1. Hindi News
  2. धर्म
  3. Bhagavad Gita Shlokas: जी तोड़ मेहनत के बाद भी नहीं मिल रही सफलता, तो गीता इन 5 श्लोकों का करें पाठ, जीवन को मिलेगी सही दिशा

Bhagavad Gita Shlokas: जी तोड़ मेहनत के बाद भी नहीं मिल रही सफलता, तो गीता इन 5 श्लोकों का करें पाठ, जीवन को मिलेगी सही दिशा

 Written By: Arti Azad @Azadkeekalamse
 Published : Apr 08, 2026 05:11 pm IST,  Updated : Apr 08, 2026 05:11 pm IST

Bhagavad Gita Shlokas: कहा जाता है कि जब कभी हम उम्मीद खोने लगते हैं, तो भगवद् गीता का पाठ कर लेना चाहिए। गीता जी का ज्ञान हर परिस्थिति में व्यक्ति को सही मार्गदर्शन प्रदान करता है। गीता जी में दिए गए भगवान श्रीकृष्ण के ये उपदेश सही दिशा दिखाकर आपके लिए भी सफलता पाने में मददगार हो सकते हैं।

श्रीमद्भगवत गीता श्लोक- India TV Hindi
श्रीमद्भगवत गीता श्लोक Image Source : INDIA TV

Bhagavad Gita Shlokas: सनातन धर्म में कर्म का महत्व बताते हुए सही कर्म करने पर विशेष जोर दिया गया है। श्रीमद्भागवत गीता में भी यही बताया गया है कि व्यक्ति को अपना कर्म अच्छे से करना चाहिए और उसके बदले मिलने वले फल की चिंता नहीं करना चाहिए। अगर आपको किसी काम में कामयाबी पाना है तो उसके लिए मेहनत बहुत जरूरी है। कई बार जी तोड़ मेहनत करने के बावजूद भी मनचाही सफलता नहीं मिल पाती है। ऐसे में सकारात्मक सोच और आत्मविश्वास बनाए रखना बहुत जरूरी है। श्रीमद्भागवत गीता में यह भी बताया गया है कि मुश्किल हालात में भी व्यक्ति सुखी और शांत जीवन जी सकता है। यहां पढ़िए गीता जी वो 5 श्लोक, जो हर विपरीत परिस्थिति में आपको अटल और अडिग रहने का विश्वास देते हैं। 

1. "कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन ।

मा कर्मफलहेतुर्भुर्मा ते संगोऽस्त्वकर्मणि ।।"

यह श्लोक भगवद् गीता के अध्याय 2, श्लोक 47 में उल्लिखित है। 

अर्थ: इसमें श्रीकृष्ण कर्म को लेकर उपदेश देते हैं। उनका कहना है कि मनुष्य का कर्म करने में ही अधिकार है, उसके फलों में कभी नहीं। इसलिए व्यक्ति को कर्मों के फल के बारे में सोचना नहीं चाहिए और भगवान कृष्ण का कहना है कि मनुष्य को आलस्य में पड़कर अकर्मण्य (कर्महीन) नहीं होना चाहिए। 

2. सत्त्वानुरूपा सर्वस्य श्रद्धा भवति भारत।
श्रद्धामयोऽयं पुरुषो यो यच्छ्रद्धः स एव सः।।

यह भगवद् गीता के अध्याय 17, श्लोक 3 का श्लोक। 

अर्थ: व्यक्ति जैसा विश्वास करता या सोचता है, वैसा ही बन जाता है। जैसी जिसकी आस्था होती है, वैसा ही उस व्यक्ति का व्यक्तित्व और स्वरूप होता है। इसलिए मनुष्य को खुद पर भरोसा रखना चाहिए और अपनी सोच को सकारात्मक रखना चाहिए।

3. चिन्तया जायते दुःखं नान्यथेहेति निश्चयी।
तया हीनः सुखी शान्तः सर्वत्र गलितस्पृहः॥

यह श्लोक अष्टावक्र गीता 11.5 से लिया गया है। 

अर्थ: चिंता से ही दुःख उत्पन्न होते हैं किसी अन्य कारण से नहीं। ऐसा निश्चित रूप से जानने वाला, चिंता से रहित होकर सुखी, शांत और सभी इच्छाओं से मुक्त हो जाता है। इसलिए सुखी जीवन चाहने वालों को चिंता का त्याग कर देना चाहिए।

4. मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः।
आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत।।

यह भगवद् गीता के अध्याय 2, श्लोक 14 का श्लोक है। 

अर्थ: सर्दी-गर्मी की तरह ही जीवन में दुख-सुख का आना और जाना लगा रहता है। ये अनुभव केवल क्षणिक होते हैं। किसी भी परिस्थिति में व्यक्ति को सुख-दुख से विचलित हुए बिना इन्हें सहना करना आना चाहिए, तभी वह जीवन में आगे बढ़ सकते हैं।

5. त्रिविधं नकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः।
कामः क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्त्रयं त्यजेत्।।

अर्थ: काम, क्रोध और लोभ – ये तीन नरक के द्वार हैं जो आत्मा के विनाश का कारण बनते हैं। इसलिए इनका त्याग आवश्यक है। अगर आप सफल जीवन की कामना रखते हैं, तो इनका त्याग जरूर करें।

(Disclaimer: यहां दी गई जानकारियां धार्मिक आस्था और लोक मान्यताओं पर आधारित हैं। इसका कोई भी वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। इंडिया टीवी एक भी बात की सत्यता का प्रमाण नहीं देता है।)

ये भी पढ़ें: Jyotish Upay: ये 5 चीजें किसी को न दें सीधे हाथ में, सुधार लें ये आदत वरना घर में ला सकती है कंगाली

Advertisement

India TV हिंदी न्यूज़ के साथ रहें हर दिन अपडेट, पाएं देश और दुनिया की हर बड़ी खबर। धर्म से जुड़ी लेटेस्ट खबरों के लिए अभी विज़िट करें।