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"चुनाव से पहले किसी धर्मगुरू का बयान फतवा नहीं, सियासी बयानबाजी"

 Written By: India TV News Desk
 Published : May 07, 2017 01:11 pm IST,  Updated : May 07, 2017 03:23 pm IST

चुनाव से पहले किसी राजनीतिक दल के पक्ष में दिया गया किसी धर्मगुरू का बयान इस्लामी विद्वानों की नजर में फतवा न होकर महज सियासी बयानबाजी होती है तथा उनके अनुसार धार्मिक मामलों में इसे जारी करने का हक सिर्फ मुफ्ती को है।

Prof. Akhtarul Wasey- India TV Hindi
Prof. Akhtarul Wasey

नयी दिल्ली: चुनाव से पहले किसी राजनीतिक दल के पक्ष में दिया गया किसी धर्मगुरू का बयान इस्लामी विद्वानों की नजर में फतवा न होकर महज सियासी बयानबाजी होती है तथा उनके अनुसार धार्मिक मामलों में इसे जारी करने का हक सिर्फ मुफ्ती को है। विद्वानों के मुताबिक फतवा इस्लामी मामलों पर दी जाने वाली राय होती है और यह सिर्फ वह आधिकारिक शख्स ही दे सकता है जिसने फतवा देने की तालीम हासिल की हो। फतवा देने की तालीम हासिल करने वाले व्यक्ति को मुफ्ती कहते हैं। गैर इस्लामी मामलों पर फतवा नहीं दिया जा सकता है। जाने माने इस्लामी विद्वान और जोधपुर के मौलाना आजाद विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो अख्तर उल वासे ने भाषा से कहा, फतवा एक मत है जिसकी पाबंदी अनिवार्य नहीं है। फतवा देने का अधिकार सब को नहीं है चाहे वह धर्मगुरू ही क्यों न हों। इसके लिए विशेष किस्म का प्रशिक्षण होता है जिसको पूरा करने के बाद कोई मुफ्ती बनता है और वह फतवा जारी कर सकता है। (कपिल मिश्रा का बड़ा आरोप, सत्येंद्र जैन ने केजरीवाल को दिए थे 2 करोड़ रुपए)

उन्होंने कहा, मुफ्ती किसी बात पर कोई मत तब व्यक्त करता है जब उससे (इस्लाम से संबंधित) कोई सवाल पूछा गया हो। वासे ने कहा कि कोई भी इमाम या मौलाना धर्म के मामले पर कोई राय दे रहे हैं तो उसे हमेशा धर्म की सही अभिव्यक्ति नहीं माननी चाहिए। वासे ने कहा कि मुफ्ती का प्रशिक्षण मदरसों में होता है। वहां पाठ्यक्रम पूरा करने के बाद अगर कोई आलिम और फाजिल बनता है तो कोई कुरान की व्याख्या करने वाला। उन्होंने कहा कि इस्लामी कानून विधि की व्याख्या करने वाला ही मुफ्ती कहलाता है और फतवा देने का हक उसे ही होता है। उन्होंने कहा कि किसी भी मौलाना की बात को फतवे के तौर पर पेश करना सरासर गलत है।

वासे ने कहा कि फतवे की पाबंदी जरूरी नहीं है और यह व्यक्ति पर निर्भर करता है कि वह उसे माने या नहीं माने। दिल्ली की फतेहपुरी मस्जिद के शाही इमाम मौलाना मुफ्ती मुकर्रम ने कहा, अगर आप किसी मामले पर शरिया या इस्लामी नियमों पर कोई जानकारी चाहते हैं तो आप मुफ्ती के पास जाते हैं और जब मुफ्ती आपको वह जानकारी दे देते हैं तो उसे फतवा कहते हैं। मुफ्ती मुकर्रम ने कहा, मदरसों में पढ़ाई के बाद फतवे का विशेष कोर्स होता है और इसको पूरा करने के बाद मुफ्ती की डिग्री मिलती है जिसके बाद फतवा देने का अधिकार आता हैा मुफ्ती मुकर्रम ने कहा कि मुफ्ती के अलावा कोई भी इमाम या मौलाना फतवा नहीं दे सकता है।

उन्होंने कहा किसी इमाम या मौलाना के बयान को फतवे के तौर पर पेश किए जाने पर आपत्ति जताई जानी चाहिए और मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड को ऐसे मामलों को देखना चाहिए और उन्हें यह काम जिम्मेदारी से करना चाहिए। उन्हें इसके लिए एक टीम बनानी चाहिए। इस्लामी विद्वान और अखिल भारतीय युनाइटेड मोर्चा के महासचिव मौलाना अब्दुल हामिद नोमानी ने कहा, धार्मिक मामले पर किसी सवाल के जवाब में फतवा दिया जाता है वह लिखित या मौखिक हो सकता है और यह मुफ्ती ही दे सकता है। अगर कोई इस्लामी जानकार शरिया की बात पर जानकारी देता है तो उसे फतवा नहीं कहा जाएगा। उन्होंने कहा, आजकल सियासी बयान या किसी पार्टी को समर्थन देना होता है तो यह ऐसा है कि किसी व्यक्ति ने किसी पार्टी को समर्थन दिया हो। लेकिन इसे फतवे का नाम देना गलत है और फतवे को बदनाम करना है तथा लोगों के दिलों में गलत सोच को पैदा करने की कोशिश है।

 

 

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