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2020 में कोरोना वायरस वैश्विक असंतुलन में और कमी ला सकता है: IMF

 Edited By: India TV Paisa Desk
 Published : Aug 04, 2020 10:17 pm IST,  Updated : Aug 04, 2020 11:34 pm IST

तेल, पर्यटन पर निर्भर अर्थव्यवस्थाओं पर दबाव बढ़ने की आशंका

IMF says coronavirus may shrink global imbalances - India TV Hindi
IMF says coronavirus may shrink global imbalances  Image Source : PTI

नई दिल्ली। इंटरनेशनल मॉनिटरी फंड के मुताबिक दुनिया भर के चालू खाते के असंतुलन में 2019 से आ रही कमी कोरोना वायरस की वजह से 2020 में भी जारी रह सकती है। साल 2019 में इसमें आर्थिक सुस्ती की वजह से गिरावट देखने को मिली थी। आसान शब्दों में कहीं तो दुनिया भर की अर्थव्यवस्थाओं मे किसी एक के खाते के सरप्लस रहने और दूसरी अर्थव्यवस्था के घाटे में रहने का अंतर अब धीरे धीरे सिकुड़ रही है। आईएमएफ की रिपोर्ट के मुताबिक कारोबार के थमने की वजह से पैसे का प्रवाह धीमा हो गया है जिससे आयात पर निर्भर रहने वालों का खर्च कम हो रहा है वहीं निर्यात करने वालों की कमाई घट रही है। जिससे आयात पर निर्भर देशों की मुद्रा बचने से घाटा कम हो रहा है और दूसरी तरफ निर्यातकों की कमाई घटने से सरप्लस की स्थिति खत्म हो रही है जिससे वैश्विक असंतुलन सीमित हो रहा है। हालांकि आईएमएफ के मुताबिक तेल जैसे कमोडिटी, पर्यटन पर निर्भर अर्थव्यवस्थाओं के लिए घाटे में बढ़त हो सकती है या फिर वो सरप्लस से घाटे की स्थिति में जा सकते हैं।

आईएमएफ की एक्सटर्नल सेक्टर रिपोर्ट के मुताबिक 2019 में कुल करंट अकाउंट डेफिसिट और सरप्लस दुनिया भर की जीडीपी के 3 फीसदी से नीचे के स्तर पर रहा था। अनुमान के मुताबिक 2020 में इसमें जीडीपी के 0.3 फीसदी के बराबर और गिरावट संभव है। आईएमएफ के मुताबिक 2019 के दौरान  दुनिया भर में करंट अकाउंट घाटे और सरप्लस का 40 फीसदी हिस्सा अपनी सीमा से ज्यादा रहे हैं। इसमें से भी अधिकांस विकसित अर्थव्यवस्थाओं में केंद्रित रहे हैं। 

आईएमएफ के मुताबिक महामारी की वजह से भविष्य को लेकर अनिश्चितताएं बढ़ गई हैं। ऐसे में भले ही असंतुलन में कमी की संभावना हो लेकिन सेक्टर और अर्थव्यवस्थाओं के आधार पर इनमें अलग अलग असर देखने को मिल सकते हैं। ऐसी अर्थव्यवस्थाएं जो तेल, पर्यटन या फिर विदेशों में कार्यरत प्रवासियो के द्वारा भेजे गए पैसों पर निर्भर हैं उनके करंट अकाउंट बैलेंस में अपनी जीडीपी के 2 फीसदी के बराबर गिरावट देखने को मिल सकती है। इसका असर इन अर्थव्यवस्थाओं पर काफी समय तक देखने को मिलेगा। महामारी की शुरुआत में उभरती हुई और विकासशील अर्थव्यवस्थाओं में अचानक ही पैसे के बाहर जाने का क्रम देखने को मिला जिसके साथ ही उनकी करंसी में भी दबाव बन गया। हालांकि फिस्कल और मॉनिटरी पॉलिसी कदमों से निवेशकों के सेंटीमेंट्स बेहतर हुए और करंसी पर दबाव सीमित हुआ। हालांकि अभी भी कोरोना के नए मामलों और कारोबारी तनाव की वजह से अर्थव्यवस्थाओं पर नया दबाव पड़ने की आशंका बनी हुई है। 

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