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मार्क्स कम आए तो शर्मिंदगी नहीं, बच्चों की मानसिक सेहत का ख्याल रखेंगे स्कूल, जानिए क्या हैं गुजरात सरकार के नए नियम

 Written By: Malaika Imam
 Published : Nov 02, 2026 02:25 pm IST,  Updated : Nov 02, 2026 02:29 pm IST

गुजरात के स्कूलों में अब बच्चों के नंबरों के साथ उनकी मानसिक सेहत पर भी ध्यान देना होगा। सरकार ने कक्षा 9 से 12 तक के विद्यार्थियों के लिए नए नियम बनाए हैं।

स्कूलों के लिए गुजरात सरकार ने लागू किए नए नियम।- India TV Hindi
स्कूलों के लिए गुजरात सरकार ने लागू किए नए नियम। Image Source : INDIA TV

गुजरात सरकार ने स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों की मानसिक सेहत को लेकर बड़ा फैसला लिया है। अब राज्य के माध्यमिक और उच्च माध्यमिक स्कूलों में पढ़ने वाले विद्यार्थियों की मानसिक परेशानी को नजरअंदाज नहीं किया जा सकेगा। सरकार ने नए नियम बनाकर स्कूलों में काउंसलर की व्यवस्था, वेलनेस टीम का गठन और शिक्षकों की ट्रेनिंग अनिवार्य कर दी है। ये नियम कक्षा 9 से 12 तक के विद्यार्थियों पर लागू होंगे। इसके तहत 100 या उससे ज्यादा विद्यार्थी वाले स्कूलों में कम से कम एक काउंसलर रखना जरूरी होगा। वहीं, परीक्षा में कम नंबर आने पर किसी बच्चे को दूसरे विद्यार्थियों से अलग नहीं किया जा सकेगा और न ही सबके सामने उसका मजाक उड़ाया जा सकेगा।

सरकार का मानना है कि पढ़ाई, परीक्षा, अच्छे नंबर लाने का दबाव, परिवार की उम्मीदें और भविष्य की चिंता बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य पर असर डालती हैं। ऐसे में स्कूलों की जिम्मेदारी सिर्फ पढ़ाई कराने तक सीमित नहीं होनी चाहिए। उन्हें बच्चों की मानसिक स्थिति का भी ध्यान रखना होगा। ऐसे में आइए समझते हैं कि सरकार ने कौन-कौन से नियम बनाए हैं-

किन स्कूलों पर लागू होंगे नए नियम?

गुजरात सरकार ने गुजरात सेकेंडरी एंड हायर सेकेंडरी एजुकेशन रेगुलेशंस, 1974 में नए प्रावधान किए हैं। ये नियम गुजरात माध्यमिक एवं उच्च माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (GSHSEB) से जुड़े स्कूलों में लागू होंगे।

  • कक्षा 9 से 12 तक के विद्यार्थियों को इन नियमों के दायरे में रखा गया है।
  • हर स्कूल में एक वेलनेस टीम बनानी होगी।
  • बच्चों की परेशानी सुनने और उन्हें सलाह देने के लिए काउंसलर की व्यवस्था करनी होगी।
  • शिक्षकों और दूसरे कर्मचारियों को मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी ट्रेनिंग दी जाएगी।
  • आत्महत्या के खतरे या खुद को नुकसान पहुंचाने की आशंका होने पर तुरंत मदद देनी होगी।

हर स्कूल में बनेगी वेलनेस टीम, क्या होगा इसका काम?

नए नियमों के अनुसार, हर स्कूल को नए शैक्षणिक सत्र की शुरुआत में स्कूल वेलनेस टीम बनानी होगी। इस टीम के काम की हर साल समीक्षा भी की जाएगी। इस टीम में स्कूल के प्रिंसिपल, एक काउंसलर या जिम्मेदारी दिए गए शिक्षक, माध्यमिक और उच्च माध्यमिक विभाग के एक-एक शिक्षक, स्कूल मैनेजमेंट कमेटी का एक सदस्य, एक गैर-शिक्षण कर्मचारी और दो विद्यार्थी शामिल होंगे।

इस टीम का मुख्य काम बच्चों के व्यवहार और मानसिक स्थिति पर ध्यान देना होगा। अगर कोई बच्चा लगातार उदास रहता है, अकेला रहने लगा है, पढ़ाई को लेकर बहुत परेशान है या उसके व्यवहार में अचानक बदलाव आता है, तो टीम उसकी परेशानी समझने की कोशिश करेगी। जरूरत पड़ने पर बच्चे को काउंसलर या मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ की मदद दिलाई जाएगी।

100 से ज्यादा बच्चे हैं तो काउंसलर रखना जरूरी

सरकार ने स्कूलों में काउंसलर की व्यवस्था को विद्यार्थियों की संख्या से जोड़ा है।

  • 100 या उससे ज्यादा विद्यार्थी- ऐसे स्कूलों में कम से कम एक योग्य काउंसलर, मनोवैज्ञानिक या सोशल वर्कर रखना जरूरी होगा। उसे बच्चों और किशोरों की मानसिक सेहत से जुड़ी ट्रेनिंग मिली होनी चाहिए।
  • 100 से कम विद्यार्थी- ऐसे स्कूलों को बाहर के मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों से संपर्क की व्यवस्था करनी होगी। जरूरत पड़ने पर नजदीकी सरकारी स्वास्थ्य केंद्र से भी मदद ली जा सकेगी।

इसके अलावा स्कूल जिला मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम और टेली-मानस सेवा की मदद भी ले सकेंगे।

क्या है मनो-मित्र पहल?

बच्चे कई बार अपनी परेशानी माता-पिता या शिक्षकों को बताने में झिझकते हैं। ऐसे में वे अपने दोस्तों से बात करना ज्यादा आसान समझते हैं। इसी बात को ध्यान में रखते हुए सरकार ने मनो-मित्र (Mano-Mitra) पहल शुरू की है। इसके तहत हर स्कूल की वेलनेस टीम में दो विद्यार्थियों को शामिल किया जाएगा। ये विद्यार्थी अपने साथियों की बातें सुनेंगे और उन्हें शुरुआती भावनात्मक मदद देंगे। अगर किसी बच्चे को ज्यादा परेशानी है, तो मनो-मित्र उसे स्कूल के काउंसलर या दूसरे विशेषज्ञ से बात करने के लिए प्रोत्साहित करेंगे। हालांकि, मनो-मित्र का काम सिर्फ शुरुआती मदद देना होगा। वे पेशेवर काउंसलर की जगह नहीं लेंगे।

परीक्षा और रिजल्ट के समय मिलेगी ज्यादा मदद

बोर्ड परीक्षा के समय कई बच्चों पर अच्छे नंबर लाने का दबाव रहता है। रिजल्ट आने पर कम अंक मिलने का डर भी उन्हें परेशान कर सकता है। सरकार ने ऐसे समय को ध्यान में रखते हुए स्कूलों को अतिरिक्त काउंसलिंग और मार्गदर्शन की व्यवस्था करने को कहा है।

खास तौर पर इन मौकों पर बच्चों को ज्यादा मदद दी जाएगी:-

  • बोर्ड परीक्षा के दौरान।
  • परीक्षा का रिजल्ट आने के समय।
  • कक्षा 8 से 9 में जाने पर।
  • कक्षा 10 से 11 में प्रवेश के दौरान।

कम नंबर आने पर बच्चों को अलग नहीं बैठा सकेंगे स्कूल

नए नियमों में स्कूलों को साफ निर्देश दिया गया है कि वे परीक्षा के नंबरों के आधार पर बच्चों को अलग-अलग समूहों में नहीं बांट सकेंगे। किसी बच्चे के कम नंबर आने पर पूरी क्लास के सामने उसे डांटना, उसका मजाक उड़ाना या दूसरे बच्चों से उसकी तुलना करना भी प्रतिबंधित होगा। स्कूलों को यह ध्यान रखना होगा कि हर बच्चे के साथ सम्मान से व्यवहार किया जाए। किसी विद्यार्थी को सिर्फ इसलिए कमतर नहीं समझा जा सकता, क्योंकि उसके नंबर दूसरे बच्चों से कम हैं। सरकार चाहती है कि स्कूलों में ऐसा माहौल बने, जहां बच्चे बिना डर के पढ़ सकें और अपनी कमजोरियों को सुधार सकें।

पढ़ाई के साथ योग, खेल और संगीत पर भी ध्यान

बच्चों को तनाव से दूर रखने के लिए स्कूलों में दूसरी गतिविधियों को भी बढ़ावा दिया जाएगा। इसके तहत स्कूलों को योग, ध्यान, खेलकूद, संगीत, नृत्य, पेंटिंग और बागवानी जैसी गतिविधियां कराने के लिए प्रोत्साहित किया गया है। इन गतिविधियों से बच्चों को पढ़ाई के अलावा अपनी रुचि के काम करने का मौका मिलेगा। इससे उनका मन भी बेहतर रहेगा और वे अपनी प्रतिभा को पहचान सकेंगे। इसके साथ ही, स्कूलों में शिकायत और सुझाव देने के लिए बॉक्स लगाए जाएंगे। चाइल्ड हेल्पलाइन नंबर और वेलनेस टीम के संपर्क नंबर भी ऐसी जगह लगाए जाएंगे, जहां बच्चे आसानी से उन्हें देख सकें।

शिक्षकों को साल में दो बार मिलेगी ट्रेनिंग

बच्चों की मानसिक परेशानी को पहचानने की जिम्मेदारी सिर्फ काउंसलर की नहीं होगी। स्कूल के सभी शिक्षक और गैर-शिक्षण कर्मचारियों को भी इसके लिए तैयार किया जाएगा। नए नियमों के अनुसार सभी कर्मचारियों को साल में कम से कम दो बार मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों से ट्रेनिंग लेनी होगी। इसमें उन्हें बताया जाएगा कि बच्चों में तनाव के लक्षण कैसे पहचानें, आत्महत्या से जुड़े खतरे को कैसे समझें और किसी बच्चे के मानसिक संकट में होने पर क्या करना चाहिए। अगर कोई बच्चा खुद को नुकसान पहुंचाने की कोशिश करता है या आत्महत्या जैसा कदम उठाता है, तो उसे किसी भी हालत में अकेला नहीं छोड़ा जाएगा। स्कूल को तुरंत मेडिकल या इमरजेंसी सहायता उपलब्ध करानी होगी।

बच्चों की निजी बातें रहेंगी गोपनीय

कई बार बच्चे इस डर से काउंसलर को अपनी परेशानी नहीं बताते कि उनकी निजी बातें दूसरे लोगों को पता चल जाएंगी। सरकार ने इस बात का भी ध्यान रखा है। नए नियमों के तहत बच्चों की काउंसलिंग और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी जानकारी गोपनीय रखनी होगी। बच्चे की निजी जानकारी या काउंसलिंग के रिकॉर्ड किसी अनधिकृत व्यक्ति के साथ साझा नहीं किए जा सकेंगे। जानकारी सिर्फ उन्हीं लोगों को दी जा सकेगी, जिन्हें बच्चे की सुरक्षा, इलाज या देखभाल के लिए इसकी जरूरत है।

लापरवाही करने पर स्कूल की भी तय होगी जिम्मेदारी

स्कूलों में बच्चों को परेशान करने, मारपीट, बुलिंग, साइबर बुलिंग, रैगिंग, यौन उत्पीड़न और भेदभाव से जुड़ी शिकायतों के लिए गोपनीय व्यवस्था बनानी होगी।

जाति, धर्म, भाषा, लिंग, आर्थिक स्थिति या दिव्यांगता के आधार पर किसी बच्चे के साथ भेदभाव होने पर भी कार्रवाई करनी होगी।

अगर स्कूल को किसी बच्चे के खतरे या गंभीर परेशानी की जानकारी होने के बावजूद समय पर कदम नहीं उठाया जाता और उसकी लापरवाही से गंभीर नुकसान होता है, तो स्कूल की जवाबदेही तय हो सकती है। ऐसे मामलों में लागू कानूनों के तहत कानूनी या अनुशासनात्मक कार्रवाई भी की जा सकती है।

जिला कलेक्टर करेंगे स्कूलों के काम की निगरानी

नए नियमों को सही तरीके से लागू कराने के लिए जिला स्तर पर एक निगरानी समिति बनाई जाएगी। इस समिति की अध्यक्षता जिला कलेक्टर करेंगे। समिति स्कूलों में नियमों के पालन की जांच करेगी। गंभीर घटनाओं और शिकायतों की समीक्षा करेगी और जरूरत पड़ने पर स्कूलों को सुधार के निर्देश देगी।

स्कूलों को बच्चों के लिए करियर गाइडेंस की व्यवस्था भी करनी होगी। इसमें उच्च शिक्षा के अलावा कौशल विकास, व्यावसायिक शिक्षा और अपना कारोबार शुरू करने जैसे विकल्पों की जानकारी दी जाएगी।

आखिर क्यों जरूरी है यह फैसला?

आज बच्चों पर पढ़ाई में अच्छे नंबर लाने, प्रतियोगिता में आगे रहने और भविष्य बनाने का दबाव लगातार बढ़ रहा है। कई बार इसी दबाव के कारण बच्चे तनाव और अकेलेपन का सामना करते हैं, लेकिन अपनी परेशानी किसी को बता नहीं पाते। गुजरात सरकार के नए नियमों का मकसद ऐसी स्थिति में बच्चों को समय पर मदद देना है। अब स्कूलों को सिर्फ परीक्षा के नतीजों पर ध्यान देने के बजाय बच्चों की मानसिक सेहत, उनकी भावनाओं और उनकी समस्याओं को भी समझना होगा।

(इनपुट- PTI)

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