महाराष्ट्र: पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव के बाद बंगाल की सियासत में मजबूती से खड़ी तृणमूल कांग्रेस सियासी आंधी में बिखर गई। तृणमूल के कई बागी सांसदों ने रविवार को लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला से मुलाक़ात की और इन सभी बागी गुट के नेताओं ने बिल्कुल अंजान सी पार्टी नेशनलिस्ट सिटिज़ंस पार्टी ऑफ़ इंडिया (NCPI) के साथ अपनी टीएमसी के विलय करने की घोषणा की है। इस पूरी घटना पर सबकी नजरें टिकी रहीं। वहीं, अब इसके बाद फिर से बगावत की खबर है और वो भी है महाराष्ट्र की शिवसेना, जो पहले ही दो टुकड़ों में टूट चुकी थी और फिर से अब इसके एक हिस्से यूबीटी, यानी उद्धव ठाकरे की शिवसेना में बगावत की अटकलें तेज़ हो गई हैं।
उद्धव की शिवसेना में क्यों बढ़ी हलचल?
उद्धव ठाकरे की शिवसेना के कुछ सांसद शिवसेना से टूटकर खुद को असली शिवसेना यानी शिंदे वाली में शामिल हो सकते हैं। इस खबर ने उद्धव ठाकरे की नींद उड़ा दी है। इस पूरे घटनाक्रम को 'ऑपरेशन टाइगर' का नाम दिया गया है, जिसने उद्धव गुट के भीतर डर पैदा कर दिया है कि उद्धव ठाकरे के कुछ सांसद महाराष्ट्र के डिप्टी सीएम एकनाथ शिंदे की शिवसेना में शामिल हो सकते हैं। इस खबर ने ऐसा तूल पकड़ा कि उद्धव ठाकरे ने पार्टी में फूट की अफ़वाहों को दूर करने के लिए मातोश्री में अपने सभी नौ लोकसभा सांसदों की बैठक बुला ली। चूंकि शिवसेना पहले ही एक बार बुरी तरह बंट चुकी है, इसलिए नई बगावत की अफ़वाहों ने एक बार फिर चिंता बढ़ा दी है।
ऑपरेशन टाइगर की क्यों है चर्चा?
जब से उद्धव ठाकरे की शिवसेना में बगावत की अफवाह उड़ी, उसी समय से महाराष्ट्र की राजनीति में ऑपरेशन टाइगर का तेजी से इस्तेमाल हो रहा है। कहा जा रहा है कि इस ऑपरेशन का मकसद शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना के बारे में कहा जा रहा है कि इसके जरिए वह उद्धव गुट के नेताओं को अपनी तरफ़ तोड़ने की कोशिश कर रही है। हालांकि बिना आग के कभी धुआं नहीं उठता, तो सार ये है कि उद्धव की शिवसेना के कई सांसद शिंदे गुट के नेताओं से लगातार संपर्क में हैं और कहा जा रहा है कि दिल्ली में इसकी चर्चा भी हुई है।
"इसे 'ऑपरेशन टाइगर' क्यों कहा जाता है?
'ऑपरेशन टाइगर' पर शिवसेना विधायक दीपक वसंत केसरकर कहते हैं, "इसे 'ऑपरेशन टाइगर' क्यों कहा जाता है? क्योंकि बाघ शिवसेना का प्रतीक है और शिवसेना दिन-ब-दिन मज़बूत हो रही है। कई लोग इसमें शामिल होना चाहते हैं और कई जन-प्रतिनिधि शिवसेना में शामिल हो रहे हैं या शामिल होने की प्रक्रिया में हैं, जिससे शिवसेना और मज़बूत होगी।" संजय राउत के बयान पर वे कहते हैं, "यह पार्टियों को टूटने से बचाने की आखिरी कोशिश है। लेकिन आपको नतीजे का इंतज़ार करना होगा। मुझे यकीन है कि महाराष्ट्र में शिंदे और गठबंधन सरकार के प्रति बहुत आकर्षण है... मुझे लगता है कि अगर कुछ होता है, तो यह महाराष्ट्र के लिए अच्छा होगा।"
ऑपरेशन टाइगर बनाम ऑपरेशन प्रोग्रेस
इन अटकलों को हवा तब मिली जब केंद्रीय मंत्री और शिवसेना नेता प्रताप जाधव ने दावा किया कि उद्धव गुट की शिवसेना के सभी सांसद एकनाथ शिंदे के संपर्क में हैं। साथ ही ठाकरे गुट के कुछ सांसदों की गुप्त मुलाकातों की खबरें भी सामने आईं। हालांकि, शिंदे की शिवसेना ने विरोधी पार्टियों को तोड़ने की किसी भी कोशिश से सार्वजनिक रूप से इनकार किया है और ये भी कहा है कि उद्धव के लिए बगावत कोई नई बात नहीं है। वहीं, शिंदे शिवसेना ने 'ऑपरेशन टाइगर' की चर्चा को राजनीतिक अटकलबाजी करार दिया है और कहा है कि यहां 'ऑपरेशन टाइगर' नहीं 'ऑपरेशन प्रोग्रेस' चल रहा है।
शिवसेना में क्यों हुई थी दो फाड़
महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के बाद साल 2022 में, शिंदे ने महाराष्ट्र की राजनीति में सबसे बड़ी बगवात की थी। शिंदे ने बगावत के बाद शिवसेना के ज़्यादातर विधायकों को अपने साथ लेकर उद्धव ठाकरे की सरकार गिरा दी। इस बगावत के कारण शिवसेना दो विरोधी गुटों में बंट गई और पार्टी के नाम और चुनाव चिह्न को लेकर लंबी कानूनी और राजनीतिक लड़ाई चली। बाद में चुनाव आयोग ने शिंदे गुट को ही असली शिवसेना माना और उन्हें पार्टी का पारंपरिक 'धनुष-बाण' वाला चुनाव चिह्न दे दिया। इसके बाद उद्धव के गुट को 'शिवसेना' उद्धव बालासाहेब ठाकरे (UBT) के नाम से काम करना पड़ा।
उद्धव की क्यों बढ़ी मुसीबत?
बगावत की अफवाह के बीच उद्धव ठाकरे ने 'मातोश्री' में अपने सांसदों की बैठक बुलाई, जिसमें सिर्फ़ चार सांसद ही बैठक में व्यक्तिगत रूप से शामिल हुए, जबकि चार अन्य वर्चुअली जुड़े और एक सांसद ने बाद में ठाकरे से फ़ोन पर बात की। कई सांसदों के व्यक्तिगत रूप से शामिल नहीं होने से यह अटकलें तेज़ हो गईं कि पार्टी में बगावत चल रही है। अटकलें तब और तेज़ हो गईं जब बैठक में शामिल नहीं होने वाले शिवसेना (UBT) सांसद संजय देशमुख को बाद में नई दिल्ली में शिंदे गुट के केंद्रीय मंत्री प्रताप जाधव से मिलते हुए देखा गया।
यूबीटी नेताओं का क्या कहना है?
शिवसेना के सभी नौ सांसद एक साथ है। अगर हमारे पास ईडी होती तो हम भी हमारा भी धाक होता। शिवसेना को लेकर ऑपरेशन टाइगर की खबरें बस अफवाहें हैं। शरद पवार के बाद अगर सबसे ज्यादा लोक प्रतिनिधि से मिलने वाला नेता अगर कोई है तो उद्धव ठाकरे हैं। मातोश्री का दरवाजा सबके लिए खुला रहता है। आदमी खरीद बिक्री करना, इसे फोड़ा फोड़ी कहते है, जो पिछले 10 साल से चल रहा है देश में। अगर एक मंत्री से कोई सांसद मिल रहा है तो उसमें बुरा क्या है,अगर कोई काम देशहित से जुड़ा होगा तो मैं भी प्रधानमंत्री से मिलूंगा।
उद्धव ठाकरे ने बैठक में सबसे बातचीत की, मै भी वहां था उन्होंने यह बयान नहीं दिया है कि अगर किसी को जाना है तो जाए। क्योंकि हम जानते हैं कि अब पार्टी तोड़ने वालों को लोग जूते से मारेंगे। बैठक में सांसदों ने उद्धव ठाकरे के सामने मां भवानी की कसम खाई है और कहां उद्धव साहेब हम आपके साथ है। सांसदों ने खुद कसम खाई है, इसका पालन होगा मुझे इसकी उम्मीद है।
क्या सच में सांसद पार्टी छोड़कर चले जाएंगे?
इसका जवाब ये है कि अगर सांसदों का कोई गुट पाला बदलना चाहता है, तो उन्हें दलबदल विरोधी कानूनों का सामना करना होगा। रिपोर्टों से पता चला है कि कम से कम छह से सात सांसद कथित तौर पर शिंदे गुट के संपर्क में हैं, हालांकि इन दावों की पुष्टि नहीं हुई है और उद्धव की शिवसेना ने इनका खंडन किया है। उद्धव ठाकरे के लिए यह एक परीक्षा है कि क्या वह 2022 की उस बगावत को दोहराने से रोक सकते हैं, जिसने महाराष्ट्र की राजनीति को बदल दिया था। एकनाथ शिंदे के लिए, यह शिवसेना के राजनीतिक दायरे पर अपनी पकड़ और मजबूत करने का मौका है।
शिंदे ने सवालों का कोई जवाब नहीं दिया
चाहे 'ऑपरेशन टाइगर' सच में नेताओं को तोड़ने की कोई कोशिश हो या सिर्फ़ राजनीतिक अफ़वाह, शिवसेना (UBT) का सार्वजनिक रूप से अपने सांसदों की गिनती करना और उन्हें दिखाना यह साफ़ दिखाता है कि 2022 में हुई फूट का साया अभी भी उद्धव ठाकरे की पार्टी का पीछा कर रहा है। वहीं, महाराष्ट्र के डिप्टी CM और शिवसेना प्रमुख एकनाथ शिंदे 'मंत्रालय' पहुँचे। उन्होंने शिवसेना UBT के पांच विधायकों के शिंदे गुट में शामिल होने से पहले एक अलग गुट बनाने की अटकलों पर पूछे गए किसी भी सवाल का जवाब नहीं दिया।
संजय निरुपम ने क्या कहा?
'ऑपरेशन टाइगर' पर शिवसेना नेता संजय निरुपम कहते हैं, "उबाठा (UBT) पार्टी धीरे-धीरे खत्म हो रही है। उनके MLA और MP को अब उबाठा की लीडरशिप पर भरोसा नहीं रहा। 2029 तक यह पार्टी खत्म हो जाएगी। लोग रोज़ उबाठा छोड़ रहे हैं। जहाँ तक उनके MP की बात है, तो हमारा इससे कोई लेना-देना नहीं है। यह उनकी पार्टी का अंदरूनी मामला है... यह पार्टी धीरे-धीरे खत्म हो जाएगी और लोग इसे छोड़ देंगे।"
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