढूंढ ही लेती है।

लेखक-निर्देशक विपुल विग (फुकरे फ्रेंचाइजी से जुड़े रहे) इस बार पौराणिक तत्वों को हल्के-फुल्के, लगभग बच्चों के अनुकूल अंदाज में पेश करने की कोशिश करते हैं। पुलकित सम्राट (केतु) और वरुण शर्मा (राहु) की जोड़ी अपने आप में एक कॉमिक भरोसा जगाती है। फिल्म शुरू से ही यह संकेत दे देती है कि यह कोई भारी-भरकम माइथोलॉजिकल ड्रामा नहीं, बल्कि जादुई अफरातफरी, दोस्ती और सिचुएशनल कॉमेडी से सजी एक फन राइड है। सवाल बस इतना है, क्या यह राइड आखिर तक उतनी ही मजेदार रहती है? चलिए जानते हैं।

कहानी

कहानी हिमाचल प्रदेश के एक छोटे से शहर से शुरू होती है, जहां लेखक चूरू लाल शर्मा (मनु ऋषि चड्ढा) अपनी किस्मत और कलम दोनों से परेशान है। तभी रहस्यमय फूफाजी (पीयूष मिश्रा) की एंट्री होती है, जिनके पास एक जादुई डायरी/किताब है, जो किस्मत लिखती है। इसी किताब से जन्म लेते हैं राहु और केतु, दो मासूम लेकिन अराजक पात्र, जिन्हें शहर वाले अपशकुन मानने लगते हैं, जबकि दर्शकों के लिए वही सबसे बड़ा एंटरटेनमेंट बन जाते हैं। फिल्म का शुरुआती हिस्सा थिएटर जैसा एहसास देता है। फूफाजी का कथावाचन, समुद्र मंथन की झलक और यह विचार कि राहु-केतु असल में बुरे नहीं, बल्कि बुराई को सजा देने के औजार हैं, ये सब मिलकर एक मजबूत सेटअप तैयार करते हैं।

 फिल्म धीरे-धीरे यह भी समझाने की कोशिश करती है कि डरने से ज्यादा जरूरी है कर्म को समझना। यह संदेश बच्चों और फैमिली ऑडियंस के लिए खास तौर पर असरदार हो सकता है, लेकिन समस्या यहीं से शुरू होती है, निरंतरता की। कहानी कई बार रफ्तार पकड़ती है और उतनी ही जल्दी ढीली भी पड़ जाती है। कुछ सीन बेहद मजेदार हैं तो कुछ ऐसे लगते हैं मानो सिर्फ़ टाइम पास के लिए जोड़े गए हों। हाथी-केला वाला पूरा सीक्वेंस इसका उदाहरण है, हंसी तो आती है, लेकिन फिल्म खत्म होने के बाद भी यह सवाल रह जाता है कि इसका असल मतलब क्या था, या था भी या नहीं।

लेखन, निर्देशन और तकनीकी पक्ष

‘राहु केतु’ की कॉमेडी ज्यादातर डायलॉग्स से ज्यादा सिचुएशन्स पर टिकी है, जो एक अच्छी बात है। वरुण शर्मा का एक्सप्रेशन-ड्रिवन ह्यूमर और पुलकित सम्राट की सहज चुलबुलाहट कई सीन बचा ले जाती है। दोनों की जुगलबंदी फिल्म की जान है और जब भी स्क्रीन पर साथ आते हैं, माहौल अपने आप हल्का हो जाता है। हालांकि, यही कॉमेडी हर जगह बराबर काम नहीं करती। कुछ जोक्स दोहराव का शिकार हो जाते हैं और कहानी को आगे बढ़ाने के बजाय उसे रोकते हैं। एक दिलचस्प मेटा कमेंट्री भी है, कुछ खोखले किरदार भी हैं। इस कहानी का आइडिया अच्छा है, कह सकते हैं कि एक सफल प्रयास हो सकता था अगर इसे और बेहतर तरीके के एक्सप्लोर करते तो, लेकिन ओवर ऑल कहानी का मूल उद्देश तार्किक होना नहीं बल्कि दर्शकों को हंसाना जिसमें ये सफल होती है। 

विपुल विग का निर्देशन आत्मविश्वास से भरा है, खासकर यह देखते हुए कि यह उनकी पहली फिल्म है। कॉमेडी ज्यादातर जगह जबरदस्ती ठूंसी हुई नहीं लगती, बल्कि सिचुएशन से निकलती है। हालांकि, एडिटिंग थोड़ी टाइट होती तो फिल्म ज्यादा असरदार बन सकती थी। कुछ हिस्से अनावश्यक रूप से लंबे लगते हैं।

हिमाचल की लोकेशन्स फिल्म को विज़ुअली फ्रेश बनाती हैं और बैकग्राउंड स्कोर कहानी के मिज़ाज में घुला रहता है। लेकिन म्यूजिक फिल्म का सबसे कमजोर पहलू है। टाइटल ट्रैक में ‘पापी’ शब्द का अजीब इस्तेमाल कहानी में घुलने के बजाय अलग-थलग महसूस होता है।

अभिनय

परफॉर्मेंस के मोर्चे पर कास्ट ने कमजोर स्क्रिप्ट को संभालने की भरपूर कोशिश की है। वरुण शर्मा एक बार फिर साबित करते हैं कि कॉमेडी उनकी नैसर्गिक ताकत है। राहु के किरदार में उनकी टाइमिंग और बॉडी लैंग्वेज लगातार हंसाती है। पुलकित सम्राट केतु के रूप में सहज और फिट लगते हैं। वह ओवर-द-टॉप नहीं जाते और अपनी मासूमियत से किरदार में जान डालते हैं। पीयूष मिश्रा फूफाजी बनकर रहस्य और मज़ा दोनों घोलते हैं। सीमित स्क्रीन टाइम के बावजूद उनकी मौजूदगी कहानी को वजन देती है। 

अमित सियाल (SHO) और सुमित गुलाटी (बंसी) कम समय में भी अपनी छाप छोड़ते हैं। शालिनी पांडे मीनू टैक्सी के रोल में ठीक-ठाक हैं, लेकिन कई सीन में आलिया भट्ट की झलक साफ दिखती है, जो उनके अपनेपन में बाधा बनती है। चंकी पांडे मोर्देखाई के रूप में मज़ेदार हैं, लेकिन उन्हें भी एक जाने-पहचाने स्टीरियोटाइप तक सीमित कर दिया गया है, जो थोड़ी निराशा देता है।

फुकरे से तुलना- सबसे बड़ी चुनौती

पुलकित सम्राट-वरुण शर्मा की जोड़ी देखते ही फुकरे की याद आना तय है। यही तुलना ‘राहु केतु’ के लिए सबसे बड़ी चुनौती भी बन जाती है। जहां फुकरे की मस्ती बेपरवाह और लगातार थी, वहीं यहां हंसी के पल बिखरे हुए हैं। फिल्म बुरी नहीं है, लेकिन उम्मीदों का बोझ इसे थोड़ा दबा देता है।

निष्कर्ष

तो क्या ‘राहु केतु’ से बचना चाहिए? बिल्कुल नहीं। यह एक ऐसी फिल्म है जो हंसाने आती है और कई जगह कामयाब भी होती है। बच्चों के साथ या थके हुए दिन के बाद बिना दिमाग लगाए देखने के लिए यह एक ठीक-ठाक विकल्प है। पौराणिक कॉन्सेप्ट, रंगीन किरदार और पुलकित-वरुण की केमिस्ट्री इसे देखने लायक बनाती है।

लेकिन अगर आप फुकरे-लेवल की लगातार हंसी या बहुत मजबूत कहानी की उम्मीद लेकर जाएंगे तो थोड़ी निराशा हो सकती है। फिल्म का आइडिया शानदार है, पर उसे पूरी तरह साधा नहीं गया। सीक्वल का इशारा मिल चुका है, उम्मीद है कि अगली बार विपुल विग उन कमियों पर ध्यान देंगे जो यहां खटकती हैं, और राहु-केतु की यह दुनिया और मजबूत होकर लौटेगी।

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