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Udta Teer Review: जब पाकिस्तानी एजेंट को खुद पर हो गया भारतीय होने का भरोसा, आयुष्मान खुराना की फिल्म में हैं मजेदार ट्विस्ट

 Written By: Jaya Dwivedie
 Published : Oct 23, 2026 10:45 am IST,  Updated : Oct 23, 2026 12:19 pm IST

‘उड़ता तीर’ आयुष्मान खुराना की कॉमिक टाइमिंग, राहुल बोस की दमदार अदाकारी और दिलचस्प जासूसी कहानी के जरिए मनोरंजन करती है। फिल्म हंसी और रोमांच का अच्छा मिश्रण पेश करती है।

udta teer
आयुष्मान खुराना। Photo: DHARMA PRODUCTIONS YOUTUBE
  • फिल्म रिव्यू: उड़ता तीर
  • स्टार रेटिंग 3/5
  • पर्दे पर: 23/10/2026
  • डायरेक्टर: आकाश ए कौशिक
  • शैली: देशभक्ति कॉमेडी

बॉलीवुड में जासूसी और देशभक्ति की कहानियां अक्सर गंभीर अंदाज में पेश की जाती हैं, लेकिन अगर इसी दुनिया में गलत पहचान, मजेदार गलतफहमियों और हल्के-फुल्के हास्य का तड़का लगा दिया जाए, तो मनोरंजन का एक अलग ही अंदाज देखने को मिल सकता है। आयुष्मान खुराना की फिल्म 'उड़ता तीर' इसी कोशिश के साथ दर्शकों के सामने आई है। फिल्म जासूसी की दुनिया को कॉमेडी के नजरिए से देखती है, जहां किरदारों की पहचान और उनकी वफादारी कहानी को दिलचस्प बनाती है। आकाश ए कौशिक के निर्देशन में बनी यह फिल्म कई मौकों पर हंसाती है और अपने कलाकारों के दम पर दर्शकों को बांधे रखने की कोशिश करती है। आयुष्मान की कॉमिक टाइमिंग, राहुल बोस का अनोखा अंदाज और सुहैल नैय्यर के साथ उनकी केमिस्ट्री फिल्म को मनोरंजक बनाते हैं। हालांकि कहानी की रफ्तार में कुछ उतार-चढ़ाव हैं, लेकिन हल्की-फुल्की कॉमेडी और जासूसी के मेल की तलाश करने वालों को फिल्म में पसंद आने वाले कई पल मिलते हैं।

कहानी और प्लॉट

'उड़ता तीर' की कहानी पाकिस्तान से शुरू होती है, जहां आतंकवादी अजहर मकसूद (मुकुल देव) ऑपरेशन सिंदूर के बाद बदला लेने की धमकी देता है। खुफिया एजेंसियों को जानकारी मिलती है कि वह भारत में दाखिल हो चुका है। इसी बीच कश्मीर के बारामूला में भारतीय काउंटर टेररिज्म स्क्वॉड (CTS) के अधिकारी विक्रांत थापर (आयुष्मान खुराना) की एंट्री होती है। उसका काम आतंकवादी गतिविधियों का पता लगाना और देश की सुरक्षा से जुड़े एक अहम मिशन को अंजाम देना है। लेकिन कहानी में एक ऐसा मोड़ आता है, जो पूरे घटनाक्रम को कॉमेडी और कन्फ्यूजन में बदल देता है। विक्रांत की असली पहचान बिलाल है, जो पाकिस्तान का एजेंट बनकर भारत में काम कर रहा है। एक दुर्घटना के बाद उसकी याददाश्त चली जाती है और वह खुद को भारतीय अधिकारी समझने लगता है। इसके बाद वह पूरी ईमानदारी से देश की सुरक्षा के लिए काम करने लगता है, जबकि उसे अपनी वास्तविक पहचान और पुराने मिशन के बारे में कुछ याद नहीं रहता। यही विरोधाभास फिल्म की सबसे दिलचस्प बात है। एक ऐसा शख्स, जो कभी अपने देश के लिए गुप्त मिशन पर निकला था, अब दूसरे देश की सुरक्षा को अपना कर्तव्य मान बैठता है। उसके फैसले और आसपास के लोगों की प्रतिक्रियाएं कई मजेदार परिस्थितियां पैदा करती हैं।

बिलाल की इस उलझन में उसका साथी अशफाक (सुहैल नैय्यर) भी फंस जाता है। वह जानता है कि विक्रांत की असली पहचान क्या है और उसे उसकी पुरानी जिंदगी याद दिलाने की कोशिश करता है, लेकिन विक्रांत का बदला हुआ व्यवहार हर बार हालात को और पेचीदा बना देता है। दूसरी तरफ, CTS प्रमुख वर्मन (राहुल बोस) अपनी टीम में मौजूद गद्दार का पता लगाने में जुटे हैं। ऐसे में पहचान का संकट, खुफिया मिशन और एक-दूसरे पर भरोसा करने की चुनौती कहानी को आगे बढ़ाती है। विक्रांत की निजी जिंदगी भी कम उलझी हुई नहीं है। उसकी पत्नी यामिनी (सारा अली खान) रक्षा मंत्रालय में काम करती है और दोनों के रिश्ते में तनाव है। यह कहानी में एक निजी पहलू जोड़ता है, हालांकि फिल्म का मुख्य जोर जासूसी और कॉमेडी पर ही रहता है। कुल मिलाकर, फिल्म का आधार दिलचस्प है और गलत पहचान से पैदा होने वाली परिस्थितियां इसे एक सामान्य स्पाई थ्रिलर से अलग बनाती हैं।

कॉमेडी और संवाद

'उड़ता तीर' की सबसे बड़ी खूबी इसका सिचुएशनल ह्यूमर है। फिल्म केवल पंचलाइन के सहारे हंसाने की कोशिश नहीं करती, बल्कि किरदारों की परिस्थितियों से कॉमेडी पैदा करती है। विक्रांत जब अपनी नई पहचान के हिसाब से फैसले लेता है, तो उसे अपना व्यवहार बिल्कुल सही लगता है, लेकिन उसके आसपास के लोग उसकी हरकतों से हैरान रह जाते हैं। दर्शकों को कहानी की असलियत का अंदाजा होने के कारण इन दृश्यों में एक अलग तरह का हास्य पैदा होता है। फिल्म में सनी देओल की फिल्मों का संदर्भ भी खूब मनोरंजन करता है। जब अशफाक कहता है, 'सनी देओल बना बैठा है, तू तारा सिंह नहीं अशरफ अली है', तो यह संवाद किरदार की उलझन को मजेदार अंदाज में सामने लाता है। यह केवल एक फिल्मी संदर्भ नहीं, बल्कि कहानी में चल रहे पहचान के खेल को भी मजबूत करता है। इसी तरह 'भूल गया सब कुछ' जैसे पुराने गीत का सही मौके पर इस्तेमाल भी हास्य का असर बढ़ाता है।

फिल्म के कई दृश्यों में कॉमेडी स्वाभाविक लगती है, क्योंकि किरदार अपनी परिस्थितियों को गंभीरता से लेते हैं, जबकि दर्शकों को उनके व्यवहार में छिपा विरोधाभास दिखाई देता है। यही अंतर फिल्म को मनोरंजक बनाता है। जासूसी और राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे विषय को हल्के अंदाज में पेश करने के बावजूद फिल्म हर जगह गंभीरता को पूरी तरह नजरअंदाज नहीं करती। यह संतुलन इसकी अच्छी बातों में शामिल है।

अभिनय

आयुष्मान खुराना ऐसे किरदारों के लिए जाने जाते हैं, जिनमें आम जिंदगी की परेशानियों के साथ कोई असामान्य परिस्थिति जुड़ जाती है। 'उड़ता तीर' में भी वह अपनी सहज अदाकारी से कहानी को संभालते हैं। बिलाल और विक्रांत की पहचान के बीच का अंतर उनके किरदार को दिलचस्प बनाता है। आयुष्मान उन दृश्यों में खास तौर पर प्रभावी हैं, जहां उन्हें लगता है कि वह बिल्कुल सही कर रहे हैं, लेकिन दूसरे किरदार उनकी हरकतों को समझ नहीं पाते। उनकी कॉमिक टाइमिंग और चेहरे के हावभाव कहानी के हास्य को बेहतर बनाते हैं।

राहुल बोस फिल्म के सबसे बड़े आकर्षणों में शामिल हैं। वर्मन के किरदार में वह गंभीर अधिकारी की छवि के साथ कॉमेडी का अनोखा मेल पेश करते हैं। उनकी खासियत यह है कि वह हर दृश्य में बड़े संवादों या जरूरत से ज्यादा हावभाव का सहारा नहीं लेते। कई बार उनकी आंखों और चेहरे के छोटे-छोटे बदलाव ही हंसी पैदा करने के लिए काफी होते हैं। अस्पताल से जुड़े उनके दृश्य फिल्म के मजेदार पलों में शामिल हैं। राहुल बोस का अभिनय फिल्म को अतिरिक्त ऊर्जा देता है और उनकी मौजूदगी कहानी को और मनोरंजक बनाती है।

सुहैल नैय्यर अशफाक के रूप में आयुष्मान का अच्छा साथ देते हैं। उनका किरदार कहानी में कॉमेडी को आगे बढ़ाने के साथ कई घटनाओं को जोड़ने का काम भी करता है। आयुष्मान के साथ उनकी केमिस्ट्री सहज है और दोनों के बीच होने वाली बातचीत कई दृश्यों में हंसी का कारण बनती है। मुकुल देव अजहर मकसूद के रूप में अपनी छाप छोड़ते हैं। उनके किरदार का परिचय, जिसमें पाकिस्तानी डेटिंग ऐप हिंडर का जिक्र आता है, फिल्म के अप्रत्याशित हास्य का अच्छा उदाहरण है। दिवंगत अभिनेता का प्रदर्शन भी याद रह जाता है।

सारा अली खान यामिनी की भूमिका में ठीक लगती हैं। उनके किरदार को सीमित स्क्रीन टाइम मिला है, लेकिन वह कहानी के निजी पहलू को सामने लाने में मदद करती हैं। राम कपूर, बृजेंद्र काला, गुलशन ग्रोवर, रघुबीर यादव और स्मिता तांबे जैसे कलाकार भी अपनी-अपनी भूमिकाओं से फिल्म को सहारा देते हैं। सहायक कलाकारों की मौजूदगी कहानी को विविधता देती है और कॉमेडी को केवल मुख्य किरदार तक सीमित नहीं रहने देती।

निर्देशन और तकनीकी पक्ष

लेखक-निर्देशक आकाश ए कौशिक की सबसे बड़ी उपलब्धि फिल्म का विचार है। जासूसी की गंभीर दुनिया में पहचान का संकट और देशभक्ति से जुड़ी गलतफहमियां कॉमेडी के लिए अच्छा आधार तैयार करती हैं। निर्देशक कई दृश्यों में इस विचार का अच्छा इस्तेमाल करते हैं। फिल्म में राष्ट्रवाद को लंबे भाषणों के जरिए समझाने के बजाय किरदारों के व्यवहार और उनके फैसलों से हास्य पैदा करने की कोशिश की गई है। इस वजह से इसका अंदाज हल्का-फुल्का बना रहता है। कहानी की शुरुआत में किरदारों और उनके मिशन को स्थापित करने में थोड़ा समय लगता है, लेकिन जैसे-जैसे बिलाल की पहचान से जुड़े राज सामने आते हैं, घटनाएं ज्यादा दिलचस्प होने लगती हैं। दूसरे हिस्से में कुछ जगह रफ्तार धीमी जरूर पड़ती है, लेकिन नए खुलासे और हास्यपूर्ण परिस्थितियां फिल्म को फिर से गति देते हैं। पटकथा में थोड़ी और कसावट होती तो इसका प्रभाव और बढ़ सकता था, लेकिन कहानी का मूल विचार दर्शकों की दिलचस्पी बनाए रखने में मदद करता है।

तकनीकी पक्ष की बात करें तो सिनेमैटोग्राफी और प्रोडक्शन डिजाइन कहानी की जरूरतों के अनुरूप हैं। फिल्म का दृश्य संसार जासूसी वाले माहौल को स्थापित करता है, जबकि बैकग्राउंड स्कोर कई दृश्यों में सस्पेंस और कॉमेडी के बीच बदलाव को प्रभावी बनाता है। गाने औसत हैं, लेकिन पुराने गीतों के संदर्भ और फिल्म के भीतर उनका इस्तेमाल कुछ जगह अच्छा प्रभाव छोड़ते हैं। एक्शन भी कहानी में विविधता लाता है। फिल्म का सबसे मजबूत पक्ष हालांकि तकनीकी चकाचौंध नहीं, बल्कि कलाकारों का प्रदर्शन और परिस्थितियों से पैदा होने वाला हास्य है।

क्या थोड़ा और बेहतर हो सकता था?

'उड़ता तीर' की कहानी में मनोरंजन की अच्छी संभावनाएं हैं, लेकिन कुछ हिस्सों को और बेहतर बनाया जा सकता था। शुरुआती भाग में कहानी को स्थापित करने में लगने वाला समय थोड़ा कम होता, तो फिल्म जल्दी अपनी लय पकड़ सकती थी। कुछ जगह जासूसी और कॉमेडी के बीच संतुलन भी बेहतर हो सकता था, ताकि हास्य के साथ सस्पेंस का असर बना रहे। विक्रांत और यामिनी के रिश्ते को थोड़ा और विस्तार दिया जाता, तो मुख्य किरदार का निजी पक्ष भी अधिक प्रभावशाली बन सकता था। कुछ सहायक किरदारों को भी कहानी में ज्यादा मौके मिल सकते थे। इसके बावजूद, ये कमियां फिल्म के मनोरंजक दृश्यों और कलाकारों के प्रदर्शन पर पूरी तरह हावी नहीं होतीं। फिल्म अपने मूल विचार के सहारे दर्शकों को हंसाने और कहानी में दिलचस्पी बनाए रखने में काफी हद तक सफल रहती है।

वर्डिक्ट

'उड़ता तीर' उन फिल्मों में शामिल है, जो गंभीर विषय को हल्के-फुल्के अंदाज में पेश करने की कोशिश करती हैं। आयुष्मान खुराना की सहज कॉमिक टाइमिंग, राहुल बोस की शानदार अदाकारी और सुहैल नैय्यर के साथ उनकी केमिस्ट्री फिल्म को मनोरंजक बनाती है। पहचान का संकट, बॉलीवुड संदर्भ और गलतफहमियों से पैदा होने वाली कॉमेडी इसके मजबूत पक्ष हैं। कहानी की रफ्तार में कुछ उतार-चढ़ाव जरूर हैं, लेकिन फिल्म का मूल विचार और कलाकारों का काम इन कमियों को काफी हद तक संभाल लेता है। हल्की-फुल्की कॉमेडी और जासूसी का मेल पसंद करने वाले दर्शकों के लिए यह एक बार देखने लायक फिल्म है।

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