उत्तर प्रदेश के अमरोहा जिले में साल 2008 में हुआ बहुचर्चित बावनखेड़ी हत्याकांड एक बार फिर चर्चा में आ गया है। इस सनसनीखेज मामले का मुख्य दोषी सलीम पूरे 18 साल बाद जेल से अपने घर वापस आया है। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उसे अपनी बहन की शादी में शामिल होने और उसे विदा करने के लिए 7 दिन की पैरोल दी है। अदालत के आदेश के मुताबिक सलीम को 21 से 27 अक्टूबर तक की पैरोल मिली है और उसे 27 अक्टूबर की शाम तक हर हाल में वापस नैनी जेल पहुंचना होगा। पैरोल के दौरान वह सिर्फ चुनिंदा लोगों से ही मिल सकता है और वह लगातार पुलिस के कड़े पहरे में रहेगा।
क्या था पूरा बावनखेड़ी हत्याकांड?
यह खौफनाक घटना 14 और 15 अप्रैल 2008 के रात की है। अमरोहा के हसनपुर के बावनखेड़ी गांव में मास्टर शौकत अली और उनके परिवार के सात सदस्यों की गला रेतकर बेरहमी से हत्या कर दी गई थी। मरने वालों में खुद मास्टर शौकत अली, उनकी पत्नी हाशमी, बेटे अनीस और राशिद, बहू अंजुम, पोता अर्श और एक भांजी राबिया शामिल थीं। पुलिस की जांच में जो सच सामने आया, उसने सभी को हिला कर रख दिया था। जांच में पता चला कि शौकत अली की बेटी शबनम और सलीम एक-दूसरे से प्यार करते थे और शादी करना चाहते थे।
परिवार के लोग इस रिश्ते के खिलाफ थे। इसी बात और संपत्ति के लालच में आकर शबनम और सलीम ने मिलकर खौफनाक साजिश रची। उन्होंने रात के समय परिवार के सभी सदस्यों को खाने में नशीला पदार्थ खिलाकर बेहोश कर दिया और फिर एक-एक करके परिवार के सात लोगों को मौत के घाट उतार दिया। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने 25 जुलाई 2010 को शबनम और सलीम दोनों को फांसी की सजा सुनाई थी। फिलहाल सलीम नैनी जेल में बंद है, जबकि शबनम बरेली की जेल में अपनी सजा काट रही है।
परिजनों का फूटा गुस्सा, बोले- हमारे सूखे जख्म ताजा हो गए
18 साल बाद सलीम के पैरोल पर घर लौटने से बावनखेड़ी गांव में लोगों की भारी भीड़ इकट्ठा हो गई है। हालांकि, इस पैरोल से मारे गए परिवार के रिश्तेदार और शबनम के चाचा-चाची बेहद गुस्से में हैं। शबनम की चाची फातमा ने नाराजगी जताते हुए कहा कि अदालत से फांसी की सजा तय होने के बावजूद इतने सालों बाद भी उन्हें फांसी नहीं दी गई, और अब सलीम को पैरोल दे दी गई है। उन्होंने गुस्से में कहा कि इस फैसले ने हमारे पुराने और सूखे जख्मों को फिर से हरा कर दिया है, हम तो बस इन दोनों के लिए सिर्फ फांसी की सजा चाहते हैं। वहीं, शबनम के चाचा सत्तार का कहना है कि अगर इन्हें जल्द फांसी नहीं दी गई, तो समाज में गलत संदेश जाएगा और लोगों का कानून से भरोसा उठ जाएगा।
अमरोहा से राजीव शर्मा की रिपोर्ट
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