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पंजाब में फिर क्यों गरमाने लगी पंथक राजनीति? 2027 के चुनावों से पहले मिल रहे बड़े संकेत

 Written By: Vineet Kumar Singh
 Published : Aug 14, 2026 11:34 pm IST,  Updated : Aug 14, 2026 11:34 pm IST

पंजाब में 2027 विधानसभा चुनाव से पहले पंथक राजनीति फिर सक्रिय होती दिख रही है। जगतार सिंह हवारा की पैरोल, बंदी सिंहों की रिहाई और बलवंत सिंह राजोआना जैसे मुद्दे इस समय पंजाब की सियासत में चर्चा में हैं।

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पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान और बीजेपी नेता रवनीत सिंह बिट्टू। Image Source : X.COM/BHAGWANTMANN | PTI

अमृतसर: पंजाब में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले एक बार फिर पंथक राजनीति यानी सिख धार्मिक और सामुदायिक मुद्दों से जुड़ी राजनीति केंद्र में आती दिख रही है। अलग-अलग राजनीतिक दलों के नेता पूर्व मुख्यमंत्री बेअंत सिंह की हत्या के मामले में उम्रकैद की सजा काट रहे जगतार सिंह हवारा को पैरोल देने की मांग कर रहे हैं। खास बात यह है कि इस मांग को लेकर अलग-अलग दलों के नेताओं के सुर एक जैसे नजर आ रहे हैं। पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान भी हवारा को मानवीय आधार पर पैरोल देने के पक्ष में हैं।

बेटे से मिलना चाहती हैं हवारा की 80 साल की मां

हवारा की 80 वर्षीय मां की तबीयत खराब है और मुख्यमंत्री का कहना है कि वह अपने बेटे से मिलना चाहती हैं। बुधवार को मान ने चंडीगढ़ में राज्यपाल गुलाब चंद कटारिया से मुलाकात कर इस मामले में हस्तक्षेप की मांग की। इससे कुछ दिन पहले उन्होंने राज्यपाल को पत्र लिखकर हवारा को 10 दिन की पैरोल देने का समर्थन किया था। मान ने कहा था कि 31 साल बाद हवारा की मां को अपने बेटे से मिलने की उम्मीद जगी है। उनके मुताबिक, मां अर्धचेतन अवस्था में हैं और जब उनके पास हवारा का नाम लिया जाता है तो वह प्रतिक्रिया देती हैं।

बेअंत सिंह के पोते बिट्टू भी पैरोल के समर्थन में

इस मामले ने इसलिए भी ध्यान खींचा है क्योंकि बेअंत सिंह के पोते और बीजेपी नेता रवनीत सिंह बिट्टू ने भी हवारा की पैरोल को लेकर राज्यपाल की सकारात्मक रिपोर्ट का स्वागत किया है। बिट्टू ने कहा कि उन्होंने राज्यपाल से मुलाकात की और हवारा की मां की उम्र और खराब स्वास्थ्य को देखते हुए मानवीय दृष्टिकोण अपनाने के लिए उनका धन्यवाद किया। उन्होंने कहा कि उनके परिवार के लिए बेअंत सिंह का बलिदान हमेशा सम्मानित रहेगा, लेकिन एक बुजुर्ग और बीमार मां की खातिर हवारा को पैरोल दी जानी चाहिए। उनके मुताबिक, समाज को आगे बढ़ाने में करुणा, मानवता और शांति की भूमिका महत्वपूर्ण होनी चाहिए।

क्यों अहम है हवारा का मामला?

जगतार सिंह हवारा को पूर्व मुख्यमंत्री बेअंत सिंह की हत्या के मामले में उम्रकैद की सजा मिली है। 31 अगस्त 1995 को चंडीगढ़ सिविल सचिवालय के प्रवेश द्वार के पास हुए विस्फोट में बेअंत सिंह समेत 17 लोगों की मौत हुई थी। हवारा, जो कभी प्रतिबंधित आतंकवादी संगठन बब्बर खालसा से जुड़ा रहा था, फिलहाल दिल्ली की मंडोली जेल में बंद है। हालांकि वह हत्या के मामले में दोषी ठहराया जा चुका है, लेकिन राजनीतिक पर्यवेक्षकों के मुताबिक सिख समुदाय के एक हिस्से में उसे अब भी समर्थन हासिल है। 2015 में अमृतसर में कुछ कट्टरपंथी सिख संगठनों की ओर से आयोजित एक सभा में हवारा को अकाल तख्त के समानांतर जत्थेदार के तौर पर नियुक्त किया गया था।

बंदी सिंहों की रिहाई का मुद्दा भी तेज

पंथक राजनीति के उभार का दूसरा बड़ा संकेत बंदी सिंहों, यानी जेलों में बंद सिख कैदियों की रिहाई की मांग है। शिरोमणि अकाली दल और कौमी इंसाफ मोर्चा जैसे सिख संगठनों ने इस मुद्दे को फिर जोर-शोर से उठाया है। इन संगठनों का दावा है कि कई सिख कैदी अपनी सजा पूरी कर चुके हैं, लेकिन इसके बावजूद अलग-अलग जेलों में बंद हैं। इनमें बेअंत सिंह हत्याकांड में दोषी ठहराए गए बलवंत सिंह राजोआना का नाम भी शामिल है। शिरोमणि अकाली दल (पुनर सुरजीत) के एक प्रतिनिधिमंडल ने मंगलवार को राज्यपाल से मुलाकात कर हवारा को अपनी बीमार मां से मिलने की अनुमति देने की मांग की।

अमृतपाल की पार्टी ने भी खोला पंथक कार्ड

पंथक राजनीति में नए खिलाड़ियों की एंट्री भी इस बार महत्वपूर्ण है। जेल में बंद खडूर साहिब सांसद अमृतपाल सिंह की अगुवाई वाले अकाली दल वारिस पंजाब दे ने 2027 विधानसभा चुनाव के लिए अपना पहला उम्मीदवार घोषित कर दिया है। पार्टी ने फतेहगढ़ साहिब जिले की बस्सी पठाना विधानसभा सीट से 61 वर्षीय सतवंत सिंह को उम्मीदवार बनाया है। सतवंत सिंह, केहर सिंह के बेटे हैं, जिसे पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या में भूमिका के लिए फांसी दी गई थी। यह फैसला इसलिए अहम है क्योंकि पंजाब की पंथक राजनीति में लंबे समय तक शिरोमणि अकाली दल का दबदबा रहा है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में यह राजनीतिक आधार अलग-अलग पार्टियों और गुटों में बंट गया है।

2022 में AAP ने अकाली दल के गढ़ में लगाई थी सेंध

2022 के पंजाब विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी ने उन सीटों पर भी शिरोमणि अकाली दल को बड़ा नुकसान पहुंचाया था, जहां परंपरागत रूप से पंथक वोट का मजबूत आधार माना जाता था। इसके बाद अब अलग-अलग अकाली गुट और नए राजनीतिक संगठन इस वोट बैंक को अपने पक्ष में लाने की कोशिश कर रहे हैं। यही वजह है कि हवारा की पैरोल, बंदी सिंहों की रिहाई, राजोआना की सजा, करतारपुर कॉरिडोर और पंथक पहचान से जुड़े मुद्दे 2027 के चुनाव से पहले फिर चर्चा में आ गए हैं। पंजाब की सियासत में अब सवाल यह है कि क्या पंथक वोट दोबारा किसी एक राजनीतिक ताकत के पीछे एकजुट होगा या इस बार भी अलग-अलग दलों और गुटों के बीच बंटा रहेगा। (PTI से इनपुट्स के साथ)

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