Explainer: अमेरिका और इज़राइल के ईरान पर हमले शुरू करने के लगभग चार महीने बाद, ईरान और अमेरिका एक शांति समझौते के ज़रिए इस तनाव् को औपचारिक रूप से खत्म करने की तैयारी कर रहे हैं। डिजिटली शांति प्रस्ताव पर मुहर लग चुकी है और उम्मीद है कि इस शांति समझौते पर ईरान और अमेरिका की तरफ से जल्द ही आधिकारिक तौर पर सभी मुद्दों पर सहमति बन जाएगी। हालांकि शांति प्रस्तवा के इस पूरे मेमोरेंडम में क्या है और बात कहां फंस सकती है, ये भविष्य में देखने वाली बात होगी।
आख़िरकार युद्ध किसने जीता?
शांति प्रस्ताव के समझौते बाद दोनों तरफ से संशय की स्थिति बनी हुई है, क्योंकि ट्रंप अपनी आदत के मुताबिक बयानबाजी से बाज नहीं आते। वहीं ईरान के सुप्रीम लीडर ने कहा है कि ईरानी अधिकारियों ने मेमोरेडम पर हस्ताक्षर तक पहुंचने के लिए बहुत कोशिश की जबकि अमरिकी प्रेसिडेंच ने निराशा में इस पर साइन किए।
ट्रंप ने कई मौकों पर ईरान के ख़िलाफ़ अमेरिका और इज़राइल के अभियान को बहुत बड़ी कामयाबी बताया है और इसे वॉशिंगटन की पूरी जीत के तौर पर पेश किया है। लेकिन स्वतंत्र आकलन इस तस्वीर को काफ़ी हद तक अलग और जटिल दिखाते हैं।
जब खामेनेई ने कहा, ट्रंप हताश थे तो ट्रंप के फैंस ने कहा कहा-ये तो मास्टरस्ट्रोक था। इस तरह से ईरान और अमेरिका दोनों अपनी अपनी जीत के गीत गा रहे हैं। इसका मतलब है कि सब कुछ सहमति से नहीं हुआ है। अब किसकी कितनी मजबूरी है, ये देखने वाली बात होगी।
ईरान अमेरिका क्या सहमत हो जाएंगे?
ईरान और अमेरिका के बीच यह समझौता सफल रहता है, तो इससे खाड़ी में शुरू हुए उस युद्ध का अंत हो सकता है जिसमें पश्चिमी एशिया में हज़ारों लोग मारे गए, जिनमें ईरान की सत्ताधारी व्यवस्था के वरिष्ठ अधिकारियों की भी मौत हो गई। इस युद्ध ने दुनिया भर में ऊर्जा संकट पैदा किया और खाड़ी को एक बड़े टकराव की कगार पर पहुंचा दिया, जिसमें लगता था कि आगे क्या होगा।
इजरायल इस युद्धविराम से खुश क्यों नहीं है?
अमेरिका और ईरान दोनों को शांति समझौते पर हस्ताक्षर होने से पहले ही कई गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ा है, लेबनान में ईरान-समर्थित हिज़्बुल्लाह के खिलाफ़ इज़राइल के लगातार सैन्य अभियानों से नाज़ुक कूटनीतिक गति के पटरी से उतरने का खतरा पैदा हो गया है। वहीं, इजरायल नहीं चाहता है कि जब तक उसका मकसद पूरा ना हो, शांति प्रस्ताव के कायदे जारी हों। इसके कारण अमेरिका ने उसे बार बार संयम बरतने की सलाह दी।
ईरान को लेकर क्या गलतफहमी है?
PBS NewsHour की एक फैक्ट-चेक रिपोर्ट के मुताबिक, भले ही अमेरिका और इज़राइल को युद्ध के मैदान में असली कामयाबी मिली हो और पेंटागन के अधिकारियों ने कांग्रेस को बताया हो कि ईरान के मिसाइल, ड्रोन और नेवल डिफेंस इंडस्ट्री बेस का 80% से ज़्यादा हिस्सा नष्ट या क्षतिग्रस्त हो गया है, फिर भी इस नतीजे को पूरी जीत कहना ईरान के पक्ष में हुए एक बड़े बदलाव को नज़रअंदाज़ करना होगा।
ईरान की जीत में होर्मुज है तुरुप का पत्ता?
ईरान असल में होर्मुज़ जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) का "गेटकीपर" बन गया है; यह वह अहम रास्ता है जिससे दुनिया का लगभग पांचवां हिस्सा तेल और गैस का व्यापार होता है। इससे तेहरान को एक मज़बूत आर्थिक बढ़त मिली है जो युद्ध शुरू होने से पहले उसके पास नहीं थी। अमेरिका को ना चाहते हुए भी ईरान को इसे लेकर समझौता करने का वैश्विक दबाव झेलना पड़ा है।
संवर्धित यूरेनियम ने अमेरिका को मजबूर किया?
इस बीच, यह डील ईरान के पास मौजूद अत्यधिक संवर्धित यूरेनियम (highly enriched uranium) के भंडर और उसके परमाणु कार्यक्रम के बारे में क्या किया जाए, इस मसले को सुलझाने के लिए सिर्फ़ 60 दिन का समय देती है। दुनिया की बड़ी ताकतों के साथ तेहरान की 2015 की परमाणु डील में इस मसले को सुलझाने में सालों लग गए थे। ट्रंप ने अपने पहले कार्यकाल में एकतरफा तौर पर अमेरिका को उस समझौते से बाहर कर लिया था, जिससे तनाव बढ़ा और आखिरकार युद्ध की स्थिति बन गई।
ईरान जीता या अमेरिका?
ट्रंप ने अपने 80वें जन्मदिन पर सोशल मीडिया पर लिखा, "सभी को बधाई! "मैं होर्मुज को बिना किसी शुल्क के खोलने की पूरी इजाज़त देता हूं और साथ ही, अमेरिकी नौसेना की नाकेबंदी को तुरंत हटाने का भी आदेश देता हूँ।"
हालांकि, उन्होंने जल्द ही अपनी बात में थोड़ा बदलाव करते हुए कहा कि यह जलमार्ग शांति समझौते पर हस्ताक्षर होने तक नहीं खुलेगा। ईरान के उप विदेश मंत्री काज़ेम ग़रीबाबादी ने सरकारी टेलीविज़न पर समझौते की पुष्टि की, लेकिन कहा कि ईरान हस्ताक्षर होने तक इसे लागू करना शुरू नहीं करेगा। उन्होंने बताया कि यह समझौता एक अन्य मध्यस्थ, कतर के साथ बातचीत के बाद हुआ है।
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