श्रीनगर: जाने माने कश्मीरी लेखक और कवि गुलाम नबी खयाल भी साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटाने वाले लेखकों की जमात में शामिल हो गए हैं। उन्होंने कहा कि देश में अल्पसंख्यक आज असुरक्षित और खतरा महसूस करते हैं।
खयाल ने कहा, मैंने पुरस्कार लौटाने का फैसला किया है। देश में अल्पसंख्यक असुरक्षित और खतरा महसूस कर रहे हैं। उन्हें अपना भविष्य अंधकारमय लग रहा है।
अपनी किताब गाशिक मीनार के लिए 1975 में यह प्रतिष्ठित खिताब जीतने वाले खयाल ने कहा कि वह जल्द ही नकद पुरस्कार और ताम्र पट्टिका अकादमी को वापस कर देंगे।
उन्होंने कहा, सरकार देश के संविधान के मुताबिक अल्पसंख्यकों की रक्षा करने के अपने दायित्व को निभाने में नाकाम रही है।
उन्होंने कहा, मैं इन घटनाओं का मूकदर्शक नहीं हो सकता। इसलिए मैंने भारत में अल्पसंख्यकों के खिलाफ बढ़ती नफरत के विरोध में अकादमी पुरस्कार लौटाने का फैसला किया है।
यह पहली बार है जब किसी कश्मीरी लेखक ने देश के कुछ भागों में सांप्रदायिक माहौल के खिलाफ अपना साहित्यिक सम्मान लौटाने का फैसला किया है जो कि महाराष्ट्र से लेकर उत्तर प्रदेश और अन्य जगहों पर फैलता जा रहा है।
खयाल ने कहा, भारत में BJP नीत सरकार के सत्ता में आने के बाद से सांप्रदायिक स्थिति खतरनाक स्थिति में पहुंच रही है। पूरे देश में प्रतिकूल क्षेत्रीय और धार्मिक धुव्रीकरण हुआ है और जम्मू-कश्मीर अपवाद नहीं है।
लेखक ने कहा कि देश का धार्मिक सौहार्द और धर्मनिरपेक्षता आज खतरे में है।
उन्होंने कहा, सांप्रदायिक ताकतों से अभिव्यक्ति की आजादी और कई धार्मिक पहचानों को खतरा है लेकिन चर्च जलाए जाने, मुसलमानों के मारे जाने और धार्मिक रस्मों पर प्रतिबंध के बावजूद प्रधानमंत्री खामोश हैं।
दादरी घटना पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की देर से आयी प्रतिक्रिया की भी उन्होंने आलोचना की।
खयाल ने कहा, BJP अब भोजन आदतों में बदलाव कर लोगों के मौलिक अधिकार पर रोक लगा रही है।
लेखक बिरादरी की कई शख्सियतों ने कन्नड़ लेखक और साहित्य अकादमी पुरस्कार विजेता एम एम कलबुर्गी और तर्कवादी नरेंद्र दाभोलकर एवं गोविंद पानसरे की हत्या के खिलाफ आवाज उठायी और ऐसी घटनाओं पर सरकार तथा अकादमी की खामोशी पर सवाल उठाया।