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Shiv Rudrashtakam: महाशिवरात्रि पर करें श्रीरुद्राष्टकम 'नमामीशमीशान निर्वाणरूपं' का पाठ, जो दिलाएगा शिव कृपा और कष्टों से मुक्ति

Written By: Arti Azad @Azadkeekalamse Published : Feb 15, 2026 12:04 am IST, Updated : Feb 15, 2026 12:04 am IST

Shiv Rudrashtakam Path in Hindi: रुद्राष्टकम का पाठ भगवान शिव को प्रसन्न करने वाला चमत्कारिक स्तोत्र माना जाता है। महाशिवरात्रि पर रुद्राष्टकम का पाठ विशेष पुण्यदायी होता है। आस्था के साथ इसका जाप करने से साहस, सफलता और शिव कृपा की प्राप्ति होती है। पढ़िए रुद्राष्टकम स्तोत्रम

Shiv Rudrashtakam Path- India TV Hindi
Image Source : PINTEREST श्रीरुद्राष्टकम् नमामीशमीशान निर्वाणरूपं

Shiv Rudrashtakam Path in Hindi: रुद्राष्टकम भगवान शिव की स्तुति का एक अत्यंत पवित्र और प्रभावशाली स्तोत्र है। इसकी रचना रामचरित मानस के रचयिता गोस्वामी तुलसीदास जी ने की थी। मान्यता है कि श्रीराम ने रावण पर विजय प्राप्त करने से पहले रामेश्वरम में शिवलिंग स्थापित कर श्रद्धा भाव से रुद्राष्टकम का पाठ किया था, जिससे उन्हें शिवजी की विशेष कृपा और युद्ध में सफलता प्राप्त हुई। शिव पूजा के दौरान खासतौर पर महाशिवरात्रि के पावन अवसर पर रुद्राष्टकम स्तोत्र का पाठ करना अत्यंत शुभ फलदायी माना जाता है। इस दिन श्रद्धा और भक्ति भाव से इसका जाप करने से साधक के कष्ट दूर होते हैं, मन को शांति मिलती है और सफलता का आशीर्वाद प्राप्त होता है।

रुद्राष्टकम स्तोत्रम (Shiv Rudrashtakam Path)

नमामीशमीशान निर्वाणरूपं

विभुं व्यापकं ब्रह्म वेदस्वरूपं।
निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरीहं
चिदाकाशमाकाशवासं भजेऽहं।।1।।
 
निराकारमोंकारमूलं तुरीयं
गिरा ग्यान गोतीतमीशं गिरीशं।
करालं महाकाल कालं कृपालं
गुणागार संसारपारं नतोऽहं।।2।।
  
तुषाराद्रि संकाश गौरं गभीरं
मनोभूत कोटि प्रभा श्रीशरीरं।
स्फुरन्मौलि कल्लोलिनी चारु गंगा
लसद्भालबालेन्दु कण्ठे भुजंगा।।3।।
  
चलत्कुंडलं भ्रू सुनेत्रं विशालं
प्रसन्नाननं नीलकंठं दयालं।
मृगाधीशचर्माम्बरं मुंडमालं
प्रियं शंकरं सर्वनाथं भजामि।।4।।
  
प्रचंडं प्रकृष्टं प्रगल्भं परेशं
अखंडं अजं भानुकोटिप्रकाशं।
त्रयः शूल निर्मूलनं शूलपाणिं
भजेऽहं भवानीपतिं भावगम्यं।।5।।
  
कलातीत कल्याण कल्पान्तकारी
सदा सज्जनानन्ददाता पुरारी।
चिदानन्द संदोह मोहापहारी
प्रसीद प्रसीद प्रभो मन्मथारी।।6।।
  
न यावद् उमानाथ पादारविन्दं
भजंतीह लोके परे वा नराणां।
न तावत्सुखं शान्ति सन्तापनाशं
प्रसीद प्रभो सर्वभूताधिवासं।।7।।
  
न जानामि योगं जपं नैव पूजां
नतोऽहं सदा सर्वदा शम्भु तुभ्यं।
जरा जन्म दुःखौघ तातप्यमानं
प्रभो पाहि आपन्नमामीश शम्भो।।8।।
 
रुद्राष्टकमिदं प्रोक्तं विप्रेण हरतोषये।
ये पठन्ति नरा भक्त्या तेषां शम्भुः प्रसीदति।।9।।

॥ इति श्रीगोस्वामितुलसीदासकृतं श्रीरुद्राष्टकं सम्पूर्णम् ॥

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