नागपुर संभाग स्नातक निर्वाचन क्षेत्र में भारतीय जनता पार्टी को लगातार दूसरी बार हार का सामना करना पड़ा है। इस हार का संज्ञान पार्टी के वरिष्ठ नेताओं ने लिया है। प्रदेश पदाधिकारी से सवाल किया गया है कि इस निर्वाचन क्षेत्र के 6 जिलों में विधानसभा और विधान परिषद को मिलाकर महायुती के 31 विधायक होने, मुख्यमंत्री केंद्रीय मंत्री और राज्य मंत्रियों की पूरी फौज मौजूद होने के बाद भी नागपुर की सीट कैसे गंवा दी गई? वरिष्ठ नेता यह सवाल उठा रहे हैं कि, स्थानीय विधायक जिनकी संख्या 31 थी, कब तक मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ,केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी और राजस्व मंत्री चंद्रशेखर बावनकुले के भरोसे चुनाव प्रचार करते रहेंगे, क्या वह खुद भी जीत के लिए अतिरिक्त प्रयास करेंगे या नहीं?
क्यों झटका है नागपुर में हार?
राजनीति में कांग्रेस को लेकर ये कहावत बहुत ही प्रसिद्ध थी कि कांग्रेस को कोई और नहीं बल्कि कांग्रेस की हराती है। हालांकि, यह कहावत अब नागपुर की सीट हारने के बाद भारतीय जनता पार्टी पर भी चर्चा का विषय बन गई है। कहा जाने लगा है कि अब भारतीय जनता पार्टी ही भारतीय जनता पार्टी को हराने लगी है। यह भी गुटबाजी के संदर्भ में ही है, जो चुनाव में नागपुर में खुली बगावत और गुटबाजी के रूप में देखने को मिली। यह बात इसलिए भी चर्चा में है, क्योंकि नागपुर न केवल संघ का मुख्यालय है, बल्कि ये राज्य के मुखिया देवेंद्र फडणवीस, केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी का गढ़ है। जब से बीजेपी ने अपना उम्मीदवार घोषित किया था तभी से स्थानीय भाजपा कई खेमों में बंट गए। कोई दबी जुबान में नाराजगी जता रहा था, तो कोई खुलेआम विरोध मोड पर आ गया था। जिस तरीके की माइक्रो प्लानिंग बीजेपी की चल रही थी, उससे दावा किया जा रहा था कि वह अपने इस घर को दोबारा हासिल करने में सफल होगी, लेकिन यह सफलता नहीं मिली।
क्या रहे भाजपा की हार के प्रमुख कारण?
- भारतीय जनता पार्टी ने मतदाता पंजीकरण की जिम्मेदारी डेढ़ साल पहले सुधाकर कोहले को प्रमुख बनाकर दे दी थी। उनको उम्मीदवारी का संकेत भी दे दिया गया था। हालांकि, चुनाव नजदीक आते ही अनिल सोले, सुधीर दिवे, गिरीश देशमुख जैसे दावेदार सक्रिय हो गए। उम्मीदवार चयन को लेकर पार्टी के नेताओं में असंतोष बढ़ गया था।
- भारतीय जनता पार्टी के खेमे में इस चुनाव में एन वक्त पर बड़ी बगावत देखने को मिली। मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस, नितिन गडकरी को नाराज नेताओं को मनाने के लिए सक्रिय होना पड़ा।
- अब तक इस सीट पर जनसंघ और भारतीय जनता पार्टी की तरफ से ब्राह्मण उम्मीदवार ही खड़ा होता आया है। इस बार बीजेपी ने कुनबी समाज के उम्मीदवार को मैदान पर उतारा। इसको लेकर विशेष तौर पर ब्राह्मण समाज भी काफी ज्यादा नाराज था। जनसंघ के पूर्व अध्यक्ष बछराज व्यास, गंगाधर राव फडणवीस(मुख्यमंत्री के पिता), केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी, पूर्व विधायक अनिल सोले, पूर्व विधायक संदीप जोशी यह सभी ब्राह्मण वर्ग से आते हैं। 2020 में कांग्रेस ने ब्राह्मण वर्सेस ओबीसी करके यह चुनाव 58 साल बाद अपने पक्ष में कर लिया था।
- भारतीय जनता पार्टी ने माइक्रो प्लानिंग करते हुए सिर्फ प्रेफरेंस 1 का प्रचार किया। उसे उम्मीद थी कि प्रेफरेंस 1 में पहले राउंड में ही जीत दर्ज हो जाएगी। उन्होंने प्रेफरेंस 2 के लिए अन्य उम्मीदवारों से संपर्क तक नहीं किया, जो की हार का मुख्य कारण बना।
- 15032 में मत अवैध होने में सबसे अधिक परेशानी भारतीय जनता पार्टी को उठानी पड़ी। इनमें से 9000 इनवेलिड मत इस तरीके के थे जैसे लग रहा था कि जानबूझकर यह किया गया है। बीजेपी के उम्मीदवार के सामने 2 लिख दिया गया था जो इनवेलिड मत हो गए। प्रेफरेंस 1 की जगह 2, दो लिखना कहीं ना कहीं यह बड़ी साजिश लग रही है। भारतीय जनता पार्टी को सबसे ज्यादा महंगा यही पड़ा। भारतीय जनता पार्टी को चिंतन करना होगा कि वह कौन सी शक्ति थी, जिसे बड़े ही सुनियोजित ढंग से इसको अंजाम दिया। 10, 15, 20, 100 मत मान सकते हैं, लेकिन 9000 होना कोई ना कोई साजिश दिख रही है।
- कांग्रेस के उम्मीदवार उन मतदाताओं से भी मिले जिनकी पहली प्राथमिकता कांग्रेस नहीं थी। कांग्रेस ने उन्हें सेकंड प्रेफरेंस के लिए अपने पक्ष में मतदान करने के लिए राजी कर लिया। निर्दलीय उम्मीदवार नितेश कराले का सेकंड प्रेफरेंस कांग्रेस की जीत का कारण बना। नितेश कराले का 80% सेकंड प्रेफरेंस कांग्रेस को मिला है, जो कि हार के सभी अंतर को दूर करते हुए जीत में तब्दील हो गया। बीजेपी ने सेकंड प्रेफरेंस को प्राथमिकता नहीं दी, ओवर कॉन्फिडेंस में पहले प्रेफरेंस पर ही जोर दिया। कांग्रेस निर्दलीय बहुजन समाज से संपर्क साधकर भी सेकंड प्रेफरेंस के मत अपने पक्ष में तब्दील करने में सफल रही,
- कांग्रेस के नेताओं में काफी गुटबाजी नागपुर में है, लेकिन इस चुनाव में कांग्रेस के नेताओं ने अपनी गुटबाजी को किनारे रखा। अभिजीत बंजारी के समर्थन में विधायक विकास ठाकरे, विधायक नाना पटोले, विधायक विजय वडेट्टीवार, विधायक नितिन राउत सभी ने अपने-अपने क्षेत्र में मोर्चा संभाला। कांग्रेस के उम्मीदवार अभिजीत बंजारी की शिक्षण संस्थाएं चलती हैं, तो शिक्षण संस्थाओं का मित्र परिवार विविध दलों में बड़े नेता, प्रभावी नेता है। इस चुनाव में मित्र फैक्टर ने भी अभिजीत बंजारी का साथ दिया।
- भारतीय जनता पार्टी चुनाव इवेंट के रूप में लड़ रही थी। ओवर कॉन्फिडेंस बीजेपी में काफी दिख रहा था। बीजेपी के उम्मीदवार कोहले को रिवेन्यू मिनिस्टर चंद्रशेखर बावनकुले की एक तरह की जिद के रूप में प्रसारित किया गया। बीजेपी के उम्मीदवार के चयन पर भी सवाल खड़ा किया गया। पूर्व विधायक अनिल सोले की उम्मीदवारी को लेकर नाराजगी सामने आई थी। नए दौर में भारतीय जनता पार्टी में पुराने कार्यकर्ता घुटन महसूस करने लगे हैं। उन्हें नजरअंदाज किया जा रहा है, उन्हें लग रहा है। उन्होंने अपने आप को घरों में बंद कर लिया है,
- निर्दलीय उम्मीदवार नितेश कराले को बीजेपी के असंतोष कार्यकर्ताओं का साथ मिलने की पूरी संभावना है, क्योंकि नितेश कराले को 26066 से ज्यादा मत मिले है और सेकंड प्रेफरेंस में कांग्रेस का मत उन्हें मिला है। बीजेपी के लगभग 9000 मतपत्र अमान्य हुए। स्नातक मतदाता क्षेत्र में यह आंकड़ा चौंकाता है।आखिर इतनी बड़ी संख्या में मतदाता सही तरीके से वोट क्यों नहीं डाल पाए? बीजेपी की चुनावी मशीनरी के सामने यह बड़ा प्रश्न है।
पार्टी के नेताओं ने क्या कहा?
भाजपा महाराष्ट्र विधान परिषद की नागपुर स्नातक सीट क्यों हारी? क्या वजह है की माइक्रो प्लानिंग करने वाली भारतीय जनता पार्टी को इस सीट पर हार का सामना करना पड़ा? इस संबंध में बातचीत करते हुए भारतीय जनता पार्टी के शहर अध्यक्ष दयाशंकर तिवारी ने बताया कि "बीजेपी को नियोजन के तहत 75 हजार वोट मिलेंगे ऐसा नियोजन किया था और 67 हजार मत मिले हैं। बड़े पैमाने में जो वोट इनवेलिड हुए उनके सामने 2 लिखा हुआ है। हमारे कार्यकर्ता मतदाताओं को समझाने में कम पड़े। चुनाव के दिन यह शिकायत आई कि जो चुनाव के अधिकारी अंदर बैठे हैं, यदि मतदाता उनसे समझता था कि कैसे वोट डालना है, तो यह कहते थे कि जिसे वोट देना है, उसके नंबर के सामने नंबर लिख दो। सुधाकर कोहले का नाम दो नंबर पर लिखा था, तो कार्यकर्ताओं ने उनके सामने नंबर 2 लिख दिया। कुछ अधिकारी भी अनभिज्ञ थे कि यहां पर वोटिंग कैसे होती है? यदि 2 नंबर जहां लिखा था यदि वहां पर भाजपा के पक्ष में 1 नंबर लिखा होता तो वह बीजेपी जीत जाती।"
दयाशंकर तिवारी ने आगे बताया- "जहां तक सेकंड प्रेफरेंस की बात की जाए तो वर्तमान राजनीतिक परिपेक्ष्य में सारे उम्मीदवार बीजेपी के विरोध में चुनाव लड़ रहे थे। तो दूसरा प्रेफरेंस मिलना संभव नहीं दिख रहा था। आज हमें ऐसा लग रहा है कि हमासे चूक हुई है। यदि हमने दूसरे पसंद के वोट को टारगेट करते तो 3000 वोट प्राप्त करना संभव नहीं था, हम कर सकते थे, हमारे नियोजन में चुक हुई है।" दयाशंकर तिवारी ने चूक को स्वीकारते हुए कहा कि हमसे यह बात भी चूक हुई। मतदाता को मतदान केंद्र में जाने से पहले एक बार उन्हें बताना चाहिए था कि मतदान कैसे करना है, तो हमारी हार नहीं हुई रहती। उन्होंने आगे कहा कि किसी के नाराज होने से मतदाता पर असर नहीं पड़ता।
परंपरागत वोटर वोटिंग नहीं कर सका- पूर्व विधायक
भाजपा की इस हार पर नागपुर पश्चिम के पूर्व विधायक एवं केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी के कई बार चुनाव प्रमुख रहे पूर्व विधायक सुधाकर देशमुख ने कहा कि 2020 से विधान परिषद के हर चुनाव के दौरान इस चुनाव के लिए नए मतदाता बनाए जाते हैं। जो परंपरागत मतदाता जो अब तक मतदान करते आ रहे थे, उन्हें लगा कि उनका मतदाता सूची में नाम है। जिन मतदाताओं ने 40 साल पहले 45 साल पहले ग्रेजुएशन किया था, जो भारतीय जनता पार्टी के कोर वोटर हैं, वे मतदान सूची में नाम नहीं कर पाए, क्योंकि उन्हें लग रहा था कि मतदान सूची में उनका नाम है। इसलिए जब उन्हें मतदाता बनने के लिए कहा गया तो उन्होंने अपने इतने पुराने सर्टिफिकेट नहीं दिए। यह भी एक मुख्य कारण है कि जो परंपरागत वोटर है वह वोटिंग नहीं कर सका।
ये भी पढ़ें- Nagpur MLC Election Results: बीजेपी को RSS के गढ़ में हराया, कांग्रेस से हटाया 'जीरो का टैग', कौन हैं अभिजीत वंजारी?