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इंदिरा गांधी ने क्या श्रीलंका को 'गिफ्ट' में दे दिया कच्चातिवु आइलैंड? पढ़ें इस विवाद की पूरी कहानी

 Written By: Vinay Trivedi
 Published : Jun 26, 2026 06:10 pm IST,  Updated : Jun 26, 2026 06:32 pm IST

इंदिरा गांधी ने कच्चातिवु आइलैंड को श्रीलंका को गिफ्ट के रूप में सौंपा था या नहीं, इसको लेकर बीजेपी सांसद निशिकांत दुबे के दावे के बाद चर्चा फिर से शुरू हो गई है। जानें ये पूरा मामला क्या है।

क्या भारत की पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने सच में भारत का कच्चातिवु आइलैंड श्रीलंका को गिफ्ट के रूप में दे दिया था? क्या नियमों की अनदेखी कर 26 जून 1974 को कच्चातिवु को लेकर श्रीलंका के साथ तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने समझौता किया था? दरअसल, BJP सांसद निशिकांत दुबे के इसको लेकर दावे के बाद सैकड़ों साल पुराना कच्चातिवु विवाद एक बार फिर से चर्चा में है। आखिर इस विवाद की पूरी कहानी क्या है? आइए इस आर्टिकल में समझते हैं कि कच्चातिवु आइलैंड विवाद क्या है और उसको श्रीलंका को सौंपने लेकर इंदिरा गांधी पर क्यों आरोप लगते हैं।

कच्चातिवु को लेकर निशिकांत दुबे का कांग्रेस पर प्रहार

दरअसल, श्रीलंका के साथ कच्चातिवु आइलैंड को लेकर समझौते की वर्षगांठ पर बीजेपी MP निशिकांत दुबे ने कांग्रेस पर तीखा प्रहार किया। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर किए गए एक पोस्ट में कच्चातिवु द्वीप को श्रीलंका को तोहफे में देने का आरोप लगाया। अपने एक्स पोस्ट में निशिकांत दुबे ने लिखा, '26 जून 1974 इंदिरा गांधी ने भारत का कच्चातिवु द्वीप श्रीलंका को दान दे दिया, इस द्वीप के दान देने के कारण प्रत्येक दिन हमारे तमिलनाडु के मछुआरों को श्रीलंका सरकार पकड़कर जेल भेजती है, यातना देती है।'

करुणानिधि को अंधेरे में रखकर श्रीलंका से किया समझौता

अपने एक्स पोस्ट में निशिकांत दुबे ने ये भी आरोप लगाया कि वैश्विक नेता बनने के होड़ में पहली बार 1957 में जवाहर लाल नेहरु ने यह द्वीप श्रीलंका को देने का फैसला किया, 1961 में नेहरु समझौते पर हस्ताक्षर करना चाहते थे लेकिन विदेश मंत्रालय व कानून मंत्रालय ने विरोध किया। उनकी मृत्यु के बाद 1967 में इंदिरा गांधी ने यह शुरुआत दोबारा की, तमिलनाडु तैयार नहीं था, आखिरकार 1974 में तमिलनाडु के तत्कालीन मुख्यमंत्री करुणानिधि को अंधेरे में रखकर 20 जून 1974 को चेन्नई विदेश सचिव को भेजकर तत्कालीन मुख्य सचिव तमिलनाडु को धमकाकर यह समझौता इंदिरा ने श्रीलंका के प्रधानमंत्री भंडारनायके के साथ कर लिया।

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कच्चातिवु द्वीप क्यों है महत्वपूर्ण?

अगर बात करें कि कच्चातिवु आइलैंड कहां हैं तो यह भारत और श्रीलंका के बीच Palk Strait में है। भारत और श्रीलंका से कच्चातिवु आइलैंड की दूरी देखें तो यह भारत के रामेश्वरम से करीब 33 किलोमीटर दूर है और श्रीलंका के जाफना से इसकी दूरी करीब 62 किलोमीटर है। कच्चातिवु आइलैंड 285 एकड़ का है। यह एक निर्जन द्वीप है, जहां कोई परमानेंट तरीके से नहीं रहता है। इसकी वजह यह है कि यहां पीने के पानी का कोई अच्छा सोर्स नहीं है, इसलिए स्थायी रूप से रहने के लिए यहां के हालात काफी मुश्किलों भरे हैं। यह आइलैंड मुख्य रूप से भारतीय मछुआरों के टापू पर रुककर थकान उतारने और अपना जाल सुखाने के काम आता है।

कच्चातिवु द्वीप का धार्मिक महत्व

कच्चातिवु आइलैंड का धार्मिक महत्व भी है। इस द्वीप पर 20वीं सदी का एक चर्च है, जिसका नाम सेंट एंथोनी कैथोलिक चर्च है। यहां सालाना तौर पर ईसाई समुदाय का एक फेस्टिवल होता है, जिसमें भारत-श्रीलंका के ईसाई समुदाय के लोग शामिल होते हैं।

कच्चातिवु आइलैंड विवाद का इतिहास

दरअसल, कच्चातिवु आइलैंड की हिस्ट्री सदियों पुरानी है। भारत-श्रीलंका में इसके मालिकाना हक को लेकर लंबे समय से अस्पष्टता रही है। 17वीं सदी के दौरान, कच्चातिवु आइलैंड मदुरै के रामनाद साम्राज्य के जमींदारों के नियंत्रण में था। फिर, ब्रिटिश राज में यह मद्रास प्रेसीडेंसी का भाग बना। हालांकि, श्रीलंका भी इसको लेकर अपना दावा जताता रहता था।

1921 में मछली पकड़ने की सीमा पर हुआ विवाद

इसके बाद, 1921 में दोनों देशों के बीच मछली पकड़ने की सीमा पर विवाद हुआ। उस समय भारत और श्रीलंका दोनों ही ब्रिटिश कॉलोनी थे। तब दोनों ओर से ब्रिटिश अफसरों ने मीटिंग की। अपने दावे पेश किए लेकिन यह मामला अनसुलझा ही रहा। 

जब भारत ने श्रीलंका को सौंपा कच्चातिवु आइलैंड

26 जून 1974 को भारत की तत्कालीन PM इंदिरा गांधी और श्रीलंका की प्रधानमंत्री सिरिमावो भंडारनायके के बीच एक समझौते पर साइन हुए। इसके अंतर्गत भारत ने ऑफिशियली कच्चातिवु आइलैंड को श्रीलंका के भाग के तौर पर मान्यता दे दी। हालांकि, इस समझौते में भारतीय मछुआरों को वीजा के बिना ही कच्चातिवु आइलैंड पर जाने और अपना जाल सुखाने की इजाजत थी। इसके अलावा, चर्च के सालाना फेस्टिवल में भारतीयों के जाने की अनुमति भी थी।

1976 के समझौते से बढ़ी मछुआरों की परेशानी

दो साल बाद 1976 में भी भारत और श्रीलंका के बीच एक समझौता हुआ। ये समझौता एक्सक्लूसिव इकोनॉमिक जोन को लेकर था, जिसने दोनों तरफ के मछुआरों को एक-दूसरे के इकोनॉमिक जोन में मछली पकड़ने से बैन कर दिया। इससे कच्चातिवु आइलैंड जाने वाले भारतीय मछुआरों को परेशानी आने लगी। श्रीलंका, कच्चातिवु आइलैंड पर एकाधिकार समझने लगा जो भारतीय मछुआरों के लिए परेशानी का सबब बन गया।

तमिलनाडु सरकार का कच्चातिवु आइलैंड को लेकर विरोध

गौरतलब है कि कच्चातिवु आइलैंड को श्रीलंका को सौंपने के इंदिरा गांधी सरकार के फैसले का तमिलनाडु में लगातार कड़ा विरोध होता रहा है। तमिलनाडु की सरकारों का तर्क रहा है कि यह रामनाद साम्राज्य का भाग था। यह बाद में भारत का पार्ट बना। 1974 में जब कच्चातिवु आइलैंड को श्रीलंका को सौंपा जा रहा था तब तमिलनाडु के तत्कालीन सीएम करुणानिधि ने इसका विरोध किया था। करुणानिधि ने इंदिरा गांधी सरकार से गुजारिश भी की थी कि कच्चातिवु आइलैंड को श्रीलंका को नहीं सौंपा जाना चाहिए। लेकिन उनकी बात को नहीं माना गया।

  • 1991 में जे. जयललिता के नेतृत्व वाली सरकार में तमिलनाडु विधानसभा ने कच्चातिवु को वापस लेने की डिमांड करते हुए एक प्रपोजल पारित किया। इसे विपक्षी दलों ने भी खुलकर समर्थन दिया था। सीएम बनने के बाद जे. जयललिता ने इसको अपनी सियासी प्राथमिकता बनाया था।
  • फिर, 2008 में जयललिता की लीडरशिप वाली तमिलनाडु की सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की और 1974 व 1976 के समझौतों की संवैधानिकता को चैलेंज किया। इसमें उनकी तरफ से 1960 के बेरुबारी फैसले का हवाला देते हुए कहा गया कि संसद में संविधान संशोधन के बिना भारत की कोई भी जमीन को दूसरे देश को नहीं सौंपी जा सकती है। हालांकि, इस मामले पर अभी तक कोई आखिरी फैसला नहीं आया है। ये मामला अभी सुप्रीम कोर्ट में लंबित है।

वर्तमान में कच्चातिवु की बात करें तो यह महज कोई जमीन का मुद्दा नहीं, बल्कि लाखों भारतीय मछुआरों की रोजी-रोटी का विषय है। चूंकि कच्चातिवु आइलैंड का पारंपरिक तौर पर भारतीय मछुआरे प्रयोग करते थे, तो वे अक्सर अभी भी अंतरराष्ट्रीय समुद्री सीमा लांघ जाते हैं और श्रीलंकाई नेवी उनकी नावें जब्त कर लेती है और उन्हें अरेस्ट कर लेती है।

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