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Kamakhya Temple Ambubachi Mela: आज से शुरू हो रहा है अंबुवाची मेला, जानें क्यों 3 दिनों में मां कामाख्या की तरफ खिंचे चले आते हैं दुनिया भर के अघोरी और तांत्रिक?

 Written By: Vineeta Mandal
 Published : Jun 22, 2026 05:46 pm IST,  Updated : Jun 22, 2026 05:46 pm IST

Ambubachi Mela 2026; मां कामख्या मंदिर में आज से अंबुवाची मेले की शुरुआत हो रही है। चार दिनों तक चलने वाले इस पर्व में 3 दिनों तक मंदिर के कपाट बंद रहते हैं। वहीं अंबुवाची मेला तांत्रिक और अघोरियों का महाकुंभ भी कहलाता है। इस समय यहां दुनियाभर से तांत्रिक आते हैं।

मां कामाख्या मंदिर- India TV Hindi
मां कामाख्या मंदिर Image Source : INDIA TV

Kamakhya Temple Ambubachi Mela: आज यानी 22 जून 2026 से  अंबुवाची मेले की शुरुआत हो रही है, जिसका समापन 26 जून को होगा। इस दौरान 3 तीनों तक मां कामाख्या मंदिर के कपाट बंद रहते हैं। इस समय पूजा-पाठ और दर्शन पूरी तरह से बंद कर दिए जाते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, हर साल अंबुवाची मेले के दौरान मां कामाख्या तीन दिनों तक रजस्वला (मासिक धर्म) होती हैं। यह समय बेहद ही पावन और पवित्र मानी जाती है। 4 दिनों तक चलने वाले इस मेले में देश-विदेश से भारी संख्या में श्रद्धालु आते हैं। इतना ही नहीं अंबुवाची मेले में दुनिया भर के तांत्रिक, साधु और अघोरी भी आते हैं। तो चलिए जानते हैं कि आखिर  अंबुवाची मेले में दुनिया भर के अघोरी और तांत्रिक कामाख्या क्यों आते हैं आखिर इसके पीछे कौनसा रहस्य छिपा हुआ है।  

कामाख्या मंदिर का रहस्य

असम के गुवाहाटी के नीलांचल पर्वत पर स्थित कामाख्या देवी का मंदिर 51 शक्तिपीठों में से एक है। यह अन्य सभी शक्तिपीठों में से बहुत ही खास माना जाता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, यहां देवी सती का योनि भाग गिरा था, इसलिए कामाख्या मंदिर में देवी मां की कोई मूर्ति नहीं है। यहां योनि भाग की ही उपासना की जाती है, जिसे हमेशा फूलों से ढककर रखा जाता है। कामाख्या मंदिर में योनि भाग गिरा था इसलिए साल में एक बार मां कामाख्या रजस्वला होती है, जिसे अंबुवाची पर्व के रूप में मनाया जाता है। कहा जाता है कि इन दिनों  ब्रह्मपुत्र का पानी भी लाल रंग का हो जाता है। अंबुबाची को प्रकृति के उर्वरा शक्ति का प्रतीक और उसके प्रकटीकरण के तौर पर भी देखा जाता है।

मां का 'अंगवस्त्र' पाने के लिए जुटती है भक्तों की भारी भीड़

अंबुवाची मेला की जब शुरुआत होती है तब मंदिर के कपाट पूरी तरह बंद कर दिए जाते हैं। देवी मां के योनि भाग को सफेद कपड़े से पूरी तरह ढक दिया जाता है और मंदिर को अंदर से लाल रंग के कपड़े या साड़ी से सजा दिया जाता है। जब चौथे दिन मंदिर के कपाट खोला जाता है तब वह सफेद कपड़ा पूरी तरह से लाल हो जाता है, जिसे भक्तों को प्रसाद के रूप में दिया जाता है। इस पवित्र कपड़े को 'अंगोदक' और 'अंगवस्त्र' कहा जाता है जिसे लेने के लिए भारी संख्या में भक्तगण जुटते हैं। यह कपड़ा बहुत ही शुभ माना जाता है। वहीं तांत्रिकों के लिए यह वस्त्र किसी कवच से कम नहीं होता। ऐसा माना जाता है कि इस कपड़े को पास रखने से तंत्र साधनाएं कभी निष्फल नहीं होतीं और बुरी शक्तियां हमेशा दूर रहती हैं।

इन तीनों में कई गई साधना से मिलता है कई गुना अधिक फल

मान्यता है कि इन तीन दिनों में मां कामाख्या रजस्वला होती हैं। तंत्र शास्त्र के अनुसार, देवी की रजस्वला अवस्था सृष्टि की सबसे शुद्ध और तीव्र सृजनात्मक ऊर्जा वाली मानी जाती है। इस समय पूरा नीलांचल पहाड़ी पर शक्ति का संचार अपने चरम सीमा पर होता है। इस समय की गई साधना का कई गुना अधिक ज्यादा फल मिलता है। तांत्रिक और अघोरियों के लिए यह साल का सबसे बड़ा अवसर होता है। अघोरी इस समय को महासिद्धि प्राप्त करने और मंत्रों को जाग्रत करने  जैसी गुप्त विद्याओं को सिद्ध करने के लिए सबसे अधिक उत्तम मानते हैं। बता दें कि  रजस्वला अवस्था को सृजन शक्ति, उर्वरता और प्रकृति के पुनर्जागरण का प्रतीक माना जाता है।  तंत्र शास्त्र के  मुताबिक, यह समय देवी की दिव्य शक्ति के जागरण का काल होता है, इसलिए दुनियाभर के तांत्रिक, अघोरी और साधु यहां पहुंचते हैं।

(Disclaimer: यहां दी गई जानकारियां धार्मिक आस्था और लोक मान्यताओं पर आधारित हैं। इसका कोई भी वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। इंडिया टीवी एक भी बात की सत्यता का प्रमाण नहीं देता है।)

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