नयी दिल्ली: मरणोपरांत अशोक चक्र से सम्मानित असम रेजिमेंट के हवलदार हंगपन दादा की पत्नी चासेन लोआंग की इच्छा है कि उनका बेटा और बेटी भारतीय सेना में शामिल हों और पिता की तरह ही बहादुर हों।
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गणतंत्र दिवस परेड के दौरान राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी से शांतिकाल का सर्वोच्च वीरता पुरस्कार अशोक चक्र ग्रहण करते समय लोआंग की आंखें नम थी लेकिन गर्व की भावना से अभिभूत जांबाज जावान की पत्नी ने आंसूओं को रोककर रखा।
दादा ने पिछले साल के 26 मई को सर्वोच्च बलिदान से पहले जम्मू कश्मीर में अकेले तीन आतंकियों को मार गिराया। दादा से 28 अक्तूबर, 2005 को परिणय सूत्र में बंधने वाली लोआंग के साथ दस वर्षीय रॉखिन दादा और सात वर्षीय सेवांग दादा रहते हैं।
पुरस्कार प्राप्त करने के कुछ घंटों बाद एक सैन्य प्रतिष्ठान में लोआंग ने कहा, 'यह बहुत बड़ा सम्मान है। मुझे अपने पति पर गर्व है। मैं खुश हूं और साथ ही उदास भी।'
उन्होंने इस पुरस्कार को उन सभी सैनिकों को समर्पित किया, जो कठिन परिस्थितियों में देश के लिए लड़ रहे हैं।
लोआंग ने कहा कि परिस्थिति को समझने के लिहाज से उनके बच्चे छोटे हैं। हालांकि, उन्होंने साथ ही कहा, मैं चाहती हूं कि वे बल से जुड़ें और अधिकारी बने। उनको अपने पापा की जगह लेनी चाहिए और एक बड़ा अधिकारी बनना चाहिए।
उन्होंने कहा कि वह अपने बच्चों के सामने नहीं रोती हैं। दिवंगत जवान की पत्नी ने कहा, मैं चाहती हूं कि मेरे बच्चे बहादुर हों। उनके लिए मुझे बहादुर बनने की जरूरत है। मुझे यह सुनिश्चित करना है कि वे कड़ी मेहनत करके पढ़ाई करें और भारतीय सेना से जुड़ें।
लोआंग ने इस बात की ओर इशारा किया कि दादा अपने बच्चों को बतौर अधिकारी सेना से जुड़ने के लिए कहते थे इसलिए वह प्रयास करेंगी कि उनके लड़के का दाखिला सैनिक स्कूल में हो सके।