नई दिल्ली: भारतीय महिलाएं पति की लंबी उम्र के लिये करवाचौथ का व्रत रखती हैं लेकिन देश में कुछ ऐसे हिस्से हैं जहां की स्त्रियां विधवा का जीवन जीकर अपने पति की सलामती मांगती हैं।
पूर्वी उत्तर प्रदेश के देवरिया, गोरखपुर, कुशीनगर तथा बिहार के कुछ हिस्सों में गछवाहा समुदाय की स्त्रियां विधवा जैसा जीवन जीकर अपने पति की सलामती की दुआ मांगती हैं। गछवाहा समुदाय ताड़ी के पेशे से जुडा है। इस समुदाय के लोग ताड़ के पेडों से ताड़ी निकालने का कार्य करते हैं। ताड़ के पेड़ 50 फिट से भी ज्यादा ऊंचे होते हैं तथा एकदम सपाट होते हैं। इन पेडों पर चढकर ताड़ी निकालना बहुत जोखिम का कार्य होता है।
ताड़ी निकालने का काम चैत्र मास से सावन तक चार महीने किया जाता है। गछवाह महिलाएं इन चार महीनों में न तो अपनी मांग में सिंदूर भरती हैं और न ही श्रृंगार करती हैं। वह अपने सुहाग की सभी निशानियां देवरिया जिला मुख्यालय से 30 किलोमीटर दूर तरकुलहा देवी के पास रेहन रखकर अपने पति की सलामती की दुआ मांगती हैं। तरकुलहा गछवाहों की प्रमुख देवी मानी जाती हैं तथा उनका मंदिर गछवाहों का एक प्रमुख धार्मिक स्थल है।
गछवाह महिलाएं चैत्र महीने रामनवमी से लेकर श्रावण के नागपंचमी तक विधवा के भेष में रहती हैं। ताडी का काम खत्म होने के बाद सभी गछवाह महिलाएं नागपंचमी के दिन तरकुलहा देवी के मंदिर में इकटे होती हैं तथा पूजा करने के बाद अपनी मांग भरती हैं। पूजा के बाद सामूहिक गौठ का आयोजन होता है। इस पूजा में पशुबलि देने का भी रिवाज है।
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