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राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता फिल्म मेकर आर सरथ का निधन, ‘सयाह्नम’ से छोड़ी थी अमिट छाप

 Written By: Jaya Dwivedie
 Published : Sep 07, 2026 12:40 pm IST,  Updated : Sep 07, 2026 12:40 pm IST

आर सरथ के निधन से मलयालम सिनेमा और केरल के कला जगत को बड़ी क्षति हुई। फिल्मकार, पटकथा लेखक, शोधकर्ता और सांस्कृतिक प्रशासक के रूप में उन्होंने सिनेमा, विरासत संरक्षण और संस्कृति में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

R sarath- India TV Hindi
आर सरथ। Image Source : HTTPS://WWW.SARATHFILMDIRECTOR.COM/

मलयालम सिनेमा के जाने-माने फिल्मकार, पटकथा लेखक और सांस्कृतिक प्रशासक आर सरथ का सोमवार, 7 सितंबर को तिरुवनंतपुरम में निधन हो गया। वह 65 वर्ष के थे और लंबे समय से किडनी से जुड़ी स्वास्थ्य समस्याओं का इलाज करा रहे थे। उनका उपचार KIMS अस्पताल में चल रहा था। सरथ ने अपने सिनेमा के साथ-साथ कला, संस्कृति, शोध और सरकारी प्रशासन के क्षेत्र में भी उल्लेखनीय काम किया। उनके निधन को मलयालम फिल्म जगत के लिए एक महत्वपूर्ण क्षति माना जा रहा है।

‘सयाह्नम’ से शुरू हुआ फिल्मी सफर

केरल के कोल्लम जिले के पुनालूर के रहने वाले आर सरथ ने साल 2000 में फिल्म ‘सयाह्नम’ के जरिए निर्देशन और पटकथा लेखन की दुनिया में कदम रखा। यह फिल्म उनके करियर के लिए बेहद महत्वपूर्ण साबित हुई। ‘सयाह्नम’ को सात केरल राज्य फिल्म पुरस्कार मिले और इसे सर्वश्रेष्ठ प्रथम फिल्म के लिए इंदिरा गांधी राष्ट्रीय पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया। वर्ष 2001 में फिल्म को म्यूनिख इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल के प्रतियोगिता खंड में प्रदर्शित किया गया। इसके बाद भी फिल्म ने कई अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोहों में जगह बनाई और सरथ के काम को भारतीय सिनेमा के बाहर पहचान मिली।

सामाजिक विषयों पर केंद्रित फिल्में

‘सयाह्नम’ के बाद सरथ ने वर्ष 2003 में ‘स्थिति’ का निर्देशन किया। इस फिल्म को बैंकॉक इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में प्रदर्शित किया गया। वर्ष 2006 में आई उनकी फिल्म ‘शीलावती’ ने भी गंभीर सामाजिक मुद्दों को केंद्र में रखा और इसका प्रीमियर ताइवान में आयोजित एशिया पैसिफिक फिल्म फेस्टिवल में हुआ। सरथ की फिल्मों में मनोरंजन के साथ सामाजिक सरोकार और मानवीय संवेदनाओं को प्रमुखता मिलती थी।

अंतरराष्ट्रीय सिनेमा से जुड़ा काम

सरथ ने वर्ष 2011 में इंडो-चाइनीज सहयोग से बनी फिल्म ‘द डिजायर: ए जर्नी ऑफ अ वुमन’ का निर्देशन किया और इसके सह-लेखन में भी योगदान दिया। फिल्म ने एक महिला की यात्रा और उसके अनुभवों को केंद्र में रखा। इसके अलावा उनकी फिल्मोग्राफी में 2012 की ‘पैराडाइज’ भी शामिल रही, जिसे मैक्सिको इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल और एम्स्टर्डम फिल्म फेस्टिवल में सम्मान मिला। उन्होंने चार्ली चैपलिन के अभिनय करियर के 100 वर्ष पूरे होने के अवसर पर ‘बुद्धन चिरिक्कुन्नु’ का भी निर्देशन किया।

राजा रवि वर्मा की दुर्लभ भित्तिचित्रों की खोज

आर सरथ की पहचान केवल फिल्म निर्देशक के रूप में नहीं थी। वह कला और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण से जुड़े शोध कार्यों में भी सक्रिय रहे। उनकी डॉक्यूमेंट्री ‘द पेंटेड एपिक्स’ से जुड़े शोध के दौरान उन्होंने किलुनूर मंदिर में राजा रवि वर्मा से संबंधित दुर्लभ भित्तिचित्रों की खोज की। इस खोज ने इन चित्रों को लेकर आगे के अध्ययन और चर्चा का रास्ता खोला। भारतीय संस्कृति के क्षेत्र में उनके शोध कार्य को देखते हुए उन्हें 1996 में भारत सरकार के सांस्कृतिक विभाग की ओर से जूनियर फेलोशिप भी प्रदान की गई थी।

सिनेमा से आगे सांस्कृतिक प्रशासन तक योगदान

सरथ का पेशेवर जीवन फिल्म निर्माण तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने केरल के सूचना एवं जनसंपर्क विभाग में उप निदेशक के रूप में काम किया और बाद में सांस्कृतिक विभाग के अंतर्गत MPCC के निदेशक की जिम्मेदारी संभाली। वह भारत भवन के सचिव भी रहे, जहां उन्होंने राज्य की सांस्कृतिक गतिविधियों और प्रशासनिक कार्यों में योगदान दिया। अंग्रेजी साहित्य में स्नातकोत्तर सरथ ने फिल्म निर्माण और पत्रकारिता का औपचारिक प्रशिक्षण भी लिया था। इस वजह से उनके व्यक्तित्व और कार्यक्षेत्र में साहित्य, पत्रकारिता, सिनेमा, कला शोध और सांस्कृतिक प्रशासन का अनूठा मेल दिखाई देता है।

कला जगत में छोड़ी स्थायी छाप

अपने लंबे करियर में आर सरथ को नौ अंतरराष्ट्रीय पुरस्कारों के अलावा एक राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार और चार केरल राज्य फिल्म पुरस्कार प्राप्त हुए। उनका काम व्यावसायिक सिनेमा से अलग सामाजिक विषयों, सांस्कृतिक विरासत और मानवीय अनुभवों को सामने लाने के लिए जाना जाता रहा। उनका निधन ऐसे समय में हुआ है जब मलयालम सिनेमा और केरल का सांस्कृतिक क्षेत्र उनके अनुभव और रचनात्मक दृष्टिकोण से अभी भी लाभ उठा सकता था। एक फिल्मकार, शोधकर्ता और सांस्कृतिक प्रशासक के रूप में आर. सरथ का योगदान आने वाले समय में भी याद किया जाएगा।

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