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जानें 125 साल पहले स्वामी विवेकानंद ने क्या कहा था शिकागो भाषण में

 Written By: India TV News Desk
 Published : Sep 11, 2017 02:25 pm IST,  Updated : Sep 11, 2017 02:25 pm IST

हम आपको बता रहे हैं कि क्यों स्वामी विवेकानंद स्वामी के शिकागो भाषण पर आज भी चर्चा होती है। पेश है ऐतिहासिक भाषण के प्रमुख अंश।

Swamy Vivekanand- India TV Hindi
Swamy Vivekanand

आज स्वामी विवेकानंद  के शिकागो भाषण की 125वीं वर्षगांठ है। इस मौक़े पर आज प्रधानमंत्री ने मोदी ने विज्ञान भवन में छात्रों को संबोधित किया और विवेकानंद के भाषण का मर्म समझाया। हम आपको बता रहे हैं कि क्यों स्वामी विवेकानंद स्वामी के शिकागो भाषण पर आज भी चर्चा होती है। पेश है ऐतिहासिक भाषण के प्रमुख अंश।

स्वामी विवेकानंद जब बहुत कम उम्र के थे तभी सारी दुनिया ने उनके ज्ञान का लोहा मान लिया था। 12 जनवरी 1863 को जन्मे इस संन्यासी ने अपनी प्रखर ज्ञान से पूरे विश्व में भारतीय अध्यात्मिकता का ज़बररदस्त प्रचार किया था।

अमेरिका के शिकागो में सन् 1893 में आयोजित विश्व धर्म संसद में दुनिया के सभी धर्मों के प्रतिनिधी आए थे और स्वामी विवेकानंद इसमें सनातन धर्म का प्रतिनिधित्व कर रहे थे। स्वामीजी ने ऐसा यादगार भाषण दिया कि भारत की अतुल्य अध्यात्मिक विरासत और ज्ञान का डंका बज गया।

प्रिय बहनो और भाइयो!

आपके इस स्नेहपूर्ण और जोरदार स्वागत से मेरा हृदय अपार हर्ष से भर गया है। मैं आपको दुनिया की सबसे प्राचीन संत परंपरा की ओर से धन्यवाद देता हूं। मैं आपको सभी धर्मों की जननी की तरफ से धन्यवाद देता हूं और सभी जाति, संप्रदाय के लाखों, करोड़ों हिंदुओं की तरफ से आपका आभार व्यक्त करता हूं। मेरा धन्यवाद कुछ उन वक्ताओं को भी है, जिन्होंने इस मंच से यह कहा कि दुनिया में सहनशीलता का विचार सुदूर पूरब के देश भारत से फैला है। मुझे गर्व है कि मैं एक ऐसे धर्म से हूं, जिसने दुनिया को सहनशीलता और सार्वभौमिक स्वीकृति का पाठ पढ़ाया है।

हम सिर्फ सार्वभौमिक सहनशीलता में ही विश्वास नहीं रखते, बल्कि हम विश्व के सभी धर्मों को सत्य के रूप में स्वीकार करते हैं। मुझे गर्व है कि मैं एक ऐसे देश से हूं, जिसने इस धरती के सभी देशों और धर्मों के परेशान और सताए गए लोगों को शरण दी है। मुझे यह बताते हुए गर्व हो रहा है कि हमने अपने हृदय में उन इजराइलियों की पवित्र स्मृतियां संजोकर रखी हैं, जिनके धर्म स्थलों को रोमन हमलावरों ने तोड़-तोड़कर खंडहर बना दिया था और तब उन्होंने दक्षिण भारत में शरण ली थी।

मुझे इस बात का गर्व है कि मैं एक ऐसे धर्म से हूं, जिसने महान पारसी धर्म के लोगों को शरण दी और अभी भी उन्हें पाल-पोस रहा है। भाइयों, मैं आपको एक श्लोक की कुछ पंक्तियां सुनाना चाहूंगा, जिन्हें मैंने बचपन से स्मरण किया और दोहराया है और जो रोज करोड़ों लोगों द्वारा प्रतिदिन दोहराया जाता है।

रुचीनां वैचित्र्यादृजुकुटिलनानापथजुषाम्। नृणामेको गम्यस्त्वमसि पयसामर्णव इव।। अर्थात : जिस तरह अलग-अलग स्रोतों से निकली विभिन्न् नदियां अंत में समुद्र में जाकर मिलती हैं, उसी तरह मनुष्य अपनी इच्छा के अनुरूप अलग-अलग मार्ग चुनता है।

वे देखने में भले ही सीधे या टेढ़े-मेढ़े लगें, पर सभी भगवान तक ही जाते हैं। वर्तमान सम्मेलन, जो कि आज तक की सबसे पवित्र सभाओं में से है, गीता में बताए गए इस सिद्धांत का प्रमाण है कि 'जो भी मुझ तक आता है, चाहे वह कैसा भी हो, मैं उस तक पहुंचता हूं। लोग चाहे कोई भी रास्ता चुनें, आखिर में मुझ तक ही पहुंचते हैं"।

सांप्रदायिकताएं, कट्टरताएं, हठधर्मिता और इसके भयानक वंशज लंबे समय से पृथ्वी को अपने शिकंजों में जकड़े हुए हैं। इन्होंने पृथ्वी को हिंसा से भर दिया है। कितनी बार ही यह धरती खून से लाल हुई है। कितनी ही सभ्यताओं का विनाश हुआ है और न जाने कितने देश नष्ट हुए हैं।

अगर ये भयानक राक्षस नहीं होते तो आज मानव समाज कहीं ज्यादा उन्न्त होता, लेकिन अब उनका समय पूरा हो चुका है। मुझे पूरी आशा है कि आज इस सम्मेलन का शंखनाद सभी हठधर्मिताओं, हर तरह के क्लेश, चाहे वे तलवार से हों या कलम से और सभी मनुष्यों के बीच की दुर्भावनाओं का विनाश करेगा।

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