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सनातन धर्म में बिना सिले कपड़ों की परंपरा है खास, जन्म से मृत्यु तक इसका महत्व, वजह जान रह जाएंगे हैरान

 Written By: Arti Azad
 Published : Aug 07, 2026 12:08 am IST,  Updated : Aug 07, 2026 12:08 am IST

सनातन परंपरा में बिना सिले कपड़े केवल पहनावा नहीं, बल्कि पवित्रता, सादगी और वैराग्य का प्रतीक माने जाते हैं। धार्मिक अनुष्ठान से लेकर अंतिम संस्कार तक इनका उपयोग विशेष महत्व रखता है। जानिए बिना सिले कपड़ों क्यों है खास और क्या है इनका महत्व।

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सनातन धर्म में बिना सिले कपड़ों का महत्व Image Source : PINTEREST

सनातन धर्म में पूजा-पाठ और धार्मिक संस्कारों के दौरान बिना सिले कपड़े पहनने की परंपरा चली आ रही है। जन्म से लेकर जीवन की अंतिम विदाई तक कई महत्वपूर्ण संस्कारों में बिना सिले वस्त्रों का विशेष महत्व है। सदियों पुरानी यह परंपरा आज भी निभाई जा रही है। आखिर इन साधारण दिखने वाले कपड़ों को इतना महत्व क्यों दिया गया है? आइए जानते हैं इसके पीछे सनातन धर्म की क्या मान्यताएं।

पवित्रता का प्रतीक

हिंदू धर्म में बिना सिले वस्त्रों को शुद्धता और सादगी का प्रतीक माना जाता है। ऐसे वस्त्र प्राकृतिक रूप के अधिक करीब होते हैं और इनमें कृत्रिम बदलाव कम होते हैं। यही वजह है कि पूजा, हवन और कई धार्मिक अनुष्ठानों के दौरान धोती, साड़ी या अन्य बिना सिले वस्त्र पहनने की परंपरा है।

जन्म से जुड़ी परंपरा

कई हिंदू परिवारों में नवजात शिशु को सबसे पहले बिना सिले कपड़े में लपेटा जाता है। इसे जीवन की पवित्र शुरुआत का प्रतीक माना जाता है। अलग-अलग क्षेत्रों में परंपराएं भले ही अलग हों, लेकिन इस प्रथा का आध्यात्मिक महत्व लगभग समान है। जो संदेश देती है कि हर व्यक्ति इस दुनिया में समान और निर्मल रूप में आता है।

अंतिम यात्रा में महत्व

अंतिम संस्कार के समय भी बिना सिले कपड़ों का उपयोग होता है। मान्यताओं के अनुसार, जीवन के अंत में धन, पद और वैभव पीछे छूट जाते हैं। साधारण और बिना सिले वस्त्र इस बात का प्रतीक हैं कि मनुष्य इस संसार से खाली हाथ ही विदा होता है और प्रकृति के सामने सभी समान हैं।

तीर्थ और पूजा में उपयोग

कई तीर्थयात्राओं, मंदिरों और धार्मिक अनुष्ठानों में श्रद्धालु बिना सिले वस्त्र धारण करते हैं। ये अनुशासन, आत्मसंयम और आध्यात्मिक एकाग्रता का प्रतीक होते हैं। मान्यता है यह पहनावा व्यक्ति को उस समय तक सांसारिक आकर्षणों से दूर रहकर ईश्वर की भक्ति में मन लगाने की प्रेरणा देता है।

त्याग और साधना का संदेश

संत, तपस्वी आदि भी अक्सर सादे और बिना सिले वस्त्र धारण करते हैं। यह उनके त्याग, सादगी और मोह-माया से दूर रहने के भाव को दर्शाता है। उनका पहनावा इस बात का प्रतीक माना जाता है कि आध्यात्मिक जीवन में बाहरी दिखावे से अधिक महत्व साधना, संयम और आत्मिक उन्नति का होता है।

(Disclaimer: यहां दी गई जानकारियां धार्मिक आस्था और लोक मान्यताओं पर आधारित हैं। इसका कोई भी वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। इंडिया टीवी एक भी बात की सत्यता का प्रमाण नहीं देता है।)

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