नरेन्द्र मोदी ने एक नया रिकॉर्ड बनाया। गुजरात और केंद्र में शासन प्रमुख के तौर पर लगातार काम करते उन्हें 25 साल हो गए। मोदी का कहना है कि वह ambition के लिए नहीं, मिशन के लिए जीते हैं और उनका मिशन है, 2047 तक विकसित भारत। मोदी ने कहा एक दिन आएगा जब दुनिया भर में Made in India planes उड़ाने भरेंगी। मोदी 25 साल से सत्ता में क्यों हैं? मोदी बार-बार चुनाव कैसे जीतते हैं? अगर विपक्षी दलों के नेता मोदी के इस रहस्य को जानना चाहते हैं, तो पहले उन्हें ये देखना होगा कि मोदी कितना काम करते हैं? कैसे करते हैं? मोदी इतने अलग क्यों हैं?
पिछले 25 साल में मोदी ने कभी परंपरागत तरीक़े से राजनीति नहीं की। उन्होंने चुनाव में पार्टी को, कार्यकर्ताओं को जीत का मंत्र दिया, ज़मीन पर लड़ना सिखाया, राजनीति का अंदाज़ बदला, लेकिन सारे विरोधी आज भी पुरानी पारम्परिक शैली में राजनीति करते हैं, इसलिए मोदी को मात नहीं दे पाते। मोदी ने बरसों तक गांव-गांव, गली-गली की ख़ाक छानी है। वहां जो सीखा उसे लागू किया। उन्होंने महिलाओं के लिए शौचालय और रसोई गैस की ज़रूरत को समझा। मोदी ने धारा 370 और राम मंदिर पर देश के मिज़ाज को पहचाना। पाकिस्तान को उसी की भाषा में जवाब दिया। नक्सलवाद का खात्मा किया।
मोदी ने बैंक खातों और कर्ज़ के महत्व को पहचाना। GST, UPI जैसे सुधार किए। नए ज़माने के हिसाब से data center और semi-conductor की अहमियत को समझा। चाहे अमेरिका हो या चीन, मोदी ने कभी आत्मसम्मान से समझौता नहीं किया। दुनिया भर में रहने वाले भारतीय इसके गवाह हैं। मोदी ने अपने अनुभव से जाना कि जनता को क्या परेशान करता है? उसका solution क्या है? घर में बिजली, नल से जल, अस्पताल का ख़र्चा, जब कोई जनता की समस्याओं के बारे में इतना सोचेगा, इतना करेगा, तो वोट क्यों नहीं मिलेंगे? देश के port, airport, सड़कें, रेलवे स्टेशन किस क़दर बदले हैं, ये दिखाई देता है।
किसी भी लीडर की पहचान संकट के समय में होती है। कोविड महामारी इसका एक बड़ा उदाहरण है। 220 करोड़ रुपये के vaccine बनाना और लगवाना, 80 करोड़ लोगों को भोजन पहुंचाना, कोई साधारण काम नहीं है। जो लीडर इस अंदाज़ में काम करेगा, पब्लिक उसे सपोर्ट क्यों नहीं करेगी? मैंने दुनिया में इतनी मेहनत करने वाला, अपने एक-एक मिनट की प्लानिंग करने वाला कोई दूसरा लीडर नहीं देखा। इसीलिए मोदी अगले 25 साल तक इसी तरह कमान संभाले रहें, तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए।
क्या राहुल कॉकरोच पार्टी से मुकाबला कर रहे हैं?
लेकिन राहुल गांधी हंगामे की राह पर ही चल रहे हैं। परसों आकाशवाणी भवन परिसर में ड्रामा किया, कल जंतर मंतर जाने के लिए ड्रामा किया और आज फिर कनाट प्लेस में ड्रामा करने की तैयारी है। राहुल पुलिस से भिड़े, चार घंटे तक ट्रैफिक बंद रहा। आखिर में पुलिस को सख्ती करनी पड़ी। राहुल और प्रियंका गांधी समेत कांग्रेस के नेताओं को बसों में लाद कर हटाया गया। ऐसा लगा कि कांग्रेस अब कॉकरोच जनता पार्टी के साथ one-upmanship (एक दूसरे से आगे निकलने) की लड़ाई लड़ रही है। CJP ने कहा था कि पुलिस की अनुमति मिले या ना मिले, उसके लोग शनिवार 10 अक्टूबर को जंतर-मंतर पर चुनाव आयोग के खिलाफ प्रोटेस्ट करेंगे।
जो राहुल गांधी परसों तक चुनाव आयोग जाने की ज़िद पर अड़े थे, कल उन्होंने जंतर मंतर पर जाने का प्लान बना लिया। पिछली बार जब NEET का मसला उठा था तो पुलिस ने CJP को जंतर-मंतर पर धरने की अनुमति दी थी, एयरपोर्ट पर ही चिट्ठी थमा दी गई थी। कांग्रेस ने इस बार इसी को pre-empt किया। पुलिस ने कांग्रेस को जंतर-मंतर जाने से रोका तो CJP को जंतर मंतर जाने के लिए परमिशन कैसे देगी? पिछली बार CJP को न सिर्फ़ धरने की परमिशन मिली, NEET के मसले पर सरकार ने उनके नेताओं से बात भी की, और शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफ़े का श्रेय भी CJP को मिल गया।
तब भी कांग्रेस को लगा था कि NEET का मुद्दा राहुल गांधी ने पहले उठाया, ख़ूब शोर भी मचाया, प्रधानमंत्री के घर के बाहर प्रोटेस्ट भी किया लेकिन perception की लड़ाई में वो कॉकरोच जनता पार्टी से हार गई। इस बार चुनाव आयोग के मसले पर कांग्रेस की कोशिश है कि वो बाज़ी अपने हाथ से न निकलने दे।
विपक्ष दिखता एक है, पर टुकड़े अनेक हैं
मज़े की बात ये है कि विरोधी दलों में भी कंपिटीशन चल रहा है। एक तरफ राहुल गांधी जंतर मंतर पर पुलिस से भिड़ रहे थे, उसी दिन, उसी वक्त आम आदमी पार्टी के नेता कश्मीरी गेट में दिल्ली चुनाव आयोग के दफ्तर के बाहर 'ज्ञानेश कुमार इस्तीफा दो' के नारे लगा रहे थे। जैसे ही आम आदमी पार्टी का प्रोटेस्ट खत्म हुआ, तो उसी जगह पर वाम दलों के कार्यकर्ता पहुंच गए। उन्होंने भी ज्ञानेश कुमार के खिलाफ नारेबाजी की। लेफ्ट का प्रोटेस्ट खत्म हुआ तो कांग्रेस की NSUI के कार्यकर्ता दिल्ली चुनाव आयोग के दफ्तर के बाहर प्रोटेस्ट करने पहुंच गए।
चुनाव आयोग के ख़िलाफ़ प्रोटेस्ट मुख्य रूप से तीन भागों में अब बंट गया है। एक तरफ़ CJP है, जो इसे युवा पीढी का आंदोलन बनाना चाहती है। उनके साथ वाम दलों का eco-system और cadre है। Youtubers की फ़ौज है। पहले ये आम आदमी पार्टी की ताकत (forte) हुआ करती थी। अब आम आदमी पार्टी अपने अस्तित्व को बचाने की लड़ाई लड़ रही है। अरविंद केजरीवाल को पहले ममता बनर्जी का समर्थन था, उद्धव ठाकरे का साथ था पर अब ये सब कांग्रेस के साथ चले गए हैं।
कांग्रेस चुनाव आयोग के ख़िलाफ़ आंदोलन को अपने नियंत्रण में रखना चाहती है। कल के प्रोटेस्ट की जानकारी समाजवादी पार्टी से छिपाई गई। DMK वैसे भी राहुल गांधी से ख़फ़ा है। आम आदमी पार्टी ने अपनी अलग दुकान खोली हुई है। इसलिए राहुल गांधी दावा तो 300 सांसदों का करते हैं पर हक़ीक़त में कांग्रेस इसका तीसरा faction बनकर रह गई है। जिस मुद्दे पर ज़्यादातर विरोधी दल एकमत हैं, उस पर भी सड़क की लड़ाई बंटी हुई है।
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