वाराणसी भारत का एक ऐतिहासिक शहर है, कई शताब्दियों से यह शहर तीर्थ यात्रियों और पर्यटकों को अपनी तरफ आकर्षित करता रहा है। पौराणिक हिन्दू जीवन शैली को समझने और सीखने के लिए इस शहर को विशेष तौर पर देखा जाता है। हिन्दू धर्म और उसके दर्शन पर धार्मिक शास्त्रार्थ के लिए आदिगुरु शंकराचार्य ने 8वीं सदी में काशी की यात्रा की थी।
आजादी के बाद से इस ऐतिहासिक शहर को उपेक्षा का शिकार होना पड़ा है। जहां तक नागरिक सुविधाओं और आधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर का सवाल है, इस शहर की उपेक्षा हुई और इसे विकास के हाशिये पर रखा गया। हालांकि पिछले साढ़े 4 साल में जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सांसद के नाते अपने चुनाव क्षेत्र के विकास को उत्साह के साथ संभाला तो यहां काफी बदलाव आया। मकड़ी के जालों की तरह बिजली की नंगी तारों का जो जाल शहर के चेहरे पर एक बदनुमा दाग था, उसे अब खत्म कर दिया गया है। पूरी काशी में अंडरग्राउंड बिजली कैब्लिंग हो गई है। पहले सड़कों पर गड्ढों और अनियमित बिजली की सप्लाई से जुड़ी जो समस्याएं लगातार देखने को मिलती थीं वह अब लगभग खत्म होने के कगार पर हैं।
इतना ही नहीं पवित्र गंगा नदी के तट पर पहले वाराणसी के जो गंदे घाट दिखते थे वह अब साफ कर दिए गए हैं। 4 साल पहले काशी को जापान के क्योटो शहर के भागीदार के तौर पर चुना गया था। काशी भले ही क्योटो की तरह नहीं बन पाया हो लेकिन अब यह ठसक के साथ विकास और आधुनिकता की तरफ बढ़ने का दावा जरूर कर सकता है।
किसी धार्मिक शहर के चेहरे को बदलना इतना आसान नहीं है। हर मोड़ पर आस्था और धर्म के नाम पर रुकावटें आती है. लेकिन प्रगति के रास्ते में वाराणसी की यात्रा जारी है. सोमवार को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने बाबतपुर हवाईअड्डे तक चार लेने वाले हाइवे का शुभारंभ किया, और साथ ही वाराणसी में मल्टी-मोडल टर्मिल का भी उद्घाटन किया। इस टर्मिनल पर पश्चिम बंगाल के हल्दिया से पहली बार गंगा के रास्ते वाराणसी आए कंटेनर जहाज का स्वागत किया गया।
पवित्र जीवनदायिनी गंगा की सफाई का काम भी युद्ध स्तर पर जारी है. यहां फ्लाईओवर और हाइवे बन रहे हैं। किसी भी धार्मिक शहर की विरासत को सहेज कर रखना आसाम काम नहीं है, लेकिन साथ ही आधुनिकता और विकास के रास्ते पर किसी शहर को आगे ले जाना जरूरी भी है। अगर इरादे साफ और इच्छाशक्ति मजबूत हो तो बदलाव हो सकता है। इस बदलाव के बाद भी लोगों के ज़ेहन में एक ही सवाल है कि अगर 4 साल के अंदर इतना कुछ हो सकता है तो फिर पिछले 50 साल में क्यों कुछ नहीं किया गया?