विशाल दुबे
कभी आपकी ट्रेन लेट हुई है? मेरे इस सवाल पर मेरे परम मित्र फेसबुक की स्माइली बनाकर मुस्कराए और बोल पड़े जनाब मुस्कराइए कि आप लखनऊ में हैं और सही सलामत पहुंव गए हैं, अम्मा छोड़ो यार ये लेट लतीफी, रेलगाड़ी उनकी लेट होती है जिनके पिछले जन्म कुछ अजब-गजब किस्म के हों। और हो भी गई तो बता दें कि ट्रेन लेट होने पर भी भन्नाट किस्म को सुख होता है, जिंदगी को जरा अलमस्त होकर जीना तो सीखिए। इतने में मुंह में रखा पान पिच से थूक मारा। हमने कहा ‘भाई साहब स्वच्छता अभियान का तो ध्यान रखो, लेकिन वह कहां मानने वाले थे, बोल पड़े ‘भारतीय ट्रेनों का लेट होना उनके लिए उतना ही ज़रूरी काम है जितना हम सबका प्रतिदिन सुबह नित्यकर्म करना...ट्रेन लेट होने पर रेलवे द्वारा खेद प्रकट करना अपने आप में अभूतपूर्व घटना है..। कभी-कभी सोचता हूं कि जितना खेद एक रेलवे उद्घोषक अपनी महीने भर की ड्यूटी में प्रकट कर डालता है, काश उसका दस फीसदी भी वेतन उसको मिल जाए..। मैं तो कहता हूं खेद प्रकट करने का ये ढकोसला अब बंद ही कर देना चाहिए, क्योंकि अब तो हम भारतीयों को रेल की समस्याओं से इश्क जो हो गया है..।‘
खैर इश्क से ट्रेन वाले इश्क की कहानियां याद आ गई। ये कुछ वैसा ही है जैसा कि डीडीएलजी में राहुल (शाहरुख) को सिमरन (काजोल) से हुआ था, कसम से चेन्नई एक्सप्रेस की इश्क में उनकी हर खता सह लेगें हम...उफ न करेंगे सनम तेरी कसम... दिल इस तरह से धड़कता है, मानो राजेश खन्ना टाइप गा रहा हो ‘मेरे सपनों की रानी कब आएगी तू..दिल से ऐसे ही गाते कई प्यार वाले बसंत निकल गए। सोचा दो पटरियों के बीच चलते-चलते उनसे नजर मिलेगी और प्यार हो जाएगा, लेकिन कमबख्त दिल ना जाने किसका इंतजार करता रहता है।
इस महंगाई के जमाने में ट्रेन का सफर कितना महंगा हो गया है, ये तो डेली सफर करने वाला वेतनभोगी ही जानता है, वो अलग बात है कि बचपन के दिनों में कुछ अकंल टाइप के लोगों को बिंदास इलाहाबाद से बनारस फ्री में ट्रेन में सफर करते हुए देखा था।
पर हाय ये दिल! फरवरी के महीने में कुछ लोग इतने चालाक हो गए हैं कि ट्रेन छूटने के बाद घर से यह सोचकर निकलते हैं कि इतने में भी आधा घंटा तो प्लेटफॉर्म पर बिताना ही पड़ेगा...तब तक बिदांस अंदाज में कुछ भन्नाट किस्म की सेल्फी हो जाएगी, फेसबुक पर फोटो पोस्ट कर कुछ लाइक और शेयर बटोर लिए जाएंगे, आज के समय में टाइम का सही उपयोग करने की आदत होनी चाहिए।
खैर बात हो रही थी सही समय पर ट्रेन मिलने का सौभाग्य व्यक्ति को जीवन में एकाध बार ही मिलता है..। अगर रेलवे को खेद प्रकट करना है तो तब करे जब ट्रेन वक़्त पर पहुंच जाए..। सही वक्त पर ट्रेन पहुंचने से जाने कितनों की ट्रेन छूट जाती है...। और लड़ना तो हमारी फितरत में शामिल है...। कभी सीट के लिए तो कभी विंडो सीट के लिए..। रेलवे दावा करता है कि भारतीय रेल तेजी से प्रगति कर रही हैं... सही कहते हैं... हमेशा तरक्की की इबारत लिखती है...वे कश्मीर से कन्याकुमारी तक और फिर कश्मीर तक प्रगति करती हुई चली जाती हैं..।
यह बात दीगर है कि वे बीच में कहीं भी रुक जाती हैं और लेट पहुँचती हैं...गीता में भी कहा गया है कि ‘’कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन’’ अर्थात् कर्म करो फल की चिंता मत करो... भारतीय रेल अपना काम कर रही है...। फल की चिंता वह नहीं करती...एक जगह से दूसरी जगह जा रही है... सीट मिल गई तो ठीक नहीं तो यात्री चाहे नट बोल्ट पर सवार होकर जाए या फिर पंखे पर...या फिर सुगंधित टॉयलेट में...सही सलामत पहुंच गया तो किस्मतवाला नहीं तो प्लॉप हिम्मतवाला..।
अरे भाई रेलवे अफसरों की जादूगरी पर चल रहा है,...जब ट्रेनें नहीं थीं तब सफर करना कितना मुश्किल काम था। लेकिन आज ट्रेनें हैं फिर भी सफर मुश्किल है...वाह! भारतीय रेलवे चिंतन के विकास में बड़ा योगदान देती हैं...बताओ अगर रेल न होती तो शायद ही मैं ऐसा कुछ लिख पाता, लिखने का सुख गजब किस्म का होता है.। हालांकि कुछ प्राणियों में पढ़ने को लेकर भी गजब का दु:ख देखा जाता है। भइया अपनी-अपनी किस्मत है। रेलगाड़ी छुक-छुक करती हुई सरपट भाग रही है..कभी-कभी ओवरलोड होने पर पटरी से पलटी मारकर मृत्यु की महत्ता का बोध भी करा जाती है...ट्रेन में चढ़ गए तो पता नहीं कहां उतरेंगे... इहलोक में या उहलोक में...ट्रेन चल रही हैं यही क्या कम बात है..।
बात करते हो...कल ही एक खबर देख रहा था कि पटना स्टेशन पर मच्छरों और चूहों का प्रकोप है... जिससे बचने के लिए ट्रेन के ड्राइवर और गार्ड मिलकर आउटर सिग्नल के पहले ही एक साफ़-सुथरे स्थान पर अपनी ट्रेन को रोककर आराम करते हैं...। रेल किराया हर साल बढ़ना परम सत्य है...पर गजब कर दिया प्रभु ने रेल बजट में तेजस, उदय के साथ कोई नया किराया नहीं बढ़ाया, कसम से शोले के वीरु-जय के बाद रेलवे की इस प्रभु और मनोज सिन्हा का रेलवे में याराना देखते ही बनता है .. ट्रेन में बाकी लोगों के साथ एक खास वर्ग भी होता है जो आधा सोता रहता है, आधा जागता रहता है...। और ट्रेन की कारस्तानियों से तंग आकर आलोचना करता रहता है...। इसके अलावा देश की समस्त समस्याओं पर उसके अपने विचार होते हैं...! इन सब खामियों के बावजूद मुझे भारतीय रेल से प्यार है...। असहिष्णुता के इस दौर में इनकी सहनशीलता धन्य है... । अभिव्यक्ति की असली आजादी कोई इनसे सीखे...!
(लेखक विशाल दुबे देश के नंबर वन चैनल इंडियाटीवी में कार्यरत है)