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88,000 ब्राह्मणों को भोजन कराने जितना फल देता है योगिनी एकादशी व्रत, जानिए किस राजा से जुड़ी है इसकी कथा

 Written By: Laveena Sharma
 Published : Jul 06, 2026 09:12 am IST,  Updated : Jul 06, 2026 09:15 am IST

योगिनी एकादशी की कथा अलकापुरी नगरी के राजा और धन के देवता कुबेर भगवान से जुड़ी हुई है। जानिए किस कारण से कुबेर देवता ने अपने सेवक हेममाली को कोढ़ी बनने का श्राप दिया था और कैसे उनके सेवक ने योगिनी एकादशी व्रत को करके अपने पापों से मुक्ति पाई थी।

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योगिनी एकादशी की कथा और महत्व Image Source : INDIA TV

देवशयनी एकादशी से पहले आने वाली एकादशी को योगिनी एकादशी के नाम से जाना जाता है। धार्मिक मान्यताओं अनुसार इस एकादशी का व्रत रखने से जन्म-जन्मांतर के पापों से मुक्ति मिल जाती है। इतना ही नहीं ये एकादशी व्रत 88000 ब्राह्मणों को भोजन कराने जितना फल प्रदान करता है। साथ ही स्वर्ग की प्राप्ति कराता है। विशेष रूप से यह व्रत उन लोगों के लिए अत्यंत लाभकारी साबित है जो लोग लंबे समय से किसी बीमारी, आर्थिक तंगी या पारिवारिक समस्याओं से परेशान हैं। बता दें 2026 में योगिनी एकादशी व्रत 10 जुलाई को रखा जाएगा। चलिए आपको बताते हैं इस एकादशी की पावन कथा।

राजा कुबेर से जुड़ी है योगिनी एकादशी की कथा

योगिनी एकादशी की कथा अनुसार, प्राचीन काल में अलकापुरी नामक एक नगरी में धन के देवता कुबेर राज्य करते थे। वो भगवान शिव के परम भक्त थे। उनका हेममाली नामक एक यक्ष सेवक था, जो उनकी पूजा के लिए फूल लाया करता था। हेममाली की विशालाक्षी नाम की अति सुन्दर पत्नी थी। एक दिन हेममाली पुष्प लाने के बजाय अपनी पत्नी के साथ काम-क्रीड़ा में मग्न हो गया और फूल राजा कुबेर को देना भूल गया। जब हेममाली को काफी देर हो गई तो उसे दरबार में बुलाया गया। राजा के सेवकों ने हेममाली के पुष्प ना लाने का कारण बताया, जिसे सुनकर कुबेर क्रोधित हो गए और उन्होंने उसे शाप देते हुए कहा कि कोढ़ी होकर  मृत्युलोक में कष्ट भोगने का श्राप दे दिया।

कुबेर ने दिया श्राप

कुबेर के श्राप से हेममाली स्वर्ग से निकलकर मृत्युलोक में आ गया और उसे कोढ़ का रोग हो गया। वह कष्ट भोगते हुए हिमालय क्षेत्र में भटकता रहा। एक दिन वह मुनि मार्कंडेय के आश्रम में पहुंचा। हेममाली को देखकर मार्कण्डेय ऋषि ने कहा - तूने ऐसे कौन-से निकृष्ट कर्म किये हैं, जिससे तेरी ये स्थिति हुई है। हेममाली ने अपने पाप और श्राप की पूरी कहानी सुनाई। मुनि मार्कंडेय ने उस पर करुणा दिखाते हुए कहा, तेरे उद्धार का एक ही उपाय है। तू आषाढ़ मास के कृष्णपक्ष की योगिनी एकादशी का विधि पूर्वक व्रत कर। इससे तुझे कोढ़ रोग से भी मुक्ति मिलेगी और तू स्वर्ग में भी वापस जा पाएगा। 

योगिनी एकादशी व्रत ने दिलाई श्राप से मुक्ति

हेममाली ने विधिवत योगिनी एकादशी का व्रत किया। इससे उसका शरीर रोग मुक्त हो गया और वह अपने दिव्य स्वरूप में वापस आ गया। साथ ही उसे स्वर्ग में भी पुनः स्थान मिला। कहते हैं भगवान श्रीकृष्ण ने खुद योगिनी एकादशी का महत्व बताते हुए कहा है कि जो भी ये व्रत रखता है और इसकी पावन कथा को सुनता है उसे 88000 ब्राह्मणों को भोजन कराने के बराबर पुण्य फल मिलता है। इतना ही नहीं इस व्रत को करने से मनुष्य के सभी पाप भी नष्ट हो जाते हैं।

(Disclaimer: यहां दी गई जानकारियां धार्मिक आस्था और लोक मान्यताओं पर आधारित हैं। इसका कोई भी वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। इंडिया टीवी एक भी बात की सत्यता का प्रमाण नहीं देता है।)

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