दिल्ली पुलिस की इंटेलिजेंस फ्यूजन एंड स्ट्रैटेजिक ऑपरेशंस (IFSO) यूनिट ने डिजिटल अरेस्ट साइबर ठगी मामले की जांच के दौरान मथुरा से दो आरोपियों को गिरफ्तार किया है। पुलिस की जांच में कथित तौर पर ऐसे नेटवर्क का खुलासा हुआ है, जो साइबर अपराधियों को उपलब्ध कराने के लिए फिजिकल सिम कार्ड और ई-सिम की खरीद, एक्टिवेशन और सप्लाई में शामिल था। पुलिस के मुताबिक, आरोपियों को 20 और 21 अक्टूबर 2026 की दरमियानी रात उत्तर प्रदेश के मथुरा जिले के सदर क्षेत्र स्थित कोटा गांव में छापेमारी के दौरान पकड़ा गया। जांच में सामने आया है कि आरोपियों ने कथित तौर पर अलग-अलग स्रोतों से सिम कार्ड जुटाए, ई-सिम एक्टिवेट किए और सोशल मीडिया व ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के जरिए उनकी सप्लाई की। आरोपियों द्वारा एक्टिवेट किए गए सिम कार्डों से जुड़े उपलब्ध डेटा का विश्लेषण करने पर नेशनल साइबर क्राइम रिपोर्टिंग पोर्टल (NCRP) पर दर्ज 20 से ज्यादा शिकायतों से इनके कथित संबंध सामने आए हैं।
डिजिटल अरेस्ट के नाम पर 1.64 करोड़ रुपये की ठगी
यह मामला ई-एफआईआर नंबर 138/2026, दिनांक 1 सितंबर 2026 से जुड़ा है। मामला भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 318(4) और 340 के तहत दिल्ली के स्पेशल सेल/IFSO थाने में दर्ज किया गया था। शिकायतकर्ता श्रीनिवास पुत्र राम सिंह के मुताबिक, आरोपियों ने कथित तौर पर उन्हें व्हाट्सऐप के जरिए संपर्क कर कानूनी कार्रवाई की धमकी दी और करीब दो सप्ताह तक डिजिटल अरेस्ट के नाम पर मानसिक दबाव में रखा। इस दौरान, कथित धमकियों और दबाव के चलते शिकायतकर्ता ने 6 अलग-अलग बैंक खातों में RTGS के जरिए छह ट्रांजैक्शन में कुल 1.64 करोड़ रुपये ट्रांसफर कर दिए। मामले की जांच के दौरान, पुलिस ने उन मोबाइल नंबरों और डिजिटल उपकरणों का विश्लेषण किया, जिनका इस्तेमाल कथित साइबर ठगी में हुआ था। तकनीकी जांच के जरिए पुलिस टीम को वृंदावन-मथुरा क्षेत्र तक पहुंचने में सफलता मिली।
फर्जी हेल्थ कैंप लगाकर जुटाते थे आधार और बायोमेट्रिक डेटा
जांच में सबसे अहम खुलासा ग्रामीण इलाकों में लगाए जाने वाले कथित फर्जी हेल्थ कैंप को लेकर हुआ है। पुलिस के मुताबिक, आरोपी अलग-अलग गांवों में हेल्थ कैंप लगाने और सस्ती दरों पर दवाइयां उपलब्ध कराने के नाम पर ग्रामीणों को आकर्षित करते थे। आरोप है कि इस दौरान ग्रामीणों से आधार कार्ड और बायोमेट्रिक संबंधी जानकारी ली जाती थी। बाद में इसी जानकारी का कथित तौर पर दुरुपयोग कर सिम कार्ड हासिल किए जाते थे। पुलिस अब यह पता लगाने में जुटी है कि कितने लोगों की पहचान संबंधी जानकारी का इस्तेमाल उनकी जानकारी या सहमति के बिना किया गया और इस तरीके से कितने सिम कार्ड एक्टिवेट कराए गए।
फेसबुक, इंस्टाग्राम और टेलीग्राम के जरिए ई-सिम की सप्लाई
पुलिस की शुरुआती जांच के मुताबिक, आरोपी करीब एक साल से सिम कार्ड और ई-सिम की खरीद-फरोख्त तथा सप्लाई में कथित तौर पर शामिल थे। दोनों मिलकर प्रतिदिन लगभग 20 से 30 ई-सिम की खरीद या ट्रेडिंग करते थे। जांच में सामने आया है कि आरोपी ऑनलाइन ग्रुप और मैसेजिंग प्लेटफॉर्म के जरिए पहले से एक्टिवेटेड ई-सिम हासिल करते थे। इसके अलावा, फिजिकल सिम कार्ड को ई-सिम में बदलकर उससे जुड़े QR कोड दूसरे लोगों तक पहुंचाने का भी आरोप है। पुलिस को संदेह है कि पिछले एक साल के दौरान आरोपियों ने 3000 से ज्यादा सिम कार्ड एक्टिवेट किए या उनकी सप्लाई में भूमिका निभाई। इस संख्या और नेटवर्क में उनकी वास्तविक भूमिका की पुष्टि के लिए जांच जारी है।
800 से 1200 रुपये में खरीद, 2000 रुपये तक में बिक्री
जांच में कथित तौर पर ई-सिम के कारोबार का एक वित्तीय मॉडल भी सामने आया है। आरोप है कि आरोपी एक एक्टिवेटेड सिम या ई-सिम करीब 800 से 1200 रुपये में खरीदते थे और उसे लगभग 2000 रुपये में आगे सप्लाई करते थे। इस नेटवर्क में भुगतान के लिए USDT क्रिप्टोकरेंसी का इस्तेमाल किए जाने की बात भी सामने आई है। USDT एक ऐसी क्रिप्टोकरेंसी है, जिसकी कीमत अमेरिकी डॉलर के मूल्य से जुड़ी रहती है। पुलिस अब डिजिटल वॉलेट, ट्रांजैक्शन और दूसरे वित्तीय रिकॉर्ड की जांच कर रही है, ताकि यह पता लगाया जा सके कि इस नेटवर्क से कितने लोगों को आर्थिक फायदा हुआ और इसके पीछे कौन-कौन लोग शामिल हैं।
विदेशी संपर्कों की भी होगी जांच
जांच के दौरान, आरोपियों के ऑनलाइन संपर्कों और कुछ विदेशी संपर्कों से जुड़े संवाद की जानकारी भी सामने आई है। पुलिस इन संपर्कों की पहचान, उनकी भूमिका और बड़े साइबर अपराध नेटवर्क से संभावित संबंधों की पड़ताल कर रही है। जांच एजेंसी को संदेह है कि इस तरह हासिल किए गए ई-सिम का इस्तेमाल डिजिटल अरेस्ट स्कैम समेत दूसरे साइबर फ्रॉड और SIM-बॉक्स सिस्टम को संचालित करने में किया जा सकता था। हालांकि, प्रत्येक सिम का इस्तेमाल किस अपराध में हुआ, इसकी पुष्टि डिजिटल साक्ष्यों के आधार पर की जा रही है।
मथुरा से दो आरोपी गिरफ्तार और 3 मोबाइल फोन बरामद
पुलिस ने 29 साल के जितेंद्र सिंह और 21 साल के बृजेश कुमार को गिरफ्तार किया है। पुलिस ने आरोपियों के कब्जे से तीन मोबाइल फोन बरामद किए हैं। जांच में यह भी सामने आया है कि आरोपी कथित तौर पर पहचान से बचने के लिए मोबाइल फोन बदलते रहते थे और पुराने फोन नष्ट कर देते थे। बरामद मोबाइल फोन की जांच से नेटवर्क में शामिल अन्य लोगों और डिजिटल लेनदेन के बारे में अहम सुराग मिलने की उम्मीद है।
दिल्ली पुलिस की टीम ने ऐसे किया नेटवर्क का खुलासा
इस मामले की जांच के लिए SI अमित वर्मा, हेड कांस्टेबल गिरिराज और कांस्टेबल आशीष की टीम गठित की गई थी। ऑपरेशन ACP/IFSO विवेकानंद झा की करीबी निगरानी और DCP/IFSO गौरव त्यागी के समग्र पर्यवेक्षण में चलाया गया। मोबाइल नंबरों, डिवाइस डेटा और अन्य तकनीकी साक्ष्यों के विश्लेषण के बाद पुलिस टीम मथुरा पहुंची, जहां छापेमारी कर दोनों आरोपियों को गिरफ्तार किया गया। इसके बाद उन्हें आगे की जांच के लिए दिल्ली लाया गया।
NCRP की 20 से ज्यादा शिकायतों से है कथित लिंक
पुलिस के अनुसार, आरोपियों द्वारा कथित तौर पर एक्टिवेट किए गए सिम कार्डों के डेटा को साइबर अपराध की शिकायतों से मिलाने पर 20 से ज्यादा NCRP शिकायतों से संभावित संबंध सामने आए हैं। इन शिकायतों में करीब 2.64 करोड़ रुपये की कुल ठगी से कथित संबंध होने की जानकारी दी गई है। हालांकि, यह स्पष्ट करना जरूरी है कि इस कुल राशि का पूरा हिस्सा इसी नेटवर्क के जरिए ठगा गया, इसकी पुष्टि अभी जांच के अधीन है। दर्ज शिकायतों में बताए गए नुकसान और आरोपियों की वास्तविक भूमिका का सत्यापन किया जा रहा है।
बड़े नेटवर्क की तलाश में है पुलिस
दिल्ली पुलिस अब इस कथित नेटवर्क से जुड़े अन्य लोगों की पहचान करने, ई-सिम की सप्लाई की पूरी श्रृंखला का पता लगाने, क्रिप्टोकरेंसी और दूसरे वित्तीय लेनदेन की जांच करने तथा बरामद डिजिटल उपकरणों से साक्ष्य जुटाने में लगी है। जांच का मुख्य फोकस यह पता लगाना है कि फर्जी हेल्थ कैंप के जरिए कितने लोगों की पहचान संबंधी जानकारी हासिल की गई, कितने सिम कार्ड एक्टिवेट हुए और उनका इस्तेमाल डिजिटल अरेस्ट तथा अन्य साइबर ठगी के मामलों में किस स्तर पर किया गया।
दिल्ली पुलिस की नागरिकों से अपील
दिल्ली पुलिस ने लोगों से अपील की है कि वे किसी भी अनजान व्यक्ति के साथ आधार OTP, सिम एक्टिवेशन कोड या अन्य वेरिफिकेशन संबंधी जानकारी साझा न करें। सस्ती दवाइयों या मुफ्त स्वास्थ्य सेवाओं के नाम पर आयोजित होने वाले संदिग्ध हेल्थ कैंप में पहचान संबंधी दस्तावेज देने से पहले आयोजकों की विश्वसनीयता की जांच करें। पुलिस ने स्पष्ट किया है कि डिजिटल अरेस्ट के नाम पर की जाने वाली धमकियां साइबर ठगी का तरीका हैं। कोई भी वैध पुलिस अधिकारी या जांच एजेंसी वीडियो कॉल पर किसी व्यक्ति को गिरफ्तार नहीं करती और न ही केस से छुटकारा दिलाने के नाम पर पैसे मांगती है। इससे पहले हाल में दिल्ली पुलिस ने 3.93 करोड़ की साइबर ठगी मामले में 7 आरोपियों को दबोचा था।
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