Published : Nov 16, 2025 07:29 pm IST, Updated : Nov 16, 2025 07:32 pm IST
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आईवीएफ आज उन दंपतियों के लिए एक सुरक्षित और प्रभावी विकल्प माना जाता है, जिन्हें प्राकृतिक तरीके से गर्भधारण में कठिनाई होती है। लेकिन हर स्थिति में आईवीएफ की जरूरत नहीं होती। मैकक्योर हॉस्पिटल्स में को फाउंडर और मेडिकल डायरेक्टर डॉ. गीता जैन बता रही है कि यह समझना क्यों जरूरी है कि किन परिस्थितियों में यह उपचार सही विकल्प है और कब इसकी आवश्यकता नहीं होती।
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आईवीएफ ट्रीटमेंट तब कराया जाना चाहिए जब किसी महिला की फैलोपियन ट्यूबें ब्लॉक हों या गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त हों, जिससे प्राकृतिक गर्भधारण संभव न हो। इसके अलावा, पुरुष में स्पर्म काउंट बहुत कम हो या स्पर्म की गुणवत्ता खराब हो, तो भी आईवीएफ एक बेहतर समाधान बन जाता है।
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ऐसी महिलाएँ जिन्हें एंडोमेट्रियोसिस, पीसीओएस, या ओव्यूलेशन संबंधी समस्याएँ हों और दवाइयों या सरल उपचारों से गर्भधारण न हो पाए, वे भी आईवीएफ का लाभ ले सकती हैं। उम्र भी एक महत्वपूर्ण कारक है 35 वर्ष के बाद अंडों की संख्या और गुणवत्ता कम होने लगती है, इसलिए कई बार डॉक्टर जल्दी आईवीएफ शुरू करने की सलाह देते हैं।
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हालाँकि, हर दंपत्ति को आईवीएफ की आवश्यकता नहीं होती। यदि दंपत्ति की उम्र कम है और सिर्फ हल्की प्रजनन समस्याएँ हैं, जैसे अनियमित ओव्यूलेशन या मामूली स्पर्म क्वालिटी की समस्या, तो पहले सरल तरीकों जैसे दवाइयों, ओव्यूलेशन मॉनिटरिंग और IUI से गर्भधारण की कोशिश की जाती है। इसके अलावा, यदि महिला की हार्मोनल स्थिति या स्वास्थ्य आईवीएफ के लिए उपयुक्त न हो, जैसे अनियंत्रित थायराइड, शुगर या गंभीर स्वास्थ्य जोखिम, तो पहले इन स्थितियों को स्थिर करना जरूरी होता है।
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सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि आईवीएफ का निर्णय हमेशा एक अनुभवी फर्टिलिटी विशेषज्ञ से परामर्श करके ही लेना चाहिए। सही जांच, सही समय और सही उपचार से ही सफलता की संभावना बढ़ती है और माता-पिता बनने का सपना पूरा हो सकता है।