Jitiya Vrat 2026 Paran Time Live Update: जितिया या जीवित्पुत्रिका व्रत आश्विन कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को रखा जाता है। मुख्य रूप से यह पर्व बिहार, झारखंड और उत्तर प्रदेश में मनाया जाता है। इस दिन माताएं अपनी संतान की लंबी आयु के लिए 24 घंटे तक निर्जला व्रत रहती हैं। व्रत की शुरुआत सप्तमी तिथि पर नहाय खाय के साथ होती है और समाप्ति मातृ नवमी के दिन व्रत का पारण करके होती है। बता दें इस साल यह व्रत 3 अक्टूबर 2026 को रखा गया और आज इस व्रत का पारण है।
जितिया व्रत का पारण कितने बजे है 2026
4 अक्टूबर को जितिया व्रत का पारण सुबह 7 बजकर 28 मिनट के बाद किया जा सकता है। पारण से पहले विधि विधान पूजन करके भोग लगाएं और प्रसाद ग्रहण करके अपना व्रत खोल लें।
जितिया व्रत पारण विधि
- सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और साफ वस्त्र धारण करें।
- इसके बाद सूर्य देव को अर्घ्य दें।
- फिर दीपक जलाकर भगवान जीमूतवाहन की पूजा-अर्चना करें और पूजा के समय अपने गले में जितिया धारण करें।
- पारण करने से पहले किसी ब्राह्मण या जरूरतमंद व्यक्ति को अन्न-धन आदि का दान करें।
- फिर नोनी के साग और रागी की रोटी का भोग लगाएं।
- इसके बाद अपना व्रत खोल लें।
जितिया व्रत कथा 2026 (Jitiya Vrat Katha PDF)
एक समय की बात है, नर्मदा नदी के पास कंचनवटी नाम का एक नगर था। नदी की पश्चिम दिशा में मरुभूमि थी, जिसे बालुहटा के नाम से जाना जाता था। वहां एक विशाल पेड़ था, उसी पेड़ पर एक चील रहा करती थी। पेड़ के नीचे एक खोह (कोटर) थी, जिसमें सियारिन रहा करती थी। चील और सियारिन में गहरी दोस्ती थी। एक बार उन दोनों ने कुछ महिलाओं को जितिया (जीवित्पुत्रिका) व्रत करते हुए देखा, जिसके बाद उन्हें भी यह व्रत करने की इच्छा हुई। दोनों ने यह व्रत करने का संकल्प लिया। लेकिन व्रत के दिन ही उस नगर के एक बड़े व्यापारी की मृत्यु हो गई और उसका दाह-संस्कार उसी स्थान पर किया गया, जहां चील और सियारिन रहती थीं।
रात में मौसम काफी खराब हो गया और एक बड़ा तूफान आ गया। दूसरी तरफ, सियारिन को बहुत तेज भूख लगने लगी और ऐसे में उसे व्यापारी का शव पड़ा हुआ मिल गया। उससे रहा नहीं गया और उसने व्यापारी का मांस खा लिया, जिसके कारण उसका व्रत टूट गया। लेकिन चील ने पूरे नियम और संयम के साथ यह व्रत रखा और अगले दिन पूरी श्रद्धा के साथ पारण किया।
मृत्यु के बाद अगले जन्म में दोनों ने एक ब्राह्मण के घर में दो बेटियों के रूप में जन्म लिया। चील बड़ी बहन बनी और उसका नाम शीलावती रखा गया, जबकि सियारिन छोटी बहन बनी और उसका नाम कपुरावती रखा गया। शीलावती, जो पिछले जन्म में चील थी, उसका विवाह बुद्धिसेन के साथ हुआ; वहीं कपुरावती का विवाह नगर के राजा मलयकेतु से हुआ। इस प्रकार कपुरावती नगर की रानी बन गई। भगवान जीमूतवाहन के आशीर्वाद से शीलावती के 7 पुत्र हुए, जबकि कपुरावती की जो भी संतानें हुईं, वे जन्म लेते ही मृत्यु को प्राप्त हो जाती थीं।
अपनी बहन शीलावती के जीवित पुत्रों को देखकर कपुरावती को ईर्ष्या होने लगी, जिसके चलते उसने राजा से कहकर शीलावती के सभी पुत्रों के सिर कटवा दिए। इसके बाद कपुरावती ने 7 थालियों में कटे हुए सिर रखकर और उन्हें लाल कपड़े से ढककर शीलावती के घर भिजवा दिया। जब भगवान जीमूतवाहन ने शीलावती के पुत्रों के शव देखे, तो उन्होंने मिट्टी से सिरों का निर्माण करके और सभी को धड़ों से जोड़कर उनमें दोबारा प्राण फूंक दिए, जिससे शीलावती के सातों पुत्र पुनः जीवित हो गए। दूसरी तरफ, रानी कपुरावती द्वारा भेजी गई थालियों में जो सिर रखे थे, वे फल बन गए।
रानी कपुरावती बड़ी बेसब्री से अपनी बहन के सातों पुत्रों की मृत्यु के समाचार का इंतजार कर रही थी। लेकिन जब उसे उनकी मृत्यु की कोई खबर नहीं मिली, तो वह खुद अपनी बहन के घर पहुंच गई। वहां जाकर उसने देखा कि उसके सारे भांजे तो जीवित और स्वस्थ हैं। यह देखकर उसके होश उड़ गए और वह बेहोश हो गई। जब उसे होश आया, तो उसने अपनी बहन को सारी बात बता दी और कपुरावती को अपनी गलती का बहुत पछतावा हुआ। भगवान जीमूतवाहन की कृपा से शीलावती को अपने पिछले जन्म की सारी बातें याद आ गईं, जिसके बाद वह अपनी बहन को उसी जगह ले गई जहां वे दोनों पिछले जन्म में रहती थीं।
वहां पहुंचकर शीलावती ने कपुरावती को पूर्वजन्म की पूरी कथा बताई। यह सब सुनने और सत्य जानने के बाद कपुरावती की मृत्यु हो गई। जब राजा को अपनी पत्नी की मृत्यु का समाचार मिला, तो उन्होंने उसी पेड़ के नीचे उसका दाह-संस्कार कर दिया जहाँ वह पिछले जन्म में रहा करती थी। इस प्रकार कपुरावती को मोक्ष की प्राप्ति हुई।