नई दिल्ली: 'अगर कोई कहे कि उसे मरने से डर नहीं लगता है तो या तो वह व्यक्ति झूठ बोल रहा है या फिर वह गोरखा है।' यह बात आर्मी के पहले फील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ ने कही थी। उन्होंने यह भी बताया है कि गोरखा का क्या मतलब होता है। भारतीय आर्मी के गोरखा अपनी निडरता के लिए जाने जाते हैं जो देश के सबसे काबिल योद्धाओं में से एक माने जाते हैं। युद्ध भूमि में गोरखा-सानिकों का साहस दुश्मनों में भय पैदा करता है। इन योद्धाओं का हथियार खुखरी है जो 12 इंच लंबा एक मुड़ा हुआ चाकू होता है जो कि हर गोरखा राइफल कर्मियों के पास होता है।
अंग्रेजों ने अपनी फौज में 1857 से पहले ही गोरखा सैनिकों को रखना आरम्भ कर दिया था। 1857 के भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में इन्होंने ब्रिटिश सेना का साथ दिया था क्योंकि उस समय वे ईस्ट इंडिया कम्पनी के लिए काम करते थे। अंग्रेजों के लिए गोरखों ने दोनों विश्वयुद्धों में अपने अप्रतिम साहस और युद्ध कौशल का परिचय दिया। पहले विश्व युद्ध में दो लाख गोरखा सैनिकों ने हिस्सा लिया था, जिनमें से लगभग 20 हजार रणभूमि में वीरगति को प्राप्त गो गये थे। दूसरे विश्वयुद्ध में लगभग ढाई लाख गोरखा जवान सीरिया, उत्तर अफ्रीका, इटली, ग्रीस व बर्मा भी भेजे गए थे। स्वतंत्रता के बाद 10 गोरखा रेजीमेंट में से 6 रेजीमेंट भारतीय सेना मे चली गईं। आजादी के बाद 11वीं रेजीमेंट बनाई गई जिसमें 7वीं और 10वीं रेजीमेंट के गोरखा थे। इस समय भारतीय सेना के 40 हजार गोरखा सैनिक हैं।
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