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मुख्यधारा की पार्टियों और अलगाववादी संगठनों के साथ आने का वक्त आ गया है: अब्दुल्ला

 Reported By: Bhasha
 Published : May 21, 2018 07:46 pm IST,  Updated : May 21, 2018 07:46 pm IST

अब्दुल्ला ने कहा कि आज यह हम सभी के लिए जरूरी है- चाहे वह मुख्यधारा की पार्टी हो, या फिर अलगाववादी, वे घाटी को वर्षों से प्रभावित कर रही इस त्रासदी को खत्म करने के लिए एकसाथ आएं...

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श्रीनगर: नेशनल कॉन्फ्रेंस के अध्यक्ष फारूक अब्दुल्ला ने आज कहा कि कश्मीर में आतंकवादी खुद से संचालित हो रहे हैं। साथ ही, उन्होंने कश्मीरी आवाम की परेशानी खत्म करने के लिए मुख्यधारा की पार्टियों और अलगाववादी संगठनों के साथ आने की भी हिमायत की। अब्दुल्ला ने यहां पीटीआई को दिए इंटरव्यू में कहा कि वह नहीं जानते कि अलगाववादियों सहित क्या कोई राजनीतिक संगठन आज घाटी में प्रासंगिक है।

जम्मू कश्मीर के तीन बार मुख्यमंत्री रह चुके अब्दुल्ला ने कहा, ‘‘मैं नहीं जानता कि कौन प्रासंगिक है क्योंकि लड़के खुद से संचालित हो रहे हैं। मुझे नहीं लगता कि कोई उनका नियंत्रण कर रहा है, या कोई उनका आका है।’’ अब्दुल्ला ने कहा कि आज यह हम सभी के लिए जरूरी है- चाहे वह मुख्यधारा की पार्टी हो, या फिर अलगाववादी, वे घाटी को वर्षों से प्रभावित कर रही इस त्रासदी को खत्म करने के लिए एकसाथ आएं। श्रीनगर से लोकसभा सदस्य अब्दुल्ला ने कहा कि उन्हें आशा है कि कश्मीर के युवा पत्थरबाजी सहित हिंसा के सभी स्व रूपों की निरर्थकता को महसूस करेंगे।

उन्होंने कहा, ‘‘इससे उनकी शिक्षा प्रभावित हो रही है, जनजीवन दयनीय हो रहा है और आज हमारे पास अपने भविष्य के लिए बचाने को सिर्फ पर्यटन है... हमारे प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में इस बात का जिक्र किया है कि पर्यटन इतना पैसा देगा कि न सिर्फ राज्य उसका लाभ उठाएगा, बल्कि राष्ट्र को भी इसका लाभ मिलेगा।’’ उन्होंने कहा, ‘‘हमारी ‘जीवन रेखा’ पर्यटन है और यह संघर्ष कश्मीरी पर्यटन के अस्तित्व को नष्ट करता रहेगा।’’ अब्दुल्ला ने कहा कि घाटी में चल रही त्रासदी के लिए न सिर्फ कश्मीरी जिम्मेदार हैं, बल्कि पाकिस्तान भी जिम्मेदार है जो कश्मीर में आतंकवादियों को भेज रहा है।

नेशनल कान्फ्रेंस के अध्यक्ष ने कहा, ‘‘यदि पाकिस्तान ने घाटी में आतंकवादियों की घुसपैठ कराना बंद कर दिया होता तो शायद स्थिति काफी समय पहले ही ठीक हो गई होती। यह त्रासदी है कि घाटी में उनके निहित स्वार्थ हैं और उनके पास ऐसे लोग हैं जो उनके आंदोलन का समर्थन करते हैं।’’ उन्होंने कहा कि केंद्र को भी उसी तरह का कदम उठाना होगा, जैसा पूर्व प्रधानमंत्रियों- अटल बिहारी वाजपेयी और मनमोहन सिंह ने पाकिस्तान से वार्ता करने का कदम उठाया था। उन्होंने कहा, ‘‘कुछ व्यावहारिक संबंध होने पर ही भारत और पाकिस्तान कश्मीर मुद्दे को सुलझा सकते हैं। वार्ता के बगैर, मुझे आगे कुछ उम्मीद नजर नहीं आती।’’

अब्दुल्ला ने कहा, ‘‘इसलिए हमें सीधे तौर पर स्थिति से निपटने की जरूरत है। मैं इस बात को लेकर आश्वस्त हूं कि दोनों ओर ऐसे लोग हैं जो शांति, समृद्धि और दोनों मुल्कों की तरक्की चाहते हैं।’’ केंद्र द्वारा रमजान के दौरान एकतरफा संघर्षविराम की घोषणा के विषय पर उन्होंने कहा कि यह बहुत ही स्वागतयोग्य कदम है। उन्होंने कहा, ‘‘हमें आशा है कि पाकिस्तान भी ऐसा करेगा क्योंकि उसने वाजपेयी के समय ऐसा किया था। उस वक्त सभी पार्टियों, अलगाववादियों और अन्य ने इसका स्वागत किया था। लेकिन आज स्थिति अलग है। अलगाववादियों ने इसे स्वीकार नहीं किया है, पाकिस्तान की प्रतिक्रिया नहीं आ रही। इसलिए हम असमंजस में हैं कि क्या यह सचमुच में प्रभावी होगा।’’ हालांकि, उनके और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के बीच नजदीकी बढ़ने के बारे में पूछे गए एक सवाल को वह टाल गए।

अब्दुल्ला ने कहा, ‘‘प्रधानमंत्री को पूरे राष्ट्र के बारे में सोचना है। वह हर किसी के प्रधानमंत्री हैं। मुझे याद है कि वाजपेयी जी आरएसएस से जुड़े हुए थे और उनके साथ 23 पार्टियां थीं, जिनका नेतृत्व करने में वह सक्षम थे। वह नेतृत्व करने में सफल रहे क्योंकि उन्होंने समझ लिया था कि यह विविधताओं का देश है और राष्ट्र को समृद्ध एवं प्रगति के पथ पर बढ़ाने के लिए विविधता को मजबूत करना होगा।’’ उन्होंने कहा, ‘‘मुझे आशा है और कामना करता हूं कि मोदी जी भी एकता और विविधता की उसी राह का अनुकरण करेंगे।’’ ‘दोस्त बदले जा सकते हैं, पड़ोसी नहीं’, वाजपेयी की इस उक्ति का जिक्र करते हुए अब्दुल्ला ने भारत और पाकिस्तान से अतीत को भूलने और मित्रवत राष्ट्र के तौर पर आगे बढ़ने की अपील की।

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