विशाल दूबे आका 3D, ब्लॉग: बहाना मिल जाए तो सरकार को विपक्ष घेर ले, बहाना मिल जाए तो प्रदर्शन और धरना हो जाता है... बहाना मिल जाए तो मैच में हार का ठीकरा किसी और पर फोड़कर बचा जा सकता है, बहाना मिल जाए तो राजधानी कूड़ा-कूड़ा हो जाए, बहाना मिल जाए तो ऑफिस से एक्स्ट्रा छुट्टी भी मिल सकती है , चाहे बॉस कितना ही दिल से कितना ही खाली क्यो ना हो ...कुल मिलाकर बात ये है कि अपने देश में ‘बहाना’ एक बहुत ही कारगर नुस्खा है… जो न चाहते हुए भी बड़े-बड़े काम चुटकियों में करवा देता है …
बहाना मारने की परंपरा हम भारतीयों को विरासत में मिली... इसके लिए हम नहीं बल्कि हमारे पूर्वज जिम्मेदार हैं...इसकी शुरुआत की पवनसुत हनुमान जी ने...जो लक्ष्मण जी के बहाने पूरा हिमालय पर्वत (सजीवन बूटी के लिए) ही उठा लाए... खैर हनुमान जी तो ठहरे देवात्मा जो कि हट्टे-कट्टे थे, लेकिन बहाना मिले तो मुझ जैसा मरियल से मरियल इंसान भी बड़ा काम कर जाता है... जैसे इस बार वेलेंटाइन डे पर मुझे नहाने का बहाना मिल गया है... आखिर गर्लफ्रेंड से मिलने जो जाना है... लड़कियां खुद भले ही इस मामले में कंजूसी दिखाएं लेकिन उनका ब्वायफ्रेंड नहाने के मामले में दिलदार होना चाहिए... सर्दियों में अक्सर मेरे और पानी के बीच छत्तीस का आंकड़ा हो जाता है... नहाने को लेकर मेरे हाथ तंग जरूर हैं लेकिन इस वेलेंटाइन पर में ये जहमत उठाने को तैयार हूं...इस बार मैं अपनी जानू को नाराज नहीं करना चाहता... क्योंकि पिछली डेट पर मेरे नॉनसेंस सवालों से नाराज होकर उसने मुझे पीट दिया था...
बात बहानों की हो रही है तो कुछ आलसी लोग रजाई से सिर्फ इसीलिए बाहर निकलते हैं कि उनको पेट पूजा करनी होती है... धर्मपत्नी जी भले ही सुबह से उठकर किचन में ताता-थय्या कर रही हों लेकिन ये महाशय आधा दिन चढ़ने तक रजाई के अंदर ही निद्रासन करते रहते हैं... पिछले हफ्ते मेरे घर के सामने कुछ उत्पाती बंदो ने एक लड़की की शिकायत पर एक अंकल को अच्छी तरह कूट दिया... पीटने का बहाना चाहिए था सो मिल गया... जैसे बहाना बनाने का सिस्टम नहीं होता वैसे ही पीटने का भी सिस्टम नहीं होता एक बार शुरु तो फिर कहना ही क्या, खैर लड़की की शिकायत थी कि वो भाटी छोले- कुल्चे भंडार के यहां छोले-कुल्चे पैक करा रही थी कि बगल में खड़े एक अंकल ने उसे आंख मार दी... बस फिर क्या था... भला लड़की की फरियाद कौन नहीं सुनेगा... वो भी अगर लड़की जवानी की दहलीज पर हो तो फिर क्या कहने... अपनी कैटरीना की हिफाजत के लिए हर मोहल्ले का हर बंदा सलमान बन गया... फिर क्या... एक्शन पे एक्शन... दे दबा के... अंकल की खूब सुताई हुई...दो-चार दांत हिलने लग गए... बाद में पता चला कि वो अंकल घरों में पुताई का काम करते हैं... एक बार आंख में चूना चला गया था जिसकी वजह से आंखों में डिफेक्ट आ गया... लेकिन एक लड़की के बहाने जो साइड इफेक्ट मोहल्ले के छोकरों ने नअंकल को दिया अब उसका क्या करें...ये तो ‘बहाना’ है भइया जिसे चाहे बना दे... जिसे चाहे कुटवा दे... डिपेंड करता है आप के पाले क्या पड़ जाए... वैसे मेरे पाले यह व्यंग्य लिखना आया है सो लिख रहा हूं... क्योंकि मुझे भी लिखने का ‘बहाना’ मिल गया...!
(लेखक विशाल दूबे आका 3D युवा पत्रकार और व्यंग्यकार है, वर्तमान में इंडियाटीवी में कार्यरत है )