मीनाक्षी जोशी
नई दिल्ली: एक और ओलंपिक ख़त्म हो गया। कई देशों के खिलाड़ी आए, अपना दम-खम दिखाया। पदक-सम्मान बटोरा और नई प्रतिस्पर्धा के लिए शायद कुछ ही दिनों में तैयारी भी शुरू कर दें। ओलंपिक कई आएंगे और जाएंगे लेकिन बतौर सवा सौ करोड़ की आबादी वाला देश भारत खुद को कहां पाएगा ये समझना होगा। वैसे तो जनसंख्या में हम दुनिया का दूसरा बड़ा मुल्क हैं लेकिन ओलंपिक पदक तालिका में 67 वें पायदान पर, आखिर क्यों?
क्या यह कड़वा सच नहीं कि ओलंपिक में कमाल करने वाले हमारे खिलाड़ी इसलिए कामयाब हो पाये क्योंकि वो आर्थिक रूप से समर्थ हैं। वे वर्ल्ड क्लास ट्रेनिंग हासिल कर सकते हैं लेकिन ऐसी कई प्रतिभाएं हैं जो मुफ़लिसी में दम तोड़ रही हैं। कुछ उदहारण पर स्थिति साफ लगने लगेगी।
राष्ट्रीय स्तर की तीरंदाज़ सुलेखा कुमारी धनबाद के छोटे से क़स्बे में अपने परिवार के साथ रहतीं हैं। पिता चाय की दुकान चलाते हैं। वह खुद 3 हज़ार की नौकरी करतीं हैं। वहीँ ट्रेनिंग लेती हैं जहां से दीपिका जैसी अंतर्राष्ट्रीय तीरंदाज़ सीखती रहीं हैं। आर्थिक मजबूरी देखिये, परिवार पेट तो पाल ले, लेकिन 2 लाख का रिकर्व (धनुष) कहां से खरीदे! अब सपने कुंद न हों तो क्या हो?
हरियाणा की पहचान खेल और खिलाड़ियों से है, लेकिन यहां भी स्थिति भी सबके लिए समान नहीं है। एक स्टेट बॉक्सिंग चैंपियन श्यामलाल सिंह करीब 2 साल पहले ही बॉक्सिंग को अलविदा कह चुका है। क्योंकि बॉक्सिंग के लिए ज़रूरत है अच्छी डाइट की। आंखों के सपने पूरे करने से पहले ज़रूरी है पेट की आग शांत करना। बॉक्सिंग पीछे छूट गयी और श्यामलाल गार्ड बन गया।
हाल ही में कोच के भेदभाव पूर्ण रवैये की वजह से एक हैंडबॉल खिलाड़ी ने जान दे दी । ख़ून से पीएम मोदी को ख़त भी लिख गयी।
क्या यह सच नहीं है कि मैरी कॉम को अपनी आकांक्षाओं को पूरा करने के लिए सिस्टम से लड़ना पड़ा। एड़ी चोटी का ज़ोर लगाते वक़्त उन्हें नहीं पता था कि कभी वो कामयाब हो पाएंगी या नहीं .....लड़ती रहीं अकेले। लेकिन जीत के बाद पैसों की बारिश हो गयी और सब उनके साथ हो लिए।
सिस्टम के दिवालियापन का नरसिंह से बड़ा उदाहरण हाल में तो कोई नहीं , जिनके पास 'कैस' को प्रस्तुत करने लायक पुख़्ता सबूत नहीं थे। आख़िरकार मैदान में जाने से पहले ही नरसिंह हार गया।
पदक जीतने पर तो तोहफों और पैसों की बरसात हो जाती है, लेकिन तैयारी के वक़्त जितनी मदद की ज़रूरत होती है काश वो मदद हर खिलाड़ी को मुहैया हो जाए तो पदकों की झड़ी लग जाए। अभिनव बिंद्रा, साक्षी मलिक, साइना नेहवाल, पी वी सिंधु या अन्य पदकधारी खिलाड़ी अपनी खुद की कोशिशों का नतीजा है, सिस्टम की पैदाइश नहीं।
बड़ा अच्छा लगता है भारत की हर जीत पर तालियां बजाना, ट्वीट करना। हर खिलाड़ी की कामयाब परवाज़ पर खुद भी उड़ान भरना, लेकिन सबसे ज्यादा ज़रूरत है माहौल बनाने और क़ाबिलों के लिए संसाधन जुटाने की। उम्मीद है कि 2020 टोक्यो ओलंपिक तक केवल दल ही बड़ा न हो जीत का ब्लू प्रिंट भी बड़ा हो।