नई दिल्ली/लखनऊ: उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में अब 6 महीने से भी कम का वक्त बचा है। इस बीच सूबे में सियासत गर्मा गई है। विधानसभा चुनाव से पहले ब्राह्मण वोट को लेकर राजनीतिक दलों की सक्रियता बढ़ गई है। सभी सियासी दल वोटरों को लुभाने में जुटे हैं। समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने 5 अगस्त को PDA की नई व्याख्या करते हुए इसमें 'P' का मतलब 'पंडित' बताया। इससे पहले 2022 के विधानसभा चुनाव में अखिलेश यादव PDA में 'P' का मतलब 'पिछड़ा' बताते थे। ऐसे में 'पिछड़ा' से 'पंडित' तक का यह बदलाव यूपी की चुनावी राजनीति में एक अहम पॉलिटिकल संदेश माना जा रहा है।
अखिलेश यादव ने लखनऊ में आयोजित ब्राह्मण सम्मेलन में बीजेपी पर ब्राह्मण समाज को निशाना बनाने का आरोप लगाया। उन्होंनें कहा, "लोग PDA के बारे में बात करते रहते हैं और इसकी नई-नई डेफिनिशन बनाते रहते हैं। जब से वे PDA से हारे हैं, वे इसे फिर से डिफाइन करने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन वे भूल गए हैं कि PDA में 'PD' का मतलब पंडित भी है। वे जितना ज़्यादा दर्द (पीड़ा) देंगे, PDA उतना ही मज़बूत होगा।"
उसी कार्यक्रम में अखिलेश ने योगी आदित्यनाथ की अगुवाई वाली सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (BJP) पर उत्तर प्रदेश में ब्राह्मण समुदाय को टारगेट करने का आरोप लगाया। उन्होंने महाकुंभ के आयोजन को ठीक से न संभालने के लिए भी बीजेपी पर निशाना साधा और आरोप लगाया कि एक शंकराचार्य (अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती) को भी स्नान करने से रोका गया, जबकि उन्होंने वादा किया था कि अगर उनकी पार्टी सत्ता में आती है तो वे समुदाय का उत्थान करेंगे और युवाओं को नौकरी देंगे।
क्यों महत्वपूर्ण है ब्राह्मण वोट?
उत्तर प्रदेश की राजनीति में ब्राह्मणों को लंबे समय से प्रभावशाली वोट बैंक माना जाता है। विधानसभा चुनावों में इनकी भूमिका अहम हो जाती है। राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक राज्य की 115 से ज्यादा विधानसभा सीटों पर ब्राह्मण वोटर चुनावी नतीजों को प्रभावित करने की स्थिति में हैं। यही वजह है कि चुनाव नजदीक आते ही राजनीतिक दल इस ब्राह्मणों को अपने पाले में लाने की कोशिश करते हैं।
2007 के विधानसभा चुनाव में मायावती की बहुजन समाज पार्टी (BSP) ने दलित-ब्राह्मण सोशल इंजीनियरिंग के जरिए बड़ी सफलता हासिल की थी। बीएसपी ने 403 में से 206 सीटें जीतकर सरकार बनाई थी। लोकनीति और सीएसडीएस के आंकड़ों के मुताबिक उस चुनाव में बीएसपी को करीब 16 फीसदी ब्राह्मण वोट मिले थे।

2012 में समाजवादी पार्टी को मिला ब्राह्मणों का साथ
2012 के विधानसभा चुनाव की बात करें तो समाजवादी पार्टी ने 224 सीटें जीतकर सत्ता हासिल की। लोकनीति और सीएसडीएस के आंकड़ों के मुताबिक इस चुनाव में समाजवादी पार्टी को करीब 19 फीसदी ब्राह्मण वोट मिले थे। वहीं बीजेपी को 38 फीसदी, BSP को 19 फीसदी और कांग्रेस को 13 फीसदी ब्राह्मण वोट मिले यानी ब्राह्मण वोट एक ही पार्टी के पक्ष में पूरी तरह लामबंद नहीं था।
वहीं वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव में तस्वीर पूरी तरह बदल गई। इस चुनाव में नरेंद्र मोदी की लहर के बीच BJP ने 300 से ज्यादा सीटें जीत लीं। ब्राह्मण वोट का बड़ा हिस्सा उसके साथ चला गया। लोकनीति और सीएसडीएस के अनुसार BJP को करीब 83 फीसदी ब्राह्मण वोट मिले, जबकि समाजवादी पार्टी को 7 फीसदी और BSP को 2 फीसदी वोट मिले। 2022 के विधानसभा चुनाव में भी ब्राह्मण वोटरों का झुकाव BJP की ओर रहा। सर्वे के मुताबिक BJP को करीब 89 फीसदी ब्राह्मण वोट मिले, जबकि SP को महज 6 फीसदी वोट मिले।
क्या BJP से नाराज हैं ब्राह्मण?
अब जबकि 2027 का चुनाव सामने है, विपक्षी दलों का दावा है कि यूपी में BJP सरकार के खिलाफ ब्राह्मण समाज के एक वर्ग में नाराजगी है। विपक्ष की ओर से भी यह आरोप अक्सर लगते रहे हैं कि योगी की अगुवाई वाले सरकार में ठाकुरों को अधिक प्राथमिकता मिल रही है। हालांकि BJP से नाराजगी का मतलब यह नहीं है कि ब्राह्मण वोटर अपने आप समाजवादी पार्टी या किसी अन्य विपक्षी दल के पक्ष में चला जाएगा।
समाजवादी पार्टी के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि उसके मुस्लिम तुष्टीकरण के कथित रुख को लेकर ब्राह्मण मतदाताओं के एक हिस्से में अब भी असहजता हो सकती है। इसलिए अखिलेश का ब्राह्मण सम्मेलन करने तक सीमित नहीं हैं, बल्कि इसे 2027 की बड़ी सोशल इंजीनियरिंग का हिस्सा माना जा रहा है।
BSP भी फिर आजमा रही पुराना फॉर्मूला
ब्राह्मण वोट पर सिर्फ समाजवादी पार्टी की नजर नहीं है, मायावती की BSP भी 2007 के ब्राह्मण-दलित समीकरण को दोबारा मजबूत करने की कोशिश कर रही है। पार्टी ने ब्राह्मण चेहरा माने जाने वाले सतीश चंद्र मिश्रा को कानूनी, मीडिया और चुनाव आयोग से जुड़े मामलों की जिम्मेदारी दी है। इसी सामाजिक समीकरण का फायदा 2007 में बीएसपी को मिला था।
BJP के सामने चुनौती कितनी बड़ी?
BJP भी ब्राह्मण वोट बैंक को लेकर सतर्क है। पार्टी ने RSS विचारक नागेंद्र नाथ त्रिपाठी को राष्ट्रीय संगठनकर्ता की जिम्मेदारी दी है। इसे जमीनी स्तर पर पुराने समर्थक वर्ग से संपर्क मजबूत करने की रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है।
इससे साफ है कि 2027 से पहले उत्तर प्रदेश में मुकाबला सिर्फ BJP बनाम विपक्ष का नहीं, बल्कि ब्राह्मण वोट को अपने साथ जोड़ने की राजनीतिक होड़ का भी है। अखिलेश यादव ने PDA में 'पंडित' जोड़कर इस होड़ को खुलकर सामने ला दिया है। अब सवाल यही है कि क्या ब्राह्मण वोट का एक हिस्सा BJP से हटकर SP या BSP की ओर जाएगा, या 2017 और 2022 की तरह BJP का दबदबा कायम रहेगा?
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