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रेप पीड़िता ने की आरोपी से शादी, जज ने खत्म किया केस, कहा- 'शादी महज परंपरा नहीं, यह पवित्र बंधन है'

 Edited By: Shakti Singh
 Published : Apr 28, 2025 02:03 pm IST,  Updated : Apr 28, 2025 02:06 pm IST

राजस्थान हाई कोर्ट के जज ने दुष्कर्म का मुकदमा खत्म करते हुए कहा कि शादी एक पवित्र बंधन है, जो सामाजिक बंधन और परंपरा से परे है। यह धर्म निभाने का एक जरिया है।

Rajasthan High Court- India TV Hindi
राजस्थान हाई कोर्ट Image Source : RAJASTHANHIGHCOURT

राजस्थान में एक रेप पीड़िता ने आरोपी के साथ शादी कर ली। इसके बाद हाई कोर्ट के जज ने रेप का मुकदमा खत्म कर दिया और कहा कि शादी एक पवित्र और दिव्य चीज है। यह सांसारिक मामलों से परे है और संस्कृति में अद्वितीय महत्व रखती है। मुकदमा जारी रखकर इसमें बाधा नहीं डाली जा सकती। हालांकि, कोर्ट ने यह भी साफ किया कि भविष्य में रेप के किसी भी मामले को खारिज करने के लिए इस फैसले को आधार नहीं बनाया जाना चाहिए।

लाइव लॉ की खबर के अनुसार जज ने अपने फैसले में कहा "विवाह को दो व्यक्तियों के बीच पवित्र मिलन माना जाता है, जो शारीरिक, भावनात्मक और आध्यात्मिक बंधनों से परे होता है। प्राचीन हिंदू नियमों के अनुसार, विवाह और उसकी रीति-रिवाज पवित्रता के साथ धर्म (कर्तव्य), अर्थ (संपत्ति) और काम (शारीरिक इच्छा) को पूरा करने के लिए किए जाते हैं। विवाह एक बंधन से कहीं अधिक है।"

क्या था मामला?

पीड़िता ने आरोप लगाया था कि आरोपी से उसकी मुलाकात सोशल मीडिया पर हुई थी। इसके बाद दोनों की दोस्ती हुई। आरोपी ने शादी का वादा किया तो दोनों के बीच शारीरिक संबंध भी बने। इस दौरान लड़की गर्भवती हो गई, पर आरोपी ने शादी का वादा करते हुए उसे गर्भपात की गोलियां खिला दीं और लड़की से बात करना बंद कर दिया। इसके बाद पीड़िता ने पुलिस में मामला दर्ज कराया तो आरोपी शादी करने के लिए राजी हो गया।

शादी के बाद आरोपी ने मामला खत्म करने की अर्जी दायर की थी। इसी पर सुनवाई करते हुए राजस्थान हाई कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के कई मामलों का हवाला दिया, जिसमें न्यायालय ने पक्षकारों के बीच विवाह होने के बाद दुष्कर्म का मामला रद्द करने की याचिका स्वीकार कर ली थी। अदालत ने इस दलील पर प्रकाश डाला कि पीड़िता विवाह के बाद आरोपी और अपने ससुराल वालों के साथ खुशहाल जीवन व्यतीत कर रही थी और उसका केस जारी रखने का कोई इरादा नहीं था।

कोर्ट ने कहा कि विवाह पवित्र बंधन है, जिसमें दो लोग न केवल शारीरिक रूप से बल्कि भावनात्मक, मानसिक और मनोवैज्ञानिक रूप से भी बंधे होते हैं। यह दो लोगों, दो आत्माओं, दो परिवारों, दो जनजातियों और दो जातियों को एक साथ लाता है। ऐसे में कोर्ट को वैवाहिक की रक्षा करनी चाहिए। 

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