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महिला आरक्षण से जुड़े प्रदर्शन को लेकर अलका लांबा दोषी करार, 5 जून को सजा सुनाएगा राउज एवेन्यू कोर्ट

 Reported By: Atul Bhatia, Edited By: Shakti Singh
 Published : May 25, 2026 08:06 pm IST,  Updated : May 25, 2026 08:10 pm IST

अलका लांबा पर पुलिसकर्मियों के साथ धक्का मुक्की करने और सरकारी काम में रुकावट डालने के मामले में दोषी ठहराया गया है। हालांकि, सजा का ऐलान 5 जून को होगा।

Alka Lamba- India TV Hindi
अलका लांबा Image Source : PTI

दिल्ली की राउज एवेन्यू कोर्ट ने कांग्रेस नेता अलका लांबा को महिला आरक्षण लागू करने की मांग को लेकर हुए प्रदर्शन के दौरान पुलिसकर्मी से धक्का-मुक्की और सरकारी काम में रुकावट डालने के मामले में दोषी ठहराया है। अदालत अब 5 जून को सजा पर सुनवाई करेगी। यह मामला 29 जुलाई 2024 का है, जब जंतर-मंतर पर महिला आरक्षण को लागू करने की मांग को लेकर प्रदर्शन किया गया था। पुलिस का कहना था कि उस इलाके में धारा 163 बीएनएसएस के तहत रोक लगी हुई थी और संसद की ओर मार्च निकालने की इजाजत नहीं दी गई थी। इसके बावजूद प्रदर्शनकारी आगे बढ़ने की कोशिश कर रहे थे।

पुलिसकर्मियों ने धक्का-मुक्की के आरोपी लगाए

अभियोजन पक्ष के मुताबिक, प्रदर्शन के दौरान अलका लांबा ने संसद के घेराव के नारे लगाए, बैरिकेड तोड़ने की कोशिश की गई और सड़क पर बैठकर रास्ता रोका गया। पुलिस ने आरोप लगाया कि इस दौरान पुलिसकर्मियों के साथ धक्का-मुक्की भी हुई। घटना के बाद संसद मार्ग थाने में एफआईआर दर्ज की गई थी। अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट अश्वनी पंवार ने लांबा को दोषी ठहराया और लांबा की सजा पर दलीलें सुनने के लिए पांच जून की तारीख तय की। 

इन धाराओं के तहत कोर्ट ने दोषी माना

राउज एवेन्यू कोर्ट के एसीजेएम अश्विनी पंवार ने कहा कि रिकॉर्ड में मौजूद दस्तावेज, गवाहों के बयान और दूसरे सबूतों से यह साफ होता है कि आरोप साबित होते हैं। अदालत ने अलका लांबा को भारतीय न्याय संहिता की धारा 132, 221, 223(ए) और 285 के तहत दोषी माना।

अलका लांबा के वकीले ने क्या कहा?

अलका लांबा की तरफ से अदालत में कहा गया कि प्रदर्शन शांतिपूर्ण था और तय जगह पर ही किया गया था। बचाव पक्ष ने यह भी कहा कि मामले में कोई स्वतंत्र गवाह नहीं है, किसी पुलिसकर्मी की चोट की मेडिकल रिपोर्ट नहीं है और वीडियो में भी अलका लांबा किसी पुलिसकर्मी पर हमला करती नजर नहीं आतीं।

फरवरी में खारिज हुई थी याचिका

मजिस्ट्रेट अदालत ने पिछले साल दिसंबर में एक आदेश दिया था कि मामले में लोक सेवक को कर्तव्य निर्वहन से रोकने के लिए हमला या आपराधिक बल प्रयोग करने, लोक अधिकारी के कार्य में बाधा डालने, लोक सेवक की ओर से विधिवत जारी किए गए आदेश की अवज्ञा करने और सार्वजनिक मार्ग में खतरा या बाधा उत्पन्न करने के अपराधों के लिए आरोप तय किए जाएं। लांबा की मजिस्ट्रेट के आदेश के खिलाफ दायर पुनर्विचार याचिका को छह फरवरी को खारिज कर दिया गया था।

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