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सच बोलना पड़ा महंगा! रिश्वत पर सच बोलना पड़ा भारी, जल संसाधन विभाग के EE सीबी अहिरवार सस्पेंड

 Written By: India TV MP Bureau Desk
 Published : Oct 31, 2026 09:49 am IST,  Updated : Oct 31, 2026 09:49 am IST

पन्ना के जल संसाधन विभाग में रिश्वतखोरी के मामले के बीच एक अधिकारी का बयान सुर्खियों में है। वायरल बयान के बाद जल संसाधन विभाग के कार्यपालन यंत्री को अब निलंबित कर दिया गया है।

जल संसाधन विभाग के EE सीबी अहिरवार सस्पेंड- India TV Hindi
जल संसाधन विभाग के EE सीबी अहिरवार सस्पेंड Image Source : STRINGER INPUT

मध्य प्रदेश के पन्ना जिले में जल संसाधन विभाग ने कार्यकारी अभियंता यानी एग्जीक्यूटिव इंजीनियर सी.बी. अहिरवार को निलंबित कर दिया है। उन्होंने कैमरे पर यह स्वीकार किया था कि वे खुशी-खुशी पैसे लेते हैं, जिसके बाद जनता में भारी आक्रोश फैल गया। यह कार्रवाई पन्ना में लोकायुक्त द्वारा बिछाए गए एक जाल के बाद की गई, जिसमें विभाग के दो कर्मचारी 45,000 रुपये की रिश्वत लेते हुए पकड़े गए। सागर लोकायुक्त की टीम ने 45 हजार रुपये की रिश्वत लेते हुए विभाग के 2 कर्मचारियों को रंगे हाथों गिरफ्तार किया।

पन्ना में क्या हुआ?

28 अक्टूबर को सागर लोकायुक्त पुलिस ने संभागीय लेखाकार यानी डिविजनल अकाउंटेंट दीपक परिहार और क्लर्क अरविंद पाठक को 45,000 रुपये लेते हुए रंगे हाथों पकड़ा। आरोप है कि 'मझगवां मध्यम परियोजना' से जुड़े नहर निर्माण कार्य का अंतिम बिल पास करने के बदले यह रिश्वत मांगी गई थी। एक ठेकेदार ने शिकायत की थी कि उसके काम का भुगतान महीनों से रुका हुआ है और अधिकारी बिल पास करने के लिए पैसे मांग रहे हैं। लोकायुक्त टीम ने इस कार्रवाई के दौरान परिहार से 15,000 रुपये और पाठक से 30,000 रुपये बरामद किए।

वह बयान जो वायरल हो गया

गिरफ्तारी के बाद अहीरवार ने पत्रकारों से रिश्वत के आरोपों के बारे में बात की। सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हुए एक वीडियो में उन्होंने कथित तौर पर कहा कि उन्होंने किसी तय 'प्रतिशत' या कमीशन की मांग नहीं की, लेकिन अगर कोई अपनी मर्जी से पैसे देता था तो वे उसे ले लेते थे। उनके इस बयान को रिश्वत लेने की बात कबूल करने के तौर पर देखा गया, जबकि लोकायुक्त की कार्रवाई में पकड़े गए कर्मचारियों में वे शामिल नहीं थे। उनके इस बयान की कड़ी आलोचना हुई, क्योंकि ऐसा लगा जैसे वे भ्रष्टाचार को गलत मानने के बजाय उसे सामान्य बता रहे हों।

सरकार की कार्रवाई

राज्य सरकार ने अहीरवार को तत्काल प्रभाव से निलंबित (सस्पेंड) कर दिया और अगले आदेश तक उन्हें भोपाल कार्यालय से संबद्ध कर दिया। खबरों के अनुसार, निलंबन आदेश में उनके बयान को अनुशासनहीनता और कदाचार माना गया है और कहा गया है कि यह 'मध्य प्रदेश सिविल सेवा (आचरण) नियम 1965' का उल्लंघन है। सरकार ने अपनी मर्जी से दिए गए पैसे लेने की बात सार्वजनिक रूप से स्वीकार करने को एक सरकारी कर्मचारी से अपेक्षित आचरण का गंभीर उल्लंघन माना है। आदेश में इस बात का भी जिक्र है कि उनका बयान वायरल हो गया था, जिससे विभाग की साख को नुकसान पहुंच सकता है।

रिश्वतखोरी को लेकर चल रही जांच

इस मामले ने पन्ना जल संसाधन विभाग की जांच को और तेज कर दिया है, जहां पहले से ही कथित रिश्वतखोरी के एक नेटवर्क की जांच चल रही थी। लोकायुक्त की कार्रवाई में भले ही दो कनिष्ठ कर्मचारी निशाने पर आए हों, लेकिन अहिरवार का निलंबन यह दिखाता है कि जन-विश्वास को ठेस पहुंचाने वाले आचरण के लिए वरिष्ठ अधिकारियों को भी प्रशासनिक परिणामों का सामना करना पड़ सकता है। यह घटना एक बड़ा सवाल भी खड़ा करती है: क्या किसी अधिकारी की बेबाक या लापरवाही भरी टिप्पणी कदाचार का सबूत बन सकती है? इस मामले में अहिरवार ने रिश्वत मांगने और लेने के बीच अंतर बताकर बचने की कोशिश की, लेकिन उनकी यह दलील काम नहीं आई। इसके बजाय उनके खिलाफ तुरंत अनुशासनात्मक कार्रवाई शुरू कर दी गई। आगे की कार्रवाई लोकायुक्त की जांच, निलंबन आदेश के विवरण और इसके बाद होने वाली किसी भी विभागीय या आपराधिक कार्यवाही पर निर्भर करेगी।

(इनपुट - अमित सिंह राठौर)

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