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जब राज कपूर को मिला फिल्मों का सबसे बड़ा अवॉर्ड, ऑक्सीजन मास्क लगाए व्हीलचेयर पर पहुंचे एक्टर, एक महीने बाद हुई मौत

 Written By: Jaya Dwivedie @JDwivedie
 Published : Jun 02, 2026 06:30 pm IST,  Updated : Jun 02, 2026 06:30 pm IST

राज कपूर को साल 1988 में दादासाहेब फाल्के पुरस्कार से नवाजा गया, लेकिन जब एक्टर ये अवॉर्ड लेने के लिए पहुंचे तो उनकी हालत बेहद खराब थी। व्हीलचेयर पर बैठे, चेहरे पर ऑक्सीजन मास्क लगाए वो इस सम्मान को हासिल करने के लिए राष्ट्रपति के पास पहुंच गए थे।

Raj kapoor- India TV Hindi
राज कपूर। Image Source : @INDIAHISTORYPIC

भारतीय सिनेमा में दादासाहेब फाल्के पुरस्कार को सबसे बड़ा और सबसे प्रतिष्ठित सम्मान माना जाता है। यह पुरस्कार फिल्म जगत में केवल उन चुनिंदा कलाकारों को दिया जाता है जिन्होंने अपने काम से एक अमिट छाप छोड़ी हो। हाल ही में दिग्गज अभिनेता मोहनलाल को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू द्वारा इस ऐतिहासिक सम्मान से नवाजा गया है। इसी तरह साल 1988 में महान अभिनेता और निर्देशक राज कपूर को भी इस सर्वोच्च सम्मान के लिए चुना गया था, लेकिन दुर्भाग्य से जिस दिन उन्हें यह पुरस्कार मिलना था, उसी दिन उन्हें अस्थमा का एक बहुत गंभीर दौरा पड़ा। उनकी हालत इतनी खराब थी कि वे पुरस्कार लेने के लिए मंच तक चलकर जाने की स्थिति में भी नहीं थे। ऐसे नाजुक समय में भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति आर वेंकैटरामन ने एक बेहद सराहनीय कदम उठाया। उन्होंने सरकारी नियम और प्रोटोकॉल को दरकिनार करते हुए खुद मंच से नीचे आकर दर्शकों के बीच बैठे राज कपूर को यह सम्मान सौंपा।

धूल भरी आंधी और राज कपूर की अचानक बिगड़ी तबीयत

एक पुराने इंटरव्यू में राज कपूर की बेटी रीमा जैन ने उस दुखद घटना को याद किया था कि कैसे दिल्ली में आयोजित राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार समारोह से ठीक पहले उनके पिता की तबीयत अचानक खराब हो गई थी। रीमा ने बताया था, 'मुझे कहीं न कहीं लगता है कि पापा ने अपनी मृत्यु का समय खुद तय कर लिया था। उन्हें 2 मई 1988 को दिल्ली में दादासाहेब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया जाना था। इसके लिए वे 30 अप्रैल को मुंबई से दिल्ली के लिए रवाना हुए थे। उन दिनों दिल्ली में धूल भरी आंधी चल रही थी। जैसे ही हवाई जहाज का दरवाजा खुला, धूल और हवा का एक तेज झोंका सीधे उनके चेहरे पर लगा। वे बचपन से ही अस्थमा के मरीज थे, इसलिए उस प्रदूषित हवा का सीधा और बुरा असर उनके फेफड़ों पर पड़ा।' सांस लेने में इतनी भारी तकलीफ होने के बावजूद राज कपूर ने इस समारोह में जाने का फैसला नहीं बदला। वे कार्यक्रम स्थल पर अपने साथ एक ऑक्सीजन सिलेंडर लेकर पहुंचे थे, लेकिन पूरे समारोह के दौरान वे काफी बेचैन और असहज नजर आ रहे थे।

जब राष्ट्रपति ने तोड़ा प्रोटोकॉल और मच गई हलचल

अपनी शारीरिक तकलीफों के बावजूद राज कपूर ने समारोह में बैठने की पूरी हिम्मत दिखाई, लेकिन जब मंच से उनके नाम की घोषणा हुई और उन्हें पुरस्कार लेने के लिए पोडियम तक जाना था, तो उनके शरीर ने उनका साथ नहीं दिया। वे अपनी कुर्सी से खड़े होने में भी पूरी तरह असमर्थ थे। रीमा जैन ने उस पल को याद करते हुए बताया, 'वे अपनी तकलीफ को जाहिर करने के लिए लगातार मेरी मां का हाथ जोर से भींच रहे थे। आखिरकार जब उनका नाम पुकारा गया तो वे खड़े नहीं हो सके। इसे देखकर वहां मौजूद लोगों के बीच थोड़ी हलचल और घबराहट मच गई।' उसी समय राष्ट्रपति आर वेंकैटरामन ने राज कपूर की गंभीर स्थिति को भांप लिया। उन्होंने तुरंत प्रोटोकॉल तोड़ा और खुद चलकर राज कपूर के पास नीचे आए और उन्हें पुरस्कार दिया। इसके तुरंत बाद राष्ट्रपति ने आदेश दिया, 'इन्हें तुरंत मेरी एम्बुलेंस में लिटाकर अस्पताल ले जाया जाए।' इसके बाद राज कपूर को अस्पताल में वेंटिलेटर पर रखा गया। दूरदर्शन पर लगातार उनके स्वास्थ्य को लेकर समाचार बुलेटिन जारी होने लगे और बड़े-बड़े मंत्री उनका हालचाल जानने अस्पताल पहुंचने लगे। एक तरह से उन्होंने अपने परिवार को मानसिक रूप से इस बात के लिए तैयार कर दिया था कि अब उनका जाने का समय आ गया है।

'द वन एंड ओनली शोमैन' पुस्तक में घटना का जिक्र

राज कपूर की दूसरी बेटी रितु नंदा ने भी अपने पिता के इस आखिरी सफर का पूरा विवरण अपनी किताब 'राज कपूर: द वन एंड ओनली शोमैन' में लिखा है। किताब के अंश बताते हैं, '2 मई 1988 को नई दिल्ली के सीरी फोर्ट ऑडिटोरियम में 35वें राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव पुरस्कार समारोह का आयोजन किया गया था। यहाँ राज कपूर को सिनेमा में उनके अद्वितीय योगदान के लिए दादासाहेब फाल्के पुरस्कार दिया गया। भारत के पहले फिल्म निर्माता के नाम पर रखा गया यह पुरस्कार फिल्म इंडस्ट्री का सबसे बड़ा राष्ट्रीय सम्मान है। अचानक आए दमे के दौरे के कारण राज कपूर मंच तक नहीं जा पा रहे थे। उस महान कलाकार के सम्मान में देश के राष्ट्रपति आर वेंकैटरामन ने गरिमा दिखाते हुए नियमों को अलग रखा और मंच से नीचे उतरकर अग्रिम पंक्ति में बैठे बीमार राज कपूर को यह पुरस्कार सौंपा।'

शोमैन का आखिरी सफर

रितु नंदा ने अपनी किताब में भावुक होते हुए यह भी लिखा कि यह आखिरी मौका था जब पूरे परिवार और दुनिया ने राज कपूर को अपने पैरों पर खड़े देखा था। उन्होंने आगे लिखा, 'इस महान शोमैन की जिंदगी का पर्दा तालियों और दर्शकों की गूंज के बीच गिरा। ठीक वैसे ही, जैसा उन्होंने अपनी फिल्म 'मेरा नाम जोकर' के दूसरे भाग के अंत के लिए सोचा था, एक ऐसी कहानी जो लिखी तो गई थी लेकिन उस पर कभी फिल्म नहीं बन सकी।' इस ऐतिहासिक और भावुक पुरस्कार समारोह के ठीक एक महीने बाद 2 जून 1988 को राज कपूर ने इस दुनिया को हमेशा के लिए अलविदा कह दिया।

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