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सावन का आखिरी शनि प्रदोष व्रत, शिव से वरदान पाने के लिए इस शुभ मुहूर्त में ऐसे करें पूजा

 Written By: India TV Lifestyle Desk
 Published : Jul 31, 2020 09:22 pm IST,  Updated : Jul 31, 2020 09:22 pm IST

सी भी प्रदोष व्रत के दिन भगवान शिव की महिमा अपरमपार होती है। प्रदोष व्रत में प्रदोष काल का बहुत महत्व होता है। जानिए शनि प्रदोष व्रत का शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और व्रत कथा।

प्रदोष व्रत पूजा विधि, व्रत कथा और शुभ मुहूर्त- India TV Hindi
प्रदोष व्रत पूजा विधि, व्रत कथा और शुभ मुहूर्त Image Source : INSTAGRAM/LIBERTYAGARBATHI

श्रावण शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि और शनिवार का दिन है । त्रयोदशी तिथि रात 9 बजकर 55 मिनट तक रहेगी। इसके साथ ही प्रदोष व्रत है | शनिवार को पड़ने के कारण शनि प्रदोष व्रत कहा जाएगा। शनि प्रदोष व्रत को शनि प्रदोषम् भी कहा जाता है | किसी भी प्रदोष व्रत के दिन भगवान शिव की महिमा अपरमपार होती है | प्रदोष व्रत में प्रदोष काल का बहुत महत्व होता है | प्रदोष काल उस समय को कहा जाता है, जब दिन छिपने लगता है, यानि सूर्यास्त के ठीक बाद वाले समय और रात्रि के प्रथम प्रहर को प्रदोष काल कहा जाता है। आपको बता दें सावन का आखिरी प्रदोष व्रत है। जिसके कारण इसका महत्व और अधिक बढ़ जाता है।  

त्रयोदशी के दिन प्रदोष काल के समय भगवान शंकर की पूजा का विधान है | त्रयोदशी की रात के पहले प्रहर में जो व्यक्ति किसी भेंट के साथ शिव प्रतिमा के दर्शन करता है, उसे जीवन में सुख ही सुख मिलता है | लिहाजा आज के दिन शिव प्रतिमा के दर्शन अवश्य ही करने चाहिए | आज शनि प्रदोष के दिन भगवान शंकर के साथ ही शनिदेव की पूजा का बड़ा ही महत्व है | शनि प्रदोष व्रत सुख-समृद्धि में बढ़ोतरी और संतान की कामना से किया जाता है | 

शनि प्रदोष व्रत शुभ मुहूर्त

सावन माह के शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि का 31 जुलाई को रात 10 बजकर 42 मिनट से शुरू होगा जोकि 1 अगस्त को रात 09 बजकर 55 मिनट तक रहेगा।

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शनि प्रदोष व्रत की पूजा विधि

ब्रह्म मुहूर्त में उठकर सभी कामों से निवृत्त होकर भगवान शिव का स्मरण करते हुए इस व्रत का संकल्प करें। शाम को सूर्यास्त होने के एक घंटें पहले स्नान करके सफेद कपडे पहनें। इसके बाद ईशान कोण में किसी एकांत जगह पूजा करने की जगह बनाएं। इसके लिए सबसे पहले गंगाजल से उस जगह को शुद्ध करें फिर इसे गाय के गोबर से लिपे। इसके बाद पद्म पुष्प की आकृति को पांच रंगों से मिलाकर चौक को तैयार करें। इसके बाद आप कुश के आसन में उत्तर-पूर्व की दिशा में बैठकर भगवान शिव की पूजा करें। भगवान शिव का जलाभिषेक करें साथ में ऊं नम: शिवाय: का जाप भी करते रहें। इसके बाद बेल पत्र, गंध, अक्षत (चावल), फूल, धूप, दीप, नैवेद्य (भोग), फल, पान, सुपारी, लौंग व इलायची चढ़ाएं। शाम के समय पुन: स्नान करके इसी तरह शिवजी की पूजा करें। शिवजी का षोडशोपचार पूजा करें, जिसमें भगवान शिव की सोलह सामग्री से पूजा करें। भगवान शिव को घी और शक्कर मिले जौ के सत्तू का भोग लगाएं। आठ दीपक आठ दिशाओं में जलाएं। आठ बार दीपक रखते समय प्रणाम करें। शिव आरती करें। शिव स्त्रोत, मंत्र जाप करें। रात्रि में जागरण करें।

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शनि प्रदोष व्रत कथा

स्कंद पुराण के अनुसार प्राचीन काल में एक विधवा ब्राह्मणी अपने पुत्र को लेकर भिक्षा लेने जाती और संध्या को लौटती थी। एक दिन जब वह भिक्षा लेकर लौट रही थी तो उसे नदी किनारे एक सुन्दर बालक दिखाई दिया जो विदर्भ देश का राजकुमार धर्मगुप्त था। शत्रुओं ने उसके पिता को मारकर उसका राज्य हड़प लिया था। उसकी माता की मृत्यु भी अकाल हुई थी। ब्राह्मणी ने उस बालक को अपना लिया और उसका पालन-पोषण किया।

कुछ समय पश्चात ब्राह्मणी दोनों बालकों के साथ देवयोग से देव मंदिर गई। वहां उनकी भेंट ऋषि शाण्डिल्य से हुई। ऋषि शाण्डिल्य ने ब्राह्मणी को बताया कि जो बालक उन्हें मिला है वह विदर्भदेश के राजा का पुत्र है जो युद्ध में मारे गए थे और उनकी माता को ग्राह ने अपना भोजन बना लिया था। ऋषि शाण्डिल्य ने ब्राह्मणी को प्रदोष व्रत करने की सलाह दी। ऋषि आज्ञा से दोनों बालकों ने भी प्रदोष व्रत करना शुरू किया।

एक दिन दोनों बालक वन में घूम रहे थे तभी उन्हें कुछ गंधर्व कन्याएं नजर आई। ब्राह्मण बालक तो घर लौट आया किंतु राजकुमार धर्मगुप्त "अंशुमती" नाम की गंधर्व कन्या से बात करने लगे। गंधर्व कन्या और राजकुमार एक दूसरे पर मोहित हो गए, कन्या ने विवाह करने के लिए राजकुमार को अपने पिता से मिलवाने के लिए बुलाया। दूसरे दिन जब वह दुबारा गंधर्व कन्या से मिलने आया तो गंधर्व कन्या के पिता ने बताया कि वह विदर्भ देश का राजकुमार है। भगवान शिव की आज्ञा से गंधर्वराज ने अपनी पुत्री का विवाह राजकुमार धर्मगुप्त से कराया।

इसके बाद राजकुमार धर्मगुप्त ने गंधर्व सेना की सहायता से विदर्भ देश पर पुनः आधिपत्य प्राप्त किया। यह सब ब्राह्मणी और राजकुमार धर्मगुप्त के प्रदोष व्रत करने का फल था। स्कंदपुराण के अनुसार जो भक्त प्रदोषव्रत के दिन शिवपूजा के बाद एक्राग होकर प्रदोष व्रत कथा सुनता या पढ़ता है उसे सौ जन्मों तक कभी दरिद्रता नहीं होती।

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