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bhagwat geeta sanskrit shlok: गीता के 10 अमृत श्लोक जो बदल देंगे आपकी सोच, हर कदम पर मिलेगी सफलता

 Written By: Laveena Sharma @laveena1693
 Published : Nov 07, 2025 01:26 pm IST,  Updated : Nov 08, 2025 05:40 pm IST

भगवद गीता सिर्फ एक धार्मिक ग्रंथ ही नहीं है बल्कि ये जीवन का मार्गदर्शन करने वाली ऐसी दिव्य शिक्षा है जिससे किसी का भी जीवन बदल सकता है। आज हम आपको गीता के ऐसे अमृत श्लोकों के बारे में बताएंगे जो आपको हर मोड़ पर सफलता दिलाएंगे।

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भगवद गीता के 10 ऐसे उपदेश जो मिटा देंगे हर चिंता Image Source : CANVA

Bhagwan Geeta Sanskrit Shlok: भगवद गीता सही रास्ते पर चलने और अपने कर्मों पर ध्यान केंद्रित करने की सीख देती है। कहते हैं जब महाभारत युद्ध से पहले अर्जुन का मन विचलित हो गया था और वे युद्ध करने से पीछे हटने लगे थे तब श्रीकृष्ण भगवान ने उन्हें सही राह दिखाई। भगवान कृ्ष्ण ने अर्जुन को जीवन, कर्तव्य, धर्म, कर्म और मोक्ष से जुड़ी कई शिक्षाएं दीं। जो हमें गीता में श्लोकों के रूप में देखने को मिलती है। यहां हम आपको बताएंगे गीता के उन खास श्लोकों के बारे में जो आपका जीवन बदल देंगे।

श्रीमद्भगवद्गीता गीता के 10 ऐसे श्लोक जो मिटा देंगे हर चिंता (Bhagwat Geeta Shlok in Sanskrit)

1. कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।

मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते संगोऽस्त्वकर्मणि॥

अर्थ – अर्जुन, कर्म पर ही तुम्हारा अधिकार है, लेकिन कर्म के फलों में कभी नहीं। इसलिए कर्म करो, फल की चिंता मत करो।

2. ध्यानात् विसयं पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते।
सङ्गात् संजायते कामः कामात् क्रोधोऽभिजायते।।

अर्थ – विषयों (इंद्रियों के भोग) का ध्यान करने से मनुष्य को उनमें आसक्ति हो जाती है। आसक्ति से इच्छा (कामना) उत्पन्न होती है, और इच्छा पूरी न होने पर क्रोध उत्पन्न होता है।

3. क्रोधाद्भवति संमोह: संमोहात्स्मृतिविभ्रम:।
स्मृतिभ्रंशाद्बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति॥

अर्थ – अर्जुन, क्रोध से भ्रम (मोह) उत्पन्न होता है, मोह से स्मृति (याददाश्त) का नाश होता है, स्मृति के नष्ट होने से बुद्धि भ्रष्ट हो जाती है, और जब बुद्धि नष्ट हो जाती है, तो मनुष्य पूरी तरह से विनाश की ओर चला जाता है।

4. यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जन:।
स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते॥

अर्थ – अर्जुन, श्रेष्ठ पुरुष जैसा आचरण करता है, अन्य लोग भी वैसे ही आचरण करते हैं। वह जिस आचरण को प्रमाण मानता है, समस्त संसार उसका अनुसरण करता है।

5. श्रद्धावान्ल्लभते ज्ञानं तत्पर: संयतेन्द्रिय:।
ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति॥

अर्थ –  जो श्रद्धावान (आस्थावान) होता है, जो ज्ञान प्राप्ति के लिए तत्पर रहता है, और जिसने अपनी इंद्रियों को संयम में रखा है, उसे ज्ञान की प्राप्ति होती है। ज्ञान प्राप्त करने के बाद वह शीघ्र ही परम शांति को प्राप्त कर लेता है।

6. योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय |
सिद्धयसिद्धयोः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते ||

अर्थ – श्री कृष्ण कहते हैं कि हे अर्जुन सफलता और असफलता की आसक्ति को त्यागकर सम्पूर्ण भाव से समभाव होकर अपने कर्म को करो। यही समता की भावना योग कहलाती है।

7. उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत्।
आत्मैं ह्यात्मनों बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः ॥

अर्थ – भगवान् कृष्ण अर्जुन को बताते हैं कि हे अर्जुन! ये आत्मा ही आत्मा का सबसे प्रिय मित्र है और आत्मा ही आत्मा का परम शत्रु भी है इसलिए आत्मा का उद्धार करना चाहिए, विनाश नहीं| जिस व्यक्ति ने आत्मज्ञान से इस आत्मा को जाना है उसके लिए आत्मा मित्र है और जो आत्मज्ञान से रहित है उसके लिए आत्मा ही शत्रु है||

8. विहाय कामान् य: कर्वान्पुमांश्चरति निस्पृह:।
निर्ममो निरहंकार स शांतिमधिगच्छति।।

अर्थ – जो मनुष्य सभी इच्छाओं व कामनाओं को त्याग कर ममता रहित और अहंकार रहित होकर अपने कर्तव्यों का पालन करता है, उसे ही शांति प्राप्त होती है।

9. न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत्।
कार्यते ह्यश: कर्म सर्व प्रकृतिजैर्गुणै:।।

अर्थ - कोई भी मनुष्य क्षण भर भी कर्म किए बिना नहीं रह सकता। सभी प्राणी प्रकृति के अधीन हैं और प्रकृति अपने अनुसार हर प्राणी से कर्म करवाती है और उसके परिणाम भी देती है।

10. जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च।
तस्मादपरिहार्येथे न त्वं शोचितुमर्हसि।।

अर्थ - जिसने इस संसार में जन्म लिया है उसकी मृत्यु निश्चित है और मृत्यु के बाद पुनर्जन्म भी निश्चित है। इसलिए अपने अपरिहार्य कर्तव्यपालन में शोक नहीं करना चाहिए।

(Disclaimer: यहां दी गई जानकारियां धार्मिक आस्था और लोक मान्यताओं पर आधारित हैं। इसका कोई भी वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। इंडिया टीवी एक भी बात की सत्यता का प्रमाण नहीं देता है।)

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