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Gandhari Review: थ्रिलर बनने की हड़बड़ी ने बिगाड़ा खेल, रास्ते से भटक गई तापसी पन्नू की फिल्म

 Written By: Anindita Mukhopadhyay
 Published : Sep 03, 2026 01:46 pm IST,  Updated : Sep 03, 2026 06:05 pm IST

तापसी पन्नू स्टारर 'गांधारी' एक मां द्वारा अपनी अपहृत बेटी को खोजने की भावनात्मक कहानी है। दमदार कलाकारों के बावजूद अत्यधिक जल्दबाजी और कमजोर पटकथा के कारण यह फिल्म दर्शकों को प्रभावित करने में नाकाम रहती है।

Gandhari
फिल्म के ट्रेलर से लिया गया एक स्टिल। Photo: NETFLIX INDIA
  • फिल्म रिव्यू: गांधारी
  • स्टार रेटिंग 2/5
  • पर्दे पर: 03/09/2026
  • डायरेक्टर: देवाशीश मखीजा
  • शैली: क्राइम थ्रिलर

एक बेहतरीन थ्रिलर फिल्म की पहचान आखिर क्या होती है? क्या एक निडर और मजबूत मुख्य किरदार? मां और बेटी के अटूट रिश्ते की संवेदनशील कहानी? या फिर एक हंसता-खेलता, खुशहाल परिवार जो अचानक किसी अनहोनी का शिकार होकर तबाही के मोड़ पर आ खड़ा होता है? देखा जाए तो नेटफ्लिक्स पर हाल ही में रिलीज हुई फिल्म 'गांधारी' इसी पुराने और आजमाए हुए फॉर्मूले पर अपनी नींव रखती है। तापसी पन्नू के दमदार अभिनय से सजी यह फिल्म शुरुआत में दर्शकों का ध्यान खींचने में तो कामयाब होती है और एक बेहतरीन मोड़ पर पहुंचती है, लेकिन जैसे-जैसे कहानी आगे बढ़ती है, यह अपने मुख्य मकसद से भटकती हुई नजर आती है। महाभारत के बेहद मजबूत और प्रभावशाली पौराणिक चरित्र 'गांधारी' के नाम पर रखी गई यह फिल्म क्या वाकई उस नाम और भावना के साथ न्याय कर पाती है? आइए इस फिल्म के हर पहलू का गहराई से रिव्यू करते हैं।

क्या है फिल्म की मूल कहानी?

'गांधारी' की पटकथा एक ऐसी लाचार और पीड़ित मां के इर्द-गिर्द घूमती है, जिसकी छोटी सी बच्ची मिष्टी एक ट्रेन यात्रा के दौरान मानव तस्करी करने वाले गिरोह का शिकार हो जाती है और अचानक गायब हो जाती है। जब यह महिला यानी बानी (तापसी पन्नू) और उसका पति गोकुल (इश्वक सिंह) मदद की गुहार लेकर स्थानीय पुलिस के पास पहुंचते हैं, तो उन्हें एहसास होता है कि जॉयपुरा की पुलिस इस मामले में पूरी तरह से नाकाम और अप्रभावी है। पुलिस की ढिलाई को देखते हुए बानी अपने स्तर पर ही अपनी बच्ची की तलाश में निकलने का साहसी फैसला करती है। हालांकि उसकी इस कठिन यात्रा में एक बहुत बड़ी शारीरिक सीमा और चुनौती आ खड़ी होती है। बेटी को ढूंढने के दौरान हुई एक गंभीर चोट के कारण बानी की आंखों की रोशनी धीरे-धीरे जाने लगती है और वह अस्थायी रूप से अंधी हो जाती है। अपनी बच्ची मिष्टी की तलाश शुरू करते ही बानी के सामने इस बात का कड़वा सच आता है कि उस शहर में मानव तस्करी का यह घिनौना रैकेट कितना गहरा और फैला हुआ है। इसके बाद शुरू होती है एक दृष्टिहीन मां की अपनी बच्ची को वापस पाने और उस इलाके से गायब हुई तमाम अन्य लड़कियों के मामलों से पर्दा उठाने की एक बेहद खतरनाक और आत्मघाती जंग।

कहानी की मुख्य कमजोरी

फिल्म की शुरुआत काफी असरदार और उम्मीद जगाने वाली है। मजबूत स्टार कास्ट और एक गंभीर विषय पर आधारित कहानी को देखकर दर्शक शुरुआत में ही प्रभावित हो जाते हैं। लेकिन अफसोस की बात यह है कि शुरुआती 20 मिनट का समय बीतने के बाद फिल्म अचानक बिखरने लगती है और एक ढीले मोड़ पर आ पहुंचती है। यह कह पाना तो मुश्किल है कि मूल कहानी में ही कोई बुनियादी खराबी थी या नहीं, लेकिन पटकथा के अलग-अलग टुकड़ों को आपस में सही ढंग से जोड़ने में मेकर्स से एक बहुत बड़ी चूक हुई है। उदाहरण के तौर पर जब बानी पुलिस पर भरोसा न करके खुद अपनी बेटी को खोजने का फैसला करती है, तब उसे पता चलता है कि अपनी बच्ची को सुरक्षित वापस पाने के लिए उसके पास सिर्फ डेढ़ महीने का समय बचा है। लेकिन इसके ठीक बाद का दृश्य बिना किसी स्पष्ट जुड़ाव के सीधे एक महीने बाद के घटनाक्रम पर कट हो जाता है। इतने कम समय में लगभग अपनी आंखों की रोशनी गंवा चुकी बानी न केवल उस अनजान शहर के लगभग हर व्यक्ति से दोस्ती कर चुकी होती है, बल्कि एनजीओ में पढ़ाना भी शुरू कर देती है।

हालांकि, काल्पनिक सिनेमा में यह पूरी तरह से असंभव बात नहीं लगती, लेकिन जिस हड़बड़ी में बानी को इस स्थिति तक पहुंचते हुए दिखाया गया है, वह बेहद अप्राकृतिक लगता है। इस तेज रफ्तार के कारण दर्शकों को उस बेबस और दुखी मां के दर्द को गहराई से महसूस करने का जरा भी मौका नहीं मिल पाता। पूरी फिल्म में इस तरह के कई उथले दृश्य बिखरे पड़े हैं। इसके अलावा फिल्म में रहस्य और डर का माहौल बनाने के लिए 'बहुरूपियों' को एक महत्वपूर्ण तत्व के रूप में इस्तेमाल किया गया है, लेकिन पटकथा में ठोस योगदान देने के बजाय वे केवल कुछ पलों के लिए डराने वाले प्रॉप्स बनकर ही रह जाते हैं। 

आम तौर पर माना जाता है कि एक थ्रिलर फिल्म को तेज तर्रार और रोमांचक होना चाहिए। लेकिन 'गांधारी' में यह तेजी इतनी ज्यादा थोपी हुई लगती है कि मेकर्स की हड़बड़ी साफ तौर पर दिखाई देने लगती है। फिल्म निर्माता और एडिटर्स का पूरा ध्यान केवल एक्शन सीन्स को जल्दी-जल्दी निपटाने पर ही लगा हुआ दिखता है। वे दर्शकों को इस मानवीय और भावनात्मक कहानी के साथ जुड़ने या उसे महसूस करने का पर्याप्त समय ही नहीं देते। उदाहरण के लिए, मीता वशिष्ठ के किरदार की एंट्री को ही ले लीजिए। वह अचानक फिल्म में दिखाई देती हैं, बानी अचानक उन पर पूरा भरोसा करके अपना दुखड़ा सुनाने लगती है, और देखते ही देखते उनसे कॉम्बैट व आत्मरक्षण के दांव-पेच सीखने लगती है। इसे देखकर दर्शक यही सोचते रह जाते हैं कि क्या पलक झपकते ही उनसे फिल्म का कोई महत्वपूर्ण हिस्सा छूट गया? पर जल्द ही समझ आ जाता है कि असली समस्या फिल्म की लचर पटकथा में ही छिपी है।

कलाकारों का प्रदर्शन

'गांधारी' में हिंदी सिनेमा के कई नामचीन और प्रतिभाशाली कलाकारों की लंबी कतार मौजूद है। इसके बावजूद, लगभग हर एक किरदार को बेहद कमजोर तरीके से लिखा गया है और उनका सही इस्तेमाल नहीं किया गया है। अपनी विविधतापूर्ण अभिनय शैली के लिए पहचानी जाने वाली तापसी पन्नू ने बानी के किरदार में जान फूंकने की पूरी कोशिश की है। वे इस भूमिका को अपना बनाने का प्रयास करती हैं, लेकिन कमजोर और लचर पटकथा उनके सारे प्रयासों पर पानी फेर देती है। कुछ सीन पूरी तरह से अर्थहीन लगते हैं, तो कुछ जरूरत से ज्यादा लाउड हो जाते हैं। फिल्म में 'अंधाधुंध' जैसा एक पल भी आता है,जिसका स्पॉइलर हम नहीं देंगे, लेकिन हमने तापसी को इससे कहीं बेहतर अभिनय करते देखा है। इसके बावजूद भावनात्मक दृश्यों में उनके अभिनय की तारीफ करनी होगी। जब वे रोती हैं और अपने पति से अपनी खोई हुई बच्ची को वापस लाने के लिए गिड़गिड़ाती हैं तो उनका दर्द सीधा दर्शकों के दिल को छूता है। एक्शन सीन्स को भी उन्होंने काफी बखूबी अंजाम दिया है। तापसी का प्रदर्शन ही वह मुख्य वजह है जिसके लिए इस फिल्म को एक बार देखा जा सकता है।

बानी के पति और बच्ची के पिता गोकुल की भूमिका में इश्वक सिंह बेहद स्वाभाविक और विश्वसनीय लगे हैं। वे इस फिल्म के कुछ गिने-चुने सकारात्मक पहलुओं में से एक हैं। हालांकि उनके किरदार को निखरने के लिए स्क्रीन पर पर्याप्त सामग्री नहीं दी गई है। इसके बावजूद, इश्वक ने मिले हुए सीमित रोल में भी अपना सर्वश्रेष्ठ देने की पूरी ईमानदारी से कोशिश की है।

मीता वशिष्ठ, स्वास्तिका मुखर्जी, जतिन सरना, प्रशांत नारायणन और चंदन रॉय जैसे बड़े और स्थापित नाम इस फिल्म का हिस्सा हैं। वास्तव में इतनी मजबूत स्टार कास्ट ही वह सबसे बड़ा कारण है जिसकी वजह से लोग इस फिल्म को देखने की ओर आकर्षित होंगे। लेकिन दुख की बात यह है कि लगभग हर सह-कलाकार का किरदार कमजोर है। जब छाया कदम का किरदार स्क्रीन पर आता है, तो दर्शकों को उम्मीद जागती है कि शायद अब फिल्म को कोई सही दिशा मिलेगी। लेकिन यह विश्वास करना मुश्किल हो जाता है कि यह वही राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता अभिनेत्री हैं जिन्होंने 'ऑल वी इमेजिन एज लाइट' और 'लापता लेडीज' जैसी बेहतरीन फिल्मों में अपनी अदाकारी से देश का नाम रोशन किया था।

विशेष रूप से प्रशांत नारायणन की बात करें, जिन्होंने फिल्म 'मर्डर 2' में धीरज पांडे के खौफनाक किरदार से दर्शकों की रूह कंपा दी थी, वे इस फिल्म में मुख्य विलेन की भूमिका में हैं। लेकिन उन्हें देखकर जरा भी डर या विलेन का अहसास नहीं होता। उन्हें केवल नाममात्र के लिए स्क्रीन पर दिखाया गया है और उनके किरदार का अंत जिस तरह से किया गया है, वह बेहद निराशाजनक है। प्रशांत जैसे क्षमतावान अभिनेता के साथ 'गांधारी' की टीम ने आधा भी न्याय नहीं किया है।

निर्देशन और लेखन का स्तर

इस फिल्म की पटकथा और निर्माण की जिम्मेदारी कनिका ढिल्लों ने संभाली है, जबकि निर्देशन का जिम्मा देवाशीष मखीजा के हाथों में था। यही वह सबसे मुख्य विभाग है जहां 'गांधारी' पूरी तरह से धराशायी हो जाती है। कागजों पर इस फिल्म की कहानी में एक जबरदस्त थ्रिलर बनने के सारे गुण मौजूद थे, मानव तस्करी जैसा संवेदनशील और गंभीर मुद्दा, गायब होती मासूम लड़कियां, अपनी बच्ची के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार एक लाचार मां और अपनी शारीरिक कमजोरी से लड़ते हुए एक बहुत बड़े आपराधिक सिंडिकेट से टकराती एक निहत्थी औरत। इन सभी तत्वों के साथ एक बेहद रोंगटे खड़े कर देने वाली थ्रिलर फिल्म बनाई जा सकती थी। लेकिन कनिका ढिल्लों के लेखन ने इन तत्वों को उभरने का मौका ही नहीं दिया।

फिल्म का स्क्रीनप्ले बिना किसी संदर्भ या ठोस पृष्ठभूमि के एक घटना से दूसरी घटना पर छलांग लगाता रहता है। किरदार बिना किसी तार्किक वजह के आते हैं, गायब हो जाते हैं और फिर वापस लौट आते हैं। भावनात्मक मोड़ों को फिल्म में शामिल तो किया गया है, लेकिन उन्हें दर्शकों पर असर छोड़ने का समय ही नहीं दिया गया। दूसरी ओर निर्देशक देवाशीष मखीजा ने फिल्म में एक डार्क और सीरियस माहौल बनाए रखने की पूरी कोशिश की है। उनकी नीयत साफ झलकती है और एक्शन दृश्यों को भी एक खास तीव्रता के साथ फिल्माया गया है। लेकिन निर्देशक की यह मेहनत भी स्क्रीनप्ले की सबसे बड़ी खामी को छिपा नहीं पाती, फिल्म हर अगले सीन पर पहुंचने के लिए लगातार बहुत ज्यादा जल्दबाजी में दिखाई देती है। नतीजा यह निकलता है कि फिल्म दर्शकों को यह तो बता देती है कि स्क्रीन पर क्या घट रहा है, लेकिन उस रोमांच या दर्द को महसूस कराने में पूरी तरह से नाकाम रहती है।

फिल्म के मजबूत पहलू

'गांधारी' की सबसे बड़ी ताकत इसकी मूल कहानी है। अपनी किडनैप हुई बेटी की तलाश करती मां की कहानी अपने आप में ही बेहद भावुक करने वाली होती है। उसमें मानव तस्करी का एंगल और मुख्य किरदार की आंखों की रोशनी चले जाने की मजबूरी को जोड़ना इसे एक बेहतरीन सस्पेंस थ्रिलर बनाने के लिए काफी था। प्रतिभाशाली कलाकारों की मौजूदगी फिल्म का दूसरा बड़ा प्लस पॉइंट है। तापसी पन्नू और इश्वक सिंह ने अपने किरदारों को पूरी ईमानदारी के साथ निभाया है। फिल्म के कुछ एक्शन सीक्वेंस अच्छे बन पड़े हैं। शुरुआती हिस्से में फिल्म एक डार्क और रहस्यमयी माहौल बनाने में भी काफी हद तक सफल रहती है। तमाम खामियों के बावजूद तापसी पन्नू के इमोशनल सीन्स दर्शकों पर असर डालते हैं। एक मां के रूप में उनकी छटपटाहट और बेबसी फिल्म का सबसे वास्तविक और असरदार हिस्सा है।

फिल्म के कमजोर पहलू

फिल्म की सबसे बड़ी कमजोरी इसका बेहद ढीला और लचर स्क्रीनप्ले है। कहानी इतनी तेजी से आगे भागती है कि महत्वपूर्ण घटनाक्रम बिल्कुल बनावटी और बिना किसी वजह के लगने लगते हैं। मानव तस्करी जैसा सामाजिक और गंभीर विषय एक शक्तिशाली सोशल थ्रिलर बन सकता था, लेकिन फिल्म में इसे केवल कहानी को आगे बढ़ाने के एक टूल की तरह इस्तेमाल करके छोड़ दिया गया। इतने बेहतरीन और अनुभवी कलाकारों की मौजूदगी के बावजूद किसी भी सह-कलाकार को याद रखने लायक रोल नहीं दिया गया। ऐसा लगता है कि सभी अभिनेताओं को आधे-अधूरे लिखे गए किरदार थमा दिए गए थे। सबसे बड़ी निराशा यही है कि 'गांधारी' में एक ब्लॉकबस्टर थ्रिलर बनने की सभी सामग्रियां मौजूद थीं, सक्षम कलाकार, बेहतरीन विषय, सीरियस माहौल और कुछ बेहद भावुक करने वाले पल। लेकिन इन सभी टुकड़ों को एक साथ सही ढंग से पिरोया नहीं जा सका।

फाइनल वर्डिक्ट

'गांधारी' एक बेहद वादे और उम्मीद से भरे प्लॉट के साथ शुरू होती है, लेकिन बहुत जल्दी ही अपनी पकड़ खो देती है। यह फिल्म एक साथ दो नावों पर सवार होना चाहती है, एक तरफ यह मां-बेटी के रिश्ते की भावुक कहानी बनना चाहती है तो दूसरी तरफ एक डार्क और रॉ थ्रिलर। दुर्भाग्य से कमजोर निष्पादन के कारण यह दोनों में से किसी भी पैमाने पर पूरी तरह खरी नहीं उतर पाती। तापसी पन्नू ने अपनी भूमिका में पूरी जान लगा दी है, इश्वक सिंह भी निष्ठावान लगे हैं और बाकी सह-कलाकारों में भी प्रतिभा की कोई कमी नहीं है। लेकिन यह बेहतरीन अभिनय भी उस स्क्रिप्ट को डूबने से नहीं बचा पाता जो खुद अपनी ही कहानी को बयां करने में बहुत ज्यादा जल्दबाजी और हड़बड़ी दिखाती है। सबसे बड़ा विरोधाभास यह है कि 'गांधारी' एक ऐसी थ्रिलर फिल्म है जो अपने ही दर्शकों को थ्रिल का अहसास कराने के लिए बिल्कुल भी समय नहीं देती। फिल्म में कुछ ऐसे पल जरूर आते हैं जहां आप मुख्य किरदार बानी का समर्थन करना चाहते हैं और लगता है कि फिल्म अब सही पटरी पर आ रही है, लेकिन जैसे ही आप कहानी में ढलना शुरू करते हैं, फिल्म आपको पीछे छोड़कर फिर से आगे भाग निकलती है।

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