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लोगों की समझ से परे थी 15 साल पहले आई ये फिल्म, दो सुपरस्टार और इच्छामृत्यु की कहानी भी नहीं करा पाए हिट

साल 2010 में ऋतिक रोशन और ऐश्वर्या राय की शानदार फिल्म 'गुजारिश' रिलीज हुई थी। उस दौर में फिल्म को लोगों का प्यार नहीं मिला, लेकिन आज इसे कल्ट का दर्जा हासिल है।

Written By: Jaya Dwivedie
Published : Nov 19, 2025 05:12 pm IST,  Updated : Nov 19, 2025 05:12 pm IST
रिलीज के पंद्रह साल बाद भी गुजारिश संजय लीला भंसाली की सबसे साहसी और दिल छू लेने वाली फिल्मों में से एक बनी हुई है, एक ऐसी फिल्म जिसने समाज की सोच को उस समय चुनौती दी थी, जब इच्छामृत्यु और सम्मान के साथ मरने के अधिकार पर खुलकर बातें भी नहीं होती थीं। जब बॉलीवुड मुश्किल और गहरी कहानियों पर बहुत कम काम करता था, तब भंसाली जिनकी कभी-कभी राज कपूर और गुरु दत्त जैसे सिनेमा दिग्गजों से तुलना की जाती है ने एक बेहद इंसानी कहानी बनाई, जिसमें दया, दर्द और चुनाव की बात देखने मिली थी। ऋतिक रोशन और ऐश्वर्या राय बच्चन की मजबूत परफॉर्मेंस के साथ, गुजारिश ने न सिर्फ फिल्मों की सीमाओं को आगे बढ़ाया, बल्कि एक ऐसी चर्चा शुरू की, जिसके लिए भारत उस समय पूरी तरह तैयार नहीं था। इसी वजह से इसकी अहमियत आज और ज्यादा बढ़ गई है। आइए देखें कि भंसाली की ये बोल्ड फिल्म सिर्फ देखने और महसूस करने लायक नहीं थी, बल्कि अपने समय से कहीं आगे थी, जो इज्जत, दर्द और मरने के हक जैसे मुद्दों पर सीधा ध्यान केंद्रित करती है।
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रिलीज के पंद्रह साल बाद भी गुजारिश संजय लीला भंसाली की सबसे साहसी और दिल छू लेने वाली फिल्मों में से एक बनी हुई है, एक ऐसी फिल्म जिसने समाज की सोच को उस समय चुनौती दी थी, जब इच्छामृत्यु और सम्मान के साथ मरने के अधिकार पर खुलकर बातें भी नहीं होती थीं। जब बॉलीवुड मुश्किल और गहरी कहानियों पर बहुत कम काम करता था, तब भंसाली जिनकी कभी-कभी राज कपूर और गुरु दत्त जैसे सिनेमा दिग्गजों से तुलना की जाती है ने एक बेहद इंसानी कहानी बनाई, जिसमें दया, दर्द और चुनाव की बात देखने मिली थी। ऋतिक रोशन और ऐश्वर्या राय बच्चन की मजबूत परफॉर्मेंस के साथ, गुजारिश ने न सिर्फ फिल्मों की सीमाओं को आगे बढ़ाया, बल्कि एक ऐसी चर्चा शुरू की, जिसके लिए भारत उस समय पूरी तरह तैयार नहीं था। इसी वजह से इसकी अहमियत आज और ज्यादा बढ़ गई है। आइए देखें कि भंसाली की ये बोल्ड फिल्म सिर्फ देखने और महसूस करने लायक नहीं थी, बल्कि अपने समय से कहीं आगे थी, जो इज्जत, दर्द और मरने के हक जैसे मुद्दों पर सीधा ध्यान केंद्रित करती है।
जब 'गुजारिश' 2010 में आई तो उस समय एक मेनस्ट्रीम बॉलीवुड फिल्म का यूथेनेसिया या इच्छामृत्यु जैसे गंभीर विषय पर बात करना बहुत कम होता था और कई लोगों के लिए यह थोड़ा असहज भी था। लेकिन भंसाली ने हिम्मत दिखाते हुए अपनी कहानी के केंद्र में एथन मस्करेनहास (जिसे ऋतिक रोशन ने निभाया) को रखा एक ऐसा जादूगर, जो एक हादसे के बाद पूरी तरह से शरीर से लाचार हो गया था और जो अपनी ज़िंदगी ख़त्म करने के अधिकार के लिए कोर्ट में गुहार लगा रहा था। यह कोई दुनिया से भागने वाली कहानी नहीं थी; यह दुख, अपने फैसलों और अपनी इच्छा को समझने की एक बहुत ही इंसानी और नाज़ुक कसौटी थी।
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जब 'गुजारिश' 2010 में आई तो उस समय एक मेनस्ट्रीम बॉलीवुड फिल्म का यूथेनेसिया या इच्छामृत्यु जैसे गंभीर विषय पर बात करना बहुत कम होता था और कई लोगों के लिए यह थोड़ा असहज भी था। लेकिन भंसाली ने हिम्मत दिखाते हुए अपनी कहानी के केंद्र में एथन मस्करेनहास (जिसे ऋतिक रोशन ने निभाया) को रखा एक ऐसा जादूगर, जो एक हादसे के बाद पूरी तरह से शरीर से लाचार हो गया था और जो अपनी ज़िंदगी ख़त्म करने के अधिकार के लिए कोर्ट में गुहार लगा रहा था। यह कोई दुनिया से भागने वाली कहानी नहीं थी; यह दुख, अपने फैसलों और अपनी इच्छा को समझने की एक बहुत ही इंसानी और नाज़ुक कसौटी थी।
भंसाली ने कहा है कि उन्होंने इस विषय पर लगभग एक साल रिसर्च किया। उन्होंने जान-बूझकर इस विषय पर बनी दूसरी फिल्में नहीं देखीं, ताकि उनकी सोच साफ और अपनी हो। यह उनकी गंभीरता को दिखाता है कि उन्होंने इस मुद्दे को किसी सनसनी की तरह नहीं लिया, बल्कि एक असली, चल रही बहस की तरह देखा कि कब जिंदगी बहुत भारी हो जाती है, और क्या इंसान को यह हिम्मत होनी चाहिए कि वो कह सके कि “बस, अब बहुत हो गया।”
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भंसाली ने कहा है कि उन्होंने इस विषय पर लगभग एक साल रिसर्च किया। उन्होंने जान-बूझकर इस विषय पर बनी दूसरी फिल्में नहीं देखीं, ताकि उनकी सोच साफ और अपनी हो। यह उनकी गंभीरता को दिखाता है कि उन्होंने इस मुद्दे को किसी सनसनी की तरह नहीं लिया, बल्कि एक असली, चल रही बहस की तरह देखा कि कब जिंदगी बहुत भारी हो जाती है, और क्या इंसान को यह हिम्मत होनी चाहिए कि वो कह सके कि “बस, अब बहुत हो गया।”
उस समय जब भारत में इच्छामृत्यु (और आज भी काफी हद तक) एक बड़ा टैबू थी, गुजारिश ने बातचीत की एक जगह खोली। भंसाली ने बाद में कहा था कि फिल्म रिलीज़ होने पर काफी “हंगामा” हुआ था। लेकिन यही हंगामा दिखाता है कि फिल्म ने लोगों के दिल की सीधी नस को छू लिया; इसने दर्शकों को मजबूर किया कि वो सिर्फ दर्द झेल रहे शरीर के लिए नहीं, बल्कि उस इंसान की इज़्ज़त के बारे में भी सोचें, जो खुद को एक कभी न खत्म होने वाली ज़िंदगी में फंसा हुआ महसूस कर रहा है। ईथन की कहानी के जरिए भंसाली सिर्फ दर्द को दिखाते नहीं हैं, वो उसे इंसानी रूप देते हैं।
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उस समय जब भारत में इच्छामृत्यु (और आज भी काफी हद तक) एक बड़ा टैबू थी, गुजारिश ने बातचीत की एक जगह खोली। भंसाली ने बाद में कहा था कि फिल्म रिलीज़ होने पर काफी “हंगामा” हुआ था। लेकिन यही हंगामा दिखाता है कि फिल्म ने लोगों के दिल की सीधी नस को छू लिया; इसने दर्शकों को मजबूर किया कि वो सिर्फ दर्द झेल रहे शरीर के लिए नहीं, बल्कि उस इंसान की इज़्ज़त के बारे में भी सोचें, जो खुद को एक कभी न खत्म होने वाली ज़िंदगी में फंसा हुआ महसूस कर रहा है। ईथन की कहानी के जरिए भंसाली सिर्फ दर्द को दिखाते नहीं हैं, वो उसे इंसानी रूप देते हैं।
उसका दर्द खूबसूरत बनाकर नहीं दिखाया गया, उसकी इच्छा कोई बड़ा नाटकीय कदम नहीं है, बल्कि बहुत निजी है। ऐसा करते हुए फिल्म कई नाज़ुक सोचने वाले और कानूनी सवाल खड़ी करती है: कब ज़िंदगी, ज़िंदगी जैसी नहीं रह जाती? फैसले का हक किसके पास होना चाहिए? हम दया और समाज के नियमों के बीच संतुलन कैसे बनाएं? सालों बाद, जब भारत की सुप्रीम कोर्ट ने असहनीय और ठीक न होने वाली बीमारियों में “सम्मान के साथ मरने का अधिकार” को मंज़ूरी दी, तब भंसाली ने याद दिलाया कि गुजारिश ने यह बातचीत तभी शुरू करने की कोशिश की थी, जब देश इस विषय पर खुलकर बात करने के लिए तैयार भी नहीं था।
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उसका दर्द खूबसूरत बनाकर नहीं दिखाया गया, उसकी इच्छा कोई बड़ा नाटकीय कदम नहीं है, बल्कि बहुत निजी है। ऐसा करते हुए फिल्म कई नाज़ुक सोचने वाले और कानूनी सवाल खड़ी करती है: कब ज़िंदगी, ज़िंदगी जैसी नहीं रह जाती? फैसले का हक किसके पास होना चाहिए? हम दया और समाज के नियमों के बीच संतुलन कैसे बनाएं? सालों बाद, जब भारत की सुप्रीम कोर्ट ने असहनीय और ठीक न होने वाली बीमारियों में “सम्मान के साथ मरने का अधिकार” को मंज़ूरी दी, तब भंसाली ने याद दिलाया कि गुजारिश ने यह बातचीत तभी शुरू करने की कोशिश की थी, जब देश इस विषय पर खुलकर बात करने के लिए तैयार भी नहीं था।
भंसाली जिस भारी विषय को दिखा रहे हैं, उसे बहुत करुणा के साथ संभालते हैं। एक इंटरव्यू में उन्होंने इसे “एक बहस बताया जिसका जवाब जल्दी नहीं मिलेगा।” लेकिन भारीपन में जाने के बजाय, वो अपनी पहचान बने खूबसूरत विज़ुअल्स, संगीत और भावनाओं से भरी कहानी का इस्तेमाल करते हैं, ताकि अनुभव बोझिल नहीं बल्कि डूब जाने जैसा लगे। इंसानी दर्द को “श्रद्धांजलि” देने का उनका फैसला जैसा उन्होंने खुद कहा वह बहुत कुछ बताता है। दर्द से नज़रें चुराने के बजाय, भंसाली उसे इज्जत देते हैं और उन लोगों को सम्मान देते हैं जो ऐसी ज़िंदगी जीते हैं जिसकी हम कल्पना भी नहीं कर सकते।
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भंसाली जिस भारी विषय को दिखा रहे हैं, उसे बहुत करुणा के साथ संभालते हैं। एक इंटरव्यू में उन्होंने इसे “एक बहस बताया जिसका जवाब जल्दी नहीं मिलेगा।” लेकिन भारीपन में जाने के बजाय, वो अपनी पहचान बने खूबसूरत विज़ुअल्स, संगीत और भावनाओं से भरी कहानी का इस्तेमाल करते हैं, ताकि अनुभव बोझिल नहीं बल्कि डूब जाने जैसा लगे। इंसानी दर्द को “श्रद्धांजलि” देने का उनका फैसला जैसा उन्होंने खुद कहा वह बहुत कुछ बताता है। दर्द से नज़रें चुराने के बजाय, भंसाली उसे इज्जत देते हैं और उन लोगों को सम्मान देते हैं जो ऐसी ज़िंदगी जीते हैं जिसकी हम कल्पना भी नहीं कर सकते।
फिल्म ‘गुजारिश’ की कलात्मक ताकत उसकी कास्टिंग में भी दिखती है। ऋतिक रोशन ने ईथन के किरदार में नर्मी, झुंझलाहट, हल्की-सी मज़ाकिया बातों और शांत मज़बूती का अच्छा संतुलन दिखाया है। उन्होंने असली पैरालाइज़्ड मरीज़ों से मिलकर वक्त बिताया, उन लोगों से मिले जिनकी ज़िंदगी को वे पर्दे पर दिखा रहे थे, और उन्हें “असली हीरो” कहा। उनकी एक्टिंग ने इस फिल्म को सिर्फ एक आइडिया नहीं रहने दिया, बल्कि इसे दिल से महसूस होने वाली इंसानी कहानी बना दिया। बता दें, ये फिल्म 55 करोड़ के बजट में बनी थी और उस वक्त सिर्फ 39 करोड़ ही कमा पाई थी, लेकिन आज इसे कल्ट फिल्मों में गिना जाता है।
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फिल्म ‘गुजारिश’ की कलात्मक ताकत उसकी कास्टिंग में भी दिखती है। ऋतिक रोशन ने ईथन के किरदार में नर्मी, झुंझलाहट, हल्की-सी मज़ाकिया बातों और शांत मज़बूती का अच्छा संतुलन दिखाया है। उन्होंने असली पैरालाइज़्ड मरीज़ों से मिलकर वक्त बिताया, उन लोगों से मिले जिनकी ज़िंदगी को वे पर्दे पर दिखा रहे थे, और उन्हें “असली हीरो” कहा। उनकी एक्टिंग ने इस फिल्म को सिर्फ एक आइडिया नहीं रहने दिया, बल्कि इसे दिल से महसूस होने वाली इंसानी कहानी बना दिया। बता दें, ये फिल्म 55 करोड़ के बजट में बनी थी और उस वक्त सिर्फ 39 करोड़ ही कमा पाई थी, लेकिन आज इसे कल्ट फिल्मों में गिना जाता है।
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